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विपक्षी दलों के अस्तित्व पर संकट के गहराते बादल

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Faisal Anurag

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फ्रंट से निराशा और हताशा का मुकाबला करने के बजाय नेताओं के पलायनवादी रुख से प्रमुख विपक्षी दलों के अस्तित्व का संकट गहराता जा रहा है. कार्यकर्ता बदहवाशी की ओर धकेले जा रहे हैं और हार के सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक कारणों का मूल्यांकन करने के बजाय टालमटोल के रुख ने हालात को और गंभीर बना रखा है.

लोकसभा चुनाव में मुकाबले का जो हौसला दिखा था उसने चुनाव परिणाम के हादसे में ही दम तोड़  सा दिया है. हालांकि राजनीति में किसी भी नेता और दल की भावी संभावनाओं को खत्म मान लेना गलत निष्कर्ष होगा. बावजूद इसके आलोचक और हताश समर्थक भी इन दलों की आव्युचरी लिखने से परहेज नहीं कर रहे हैं. तो क्या इन दलों की मृत्यु की घोषणा जल्दबाजी ही है.

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कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों के अस्तित्व को लेकर संदेह नेतृत्व की भूमिका को गहरा रहा है. हालात दिख रहे हैं कि भारत कहीं एकदलीय तानाशाही की गिरफ्त में पूरी तरह से न जकड़ जाये. लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया जारी रहने के बाद भी इस खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में विपक्ष की लचर और कमजोर हालात के कारण इस तरह की तानाशाहियों का वर्चस्व स्थापित हुआ है.

उनमें कई देशों को भारी तबाही के दौर से गुजरना पड़ा है.  कारपारेट और क्रोनी पूंजी के लिए यह अनुकूल होता है. अनेक देशों में इन ताकतों ने ही चुनावों में  मैन्युफैक्चर्ड कर सत्ता को अपने पक्ष में कर लिया है. अमरीका के पिछले चुनाव की बाबत अनेक दस्तावेज सार्वजनिक हो चुके हैं. ब्राजील का उदाहरण भी सामने है. मजबूत विपक्ष को कमजोर कर दक्षिणपंथी ताकतों ने सत्ता हासिल कर लिया और अब विपक्ष को खत्म करने की हर साजिश को अंजाम देने की कोशिश है. भारत भी इसका अपवाद नहीं माना जा सकता है.

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद विपक्षी दलों में तोड़फोड़ की सुनामी लाने के लिए जिस तरह धनप्रवाह हो रहा है, वह बेहद चिंताजनक है.

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कारपारेट घरानों ने धनप्रवाह कर भाजपा को तमाम विपक्षी दलों की तुलना में बहुत आगे कर दिया है. इलेक्ट्रोल बांड विपक्ष के लिए एक बड़ा हादसा साबित हुआ है. खबर तो यह भी है कि नोटबंदी का पूरा डिजाइन भाजपा के लिए ही तैयार किया गया. लोकसभा चुनाव भी समतल भूमि पर नहीं लड़ा गया. भाजपा के खर्च के मुकाबले तामाम विपक्ष दल कहीं नहीं ठहरते हैं. भाजपा ने पूरे चुनाव को पुलवामा घटना के बाद अपने पक्ष में कर लिया.

लेकिन विपक्ष की इस हार के लिए केवल यही कारण नहीं है. 2014 में भी नरेंद्र मोदी ने जीत हासिल की थी और लोकसभा में विपक्ष हाशिए पर आ गया था. लेकिन इस बार की कहानी कहीं ज्यादा त्रासद है. पांच साल की अपनी नाकामियों को पॉजिटिव बनाने की भाजपा की दक्षता के खिलाफ न तो संगठन और न ही प्रचार के स्तर पर विपक्ष मुकाबला कर सका. विपक्ष के कुछ ही नेताओं के चुनाव अभियान में आक्रमकता दिखी थी. लेकिन उसमें भी पूरी पार्टी उसके साथ खड़ी नजर नहीं आयी. पुलवामा घटना के बाद तो पूरा नरेटिव ही बदल गया. यदि पुलवामा घटना नहीं होती तो भी विपक्ष जीत नहीं पाता.

क्योंकि वोट आधार और संगठन के मामले में भाजपा ने उसे बेदखल कर दिया था. शायद यही कारण है कि विपक्ष को जिस गठबंधन में वोटों की गारंटी दिख रही थी वह जमीनी हकीकत नहीं थी. क्योंकि विपक्षी दलों के वोट आधारों में भाजपा ने पैंठ बना ली थी. वास्तविकताओं से नजर चुराते इन दलों को आने वाले दिनों में आंतरिक चुनौतियों और बिखराव के साथ विघटन के दौर का शिकार होने पड़े तो अचरज नहीं होगा.

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कांग्रेस राहुल गांधी के इसतीफे के बाद ऐसे मंझधार में फंस गयी है जहां से साहिल नजर ही नहीं आ रहा है. कांग्रेस के सुविधापस्त और जनाधारविहीन नेताओं के वर्चस्व के कारण पार्टी अपने अस्तित्व को संभालने में कमजोर दिख रही है. कांग्रेस के कमजोर दिल नेता इस हालात में ऐसी शरणस्थली की तलाश कर रहे हैं जहां उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित दिखे. इसका जल्द ही व्यापक असर दिख सकता है. कांग्रेस नेतृत्व की तलाश नहीं कर पा रही है. ऐसा नहीं है कि उसमें नेताओं की कमी है. देश भर में पहचाने जाने वाले नेता भी हैं. बावजूद पार्टी पर कब्जा जमाये नेता अपने ऐसे नेता को लाने की कोशिश में उलझे हुए हैं जिसे वे संचालित कर सकें. इन नेताओं के कारण ही कांग्रेस जनता से कटती गयी है. इस तरह के नेताओं के कई समूह बने हुए हैं.

लोकसभा चुनाव के दौरान ये नेता दिल्ली में बैठे रहे और पार्टी को अकेले राहुल गांधी पर छोड़ दिया. इन नेताओं के कारण ही पार्टी के कई अहम क्षेत्रीय नेता या तो दरकिनार कर दिये गये या उन्हें पार्टी से बाहर होना पडा. इन नेताओं की ताकत एक चुनाव जीतने तक की नहीं है. फिर भी पार्टी नेतृत्व को अपने कब्जे में रखने के हुनर से इन सब का वर्चस्व बना रहता है. सूत्र बताते हैं कि इन नेताओं ने राहुल गांधी के तमाम प्रयोगों को सफल नहीं होने दिया और राहुल गांधी को स्वतंत्र निर्णय नहीं करने दिया.

अब ये नेता ही पार्टी के सबसे बड़े खलनायक होने के बावजूद भविष्य निर्माता बने हुए हैं. राहुल गांधी का विकल्प इनके कारण ही चुना नहीं जा सका है. अमरेंद्र सिंह और कर्ण सिंह के बयानों से जाहिर होता है कि कांग्रेस किस तरह के संकट में है.

इस घटनाक्रम का असर यह हो रहा है कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने को हैं और जिन राज्यों में इनकी सरकारें हैं सब पर खतरा गहरा गया है. भारतीय जनता पार्टी के नरेटिव के बरखिलाफ कांग्रेस अपने लिए कोई रास्ता नहीं बना पा रही है. राजीव गांधी के जमाने में उभरे ऐसे परजीवी नेताओं का कांग्रेस पर कब्जा बना हुआ है और वह अब भी मजबूत है.

राहुल गांधी तो अध्यक्ष होने के बाद अपनी स्वतः टीम तक नहीं बना सके. कांग्रेस को युवा लुक देने में उनकी नाकामयाबी की पृष्ठभूमि इन नेताओं ने ही तैयार की है. वैचारिक रूप से कांग्रेस को कमजोर करने में इन नेताओं की रणनीति का ही हाथ है. कांग्रेस तो नेहरू का बचाव करने में भी जिस तरह कमजोर साबित हुई है, उससे जाहिर होता है कि इन नेताओं ने कांग्रेस के इस संकट से निपटने का हौसला ही खो दिया है.

राजद भी एक बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है. आंतरिक संकट कभी भी विस्फोटक हो सकता है. चुनाव अभियान के दौरान तेजस्वी यादप की पहचान एक ऐसा नेता के रूप में उभरी थी जो राजद की विरासत का सही वाहक है. चुनावी हार के बाद से सार्वजनिक जीवन से गायब तेजस्वी की हताशा को लेकर राजनीतिक माहौल बेहद गरम है. राजद के नेता शिवानंद तिवारी को तो कड़ी बात कहनी पड़ी. उन्होंने कहा कि तेजस्वी को मांद से बाहर आ कर पार्टी का नेतृत्व करना चाहिए. तेजस्वी पटना आये भी लेकिन तीन दिनों से वे दिल्ली में डेरा जमाये हुए हैं.

उनकी गतिविधियों में अभी नाराजगी साफ दिख रही है. पार्टी में अब तेजस्वी के बड़े भाई तेज प्रताप को लेकर अनेक सवाल उठे हैं. कहा जा रहा है कि लोकसभा में उनकी अनुशासनहीता से तेजस्वी आहत हुए हैं और पार्टी के अनेक दूसरे नेता भी. लेकिन उससे भी बड़ी बात उन पर किसी तरह की अनुशासनिक कार्रवाई नहीं किया जाना भी हताशा का कारण है. फातिमी जैसे नेता को पार्टी ने दंडित किया लेकिन तेज प्रताप ने उनसे बड़ी गलती की और उन्हें छोड़ दिया गया. लालू यादव और राबडी देवी तेज प्रताप को माफ करना चाहती हैं लेकिन यह तेजस्वी को शायद ही स्वीकार हो.

इस हालात में तेजस्वी की पार्टी में ही स्थिति कमजोर होगी और राजद में इससे संकट और भी बढ़ सकता है. विधानसभा चुनाव नजदीक है लेकिन राजद किसी भी तरह राजनीतिक तौर पर हार से उबरता नहीं दिख रहा है. यही नहीं विधानसभा के दौरान भी राजद का हमला बिखरा हुआ दिखा. जबकि चमकी बुखार जैसे मामले में सरकार बेदाग नहीं है.

मायावती ने समाजवार्दी पार्टी से गठबंधन किन कारणों से तोड़ा, इसे लेकर अभी तक स्पष्टता नहीं है. बसपा मायावती के परिवार के महत्व के बीच उस नरेटिव से अलग होती दिख रही है जो उसकी पहचान रही है. इसी तरह अखिलेश यादव संसद के लिए चुने गये लेकिन वे कहीं भी हस्तक्षेप करते नहीं दिखे. वे लंबे समय से विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं.

इसका असर भी सपा पर नकारातमक ही पड़ा है. लोकसभा चुनाव में गठबंधन के कारण ही मायावती 0  से 10 तक पहुंच गयीं. बावजूद उन्होंने अकेले जिन हालातों में चलने का फैसला किया है उसके कई निहितार्थ हैं. इस समय इस गठबंधन को वोट देने वाले स्वयं को ठगा हुआ हुआ महसूस कर रहे हैं.

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