
New Delhi: रोजगार, टैक्स कलेक्शन, जीडीपी समेत तमाम तरह के आंकड़ों को लेकर मोदी सरकार पर सवाल उठते रहे हैं. आरोप लगते रहे हैं कि मोदी सरकार अपनी आर्थिक नीतियों की खामियों को छिपाने के लिए सुविधाजनक तरीके से आंकड़ों को छिपाती है और उलटफेर करती है. ताजा मामला वित्त मंत्रालय के आर्थिक सर्वे 2019-20 और बजट 2019-20 में आमदनी के आंकड़ों में गड़बड़ी का है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक सर्वे रिपोर्ट और बजट में आमदनी के आंकड़े में 1.7 लाख करोड़ रुपये का अंतर है. इसे लेकर जहां सरकार की किरकिरी हो रही है, वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट में इसे गड़बड़झाला बताया जा रहा है. और अंदेशा व्यक्त किया जा रहा है कि वित्त मंत्रालय कोई बड़ी बात छिपा रही है. इस गड़बड़ी को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने पकड़ी है.
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जीडीपी के आंकड़ों में भी अंतर
चार चुलाई को संसद में वर्ष 2019-20 का आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया था. इसमें वित्त वर्ष 2018-19 में सरकार का राजस्व संग्रह 15.6 लाख करोड़ बताया गया था. अगले ही दिन आम बजट में संशोधित अनुमान के आधार पर इसे 17.3 लाख करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्ति बतायी गयी. सरकार द्वारा प्रस्तुत इन दो दिनों के आंकड़े में करीब 1.7 लाख करोड़ का अंतर है. यानी आर्थिक सर्वेक्षण में जितना राजस्व प्राप्ति दर्शाया गया बजट में उससे 1.7 लाख करोड़ अधिक दिखाया गया. इसके अलावा देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को देखें तो बजट में राजस्व प्राप्ति का अनुमान 9.2 प्रतिशत दिखाया गया गया, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण के हिसाब से यह केवल 8.2 फीसदी है.
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खर्च में भी डेढ़ लाख करोड़ रुपये का अंतर
यही नहीं बजट और सर्वेक्षण में सरकार के खर्च में भी अंतर दिखायी दे रहा है. जहां बजट में 2018-19 में सरकारी खर्च 24.6 लाख करोड़ रुपये बताया गया है, वहीं आर्थिक सर्वेक्षण में यह रकम 23.1 लाख करोड़ रुपये है. इस प्रकार दोनों राशियों में 1.5 लाख करोड़ रुपये का अंतर है. इसका कारण यह है कि बजट में 14.8 लाख करोड़ रुपये के कर संग्रह का अनुमान प्रदर्शित है, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण में 13.2 लाख करोड़ रुपये का वास्तविक राजस्व संग्रह बताया गया है.
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