
Naveen Sharma
Ranchi : किसी भी स्वतंत्र देश में ऐसा नहीं होता है कि कोई अल्पसंख्यक समुदाय ही बहुसंख्यक समुदाय के हजारों लोगों का नरसंहार कर, यहां तक की महिलाओं, बुजुर्ग और बच्चों का कत्लेआम कर उन्हें डरा धमका लाखों लोगों को उनकी अपनी सरजमीं से जोर जबरदस्ती भगा दे. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हुआ है और ये हमारे देश भारत में ही हुआ है. इस घटना को ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ है. महज 30 साल पहले कश्मीर में ये जेनोसाइड हुआ और उस समय के राजनेताओं और मीडिया ने इस दर्दनाक त्रासदी को एक तरह से अनदेखा कर दिया.
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19 जनवरी 1990 का काला दिन
19 जनवरी 1990 का दिन कश्मीर और हमारे देश के लिए बेहद काला दिन था. उस दिन कश्मीर से गैर मुसलमानों के लिए फरमान जारी हुआ कि या तो धर्म बदलो या कश्मीर छोड़ कर भाग जाओ. गैर मुस्लिमों को कश्मीर से भगाने के लिए पाकिस्तान के आईएसआई समर्थित आतंकी गुटों जैश ए मोहम्मद, हरकत उल अंसार, जेकेएलएफ सहित आधा दर्जन से अधिक इस्लामिक आतंकी गुटों ने कश्मीर में चुन-चुन कर गैर मुस्लमानों खासकर कश्मीरी पंडितों का ऐसा अंधाधुंध कत्लेआम किया.
सदियों से कश्मीर में रहनेवाले कश्मीरी पंडित लाखों की संख्या में अपनी जान बचाने के लिए मातृभूमि छोड़ कर जम्मू, दिल्ली,पंजाब सहित देश तथा विदेश भागने को मजबूर हो गये. अभी हाल के इतिहास की इतनी बड़ी घटना को लेकर मीडिया में एक तरह की गहरी खामोशी दिखाई है. ऐसा लगता है जैसे लीपापोती कर ऐसा दिखाया गया जैसे ये कोई साधारण सी घटना है.
बॉलीवुड का ये रहा है रवैया
बॉलीवुड का रवैया भी इस मामले में अजीब सा रहा है. कश्मीर के आतंकवाद को लेकर करीब दर्जन भर फिल्में बनी हैं. इनमें से आधा दर्जन फिल्में बड़े फिल्मकारों जैसे विधु विनोद चोपड़ा और यशराज फिल्म ने बनायी हैं. फिल्म निर्माता और निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म मिशन कश्मीर ऋतिक रोशन और संजय दत्त जैसे बड़े स्टारकास्ट को लेकर बनायी गयी.
फिल्म बॉक्स आफिस पर भी सफल रही थी लेकिन ये फिल्म कश्मीर के आतंकवाद को बहुत गहराई से नहीं दिखा पायी. खासकर कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों को मारकाट कर जबरन भगाने को तो इग्नोर करती है.
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विधु विनोद चोपड़ा ने किया था निराश
विधु विनोद चोपड़ा खुद कश्मीरी हैं. इन्होंने कश्मीर पर एक और फिल्म बनायी थी शिकारा मैं ये फिल्म इस उम्मीद में देखने गया था कि शायद इस फिल्म में वो ये साहस दिखा पायें कि गैर मुस्लमानों का किस तरह नरसंहार किया गया उसे वो दिखा पायें लेकिन विधु निराश करते हैं. इसमें वो उस नरसंहार को मामूली दंगे की तरह दिखाते हैं.
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फना और हैदर भी मुद्दे पर बात नहीं करतीं
इसी तरह यशराज की फिल्म फना भी कश्मीर में आतंकवाद पर आधारित थी लेकिन वो भी एक तरह से आतंकी बने आमिर खान के कैरेक्टर को ग्लैमराइज ही करती नजर आती है. भले ही अंत में उसकी मौत हो जाती है. इसी तरह से विशाल भारद्वाज की फिल्म हैदर में भी कश्मीर का आतंकवाद पृष्ठभूमि में है लेकिन कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कहीं नजर नहीं आता है.
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विवेक रंजन अग्निहोत्री का साहसिक काम
फिल्म निर्माता और निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री बॉलीवुड पहले ऐसे साहसिक फिल्मकार हैं जिन्होंने इस नरसंहार को पहली बार द कश्मीर फाइल्स में बहुत ही ईमानदारी और शिद्दत से दिखाते हैं. विवेक जो बात कहना और दिखाना चाहते हैं उसे वे बेहतरीन अंदाज में कहने में सफल रहे हैं. फिल्म की कहानी सच के बेहद करीब है इसलिए संवेदनशील दर्शकों को झकझोर देती है. आप सॉक्ड हो सकते हैं कि स्वतंत्र भारत में ऐसा खौफनाक नरसंहार भी हुआ होगा जो हिटलर के यहुदियों के नरसंहार को मात देता हुआ नजर आता हो.
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अनुपम खेर का यादगार अभिनय
अनुपम खेर ने सारांश और डैडी फिल्म के बाद एक बार फिर यादगार अभिनय किया है. मिथुन चक्रवर्ती अपनी सीमाओं के हिसाब से ठीक लगे हैं. दर्शन कुमार ने भी मेहनत की है और पल्लवी जोशी तो कमाल करती हैं.
पल्लवी ने इस फिल्म में फैज अहमद फैज की नजम हम देखेंगे लाजमी है कि हम देखेंगे को बहुत खूबसूरत अंदाज में गाया है. ये नज्म जेएनयू में चले आंदोलन भारत तेरे टुकड़े होंगे और आजाद कश्मीर की बात करनेवालों ने गायी थी.
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विवेक खुद को लगातार कर रहे हैं इंप्रूव
विवेक अग्निहोत्री की इस बात के लिए भी तारीफ करनी होगी कि वो लगातार खुद को इंप्रूव करते नजर आ रहे हैं. उनकी बुद्धा इन ट्रैफिक जाम जो अर्बन नक्सल के सब्जेक्ट पर थी वो भले ट्रिटमेंट में थोड़ी कमजोर थी लेकिन उसके बाद ताशकंद फाइल्स में विवेक आगे बढ़ते हैं. ताशकंद फाइल्स का ट्रिटमेंट डाक्यूमेंट्री की तरह हो गया था और कहानी थोड़ी कमजोर थी लेकिन कश्मीर फाइल्स तक आकर वो खुद को साबित करते हैं कि वे एक बेहतरीन और सुलझे हुए लेखक निर्देशक हैं.
फिल्म में हिंसा के कई ऐसे दृश्य हैं जिन्हें देखकर आपके रौंगटे खड़े हो जायेंगे और आपकी आंखों से आंसू भी बह सकते हैं.
विवेक को इस शानदार फिल्म बनाने के लिए बधाई. जो लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्में नहीं देखते हैं जिन्हें गंभीर और अच्छी फिल्मों को देखने में रूचि रखते हैं वे जरूर देखें.
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