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BSNL: कभी थी नंबर वन और अब क्यों है डूबने की कगार पर?

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Vineet Khare

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फ़रवरी 2019. बीएसएनल (भारत संचार निगम लिमिटेड) के तत्कालीन सीएमडी अनुपम श्रीवास्तव बेहद परेशान थे.

लाखों करोड़ो रुपये के डूबे क़र्ज़ के बोझ तले दबी बैंकिंग सेक्टर की चुनौतीपूण हालत, “बाहरी और आंतरिक चुनौतियों” के कारण नकदी की कमी से जूझ रही बीएसएनएल अपने 1.7 लाख कर्मचारियों की तनख़्वाहों के लिए धन जुटाने की कोशिश कर रही थी.

फ़रवरी में कर्मचारियों की तनख़्वाहों में 15 दिनों की देरी मीडिया में बड़ी-बड़ी सुर्खियां थीं.

अनुपम श्रीवास्तव को ये पता था कि अगर ये सुर्खियां लंबे समय तक चलीं तो बैंकों से कर्ज़ लेना और मुश्किल हो जायेगा.

जून में रिटायर हुए अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं, “चुनौती थी कि पैसे कैसे इकट्ठा करें, एक अस्थायी कैश फ़्लो की स्थिति से कैसे निपटें.”

पैसों का इंतज़ाम करने के बाद मार्च में कंपनी ने अपने कर्मचारियों की तनख़्वाहें दीं.

अक्टूबर 2002 में बीएसएनएल मोबाइल सेवा के लॉन्च होने के मात्र डेढ़ दो सालों में भारत की नंबर वन मोबाइल सेवा बनने वाली बीएसएनएल पर क़रीब 20 हज़ार करोड़ रुपये का क़र्ज़ है.

अधिकारी याद दिलाते हैं कि ये बीएसएनएल ही थी जिसकी फ़्री इनकमिंग कॉल्स, फ़्री रोमिंग जैसी सुविधाओं से दामों में भारी गिरावट आयी.

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हालांकि बीएसएनल अधिकारी ये दावा करते नहीं थकते कि प्राइवेट टेलीकॉम ऑपरेटर्स के मुक़ाबले बीएसएनएल पर कर्ज़ “चिल्लर जैसा” है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि बीएसएनएल को बंद कर दिया जाये. कुछ इसके निजीकरण पर ज़ोर दे रहे हैं.

पूर्व बीएसएनल अधिकारियों से बातचीत में ऐसी तस्वीर उभरती हैं जिससे लगता है कि बीएसएनएल की आंतरिक चुनौतियों और सरकार के कड़े शिकंजे और काम में कथित सरकारी दख़लअंदाज़ी के कारण कंपनी आज ऐसी स्थिति में है.

कंपनी में करीब 1.7 लाख कर्मचारियों की औसत उम्र 55 वर्ष है और एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक “इनमें से 80 प्रतिशत बीएसएनएल पर बोझ हैं क्योंकि वो तकनीकी तौर पर अनपढ़ हैं जो नयी तकनीक सीखना ही नहीं चाहते और इसका असर युवा कर्मचारियों के मनोबल पर पड़ता है.”

बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन इन आरोपों से इनकार करता है.

जहां बीएसएनएल अपनी आमदनी का 70 प्रतिशत तन्ख़्वाहों पर खर्च करती है, निजी ऑपरेटर्स में ये आंकड़ा 3-5 प्रतिशत है.

एक अधिकारी के मुताबिक जहां निजी ऑपरेटर्स का आरपू (ARPU) यानी हर ग्राहक से होनी वाली आमदनी क़रीब 60 रुपये है, बीएसएनएल में ये 30 रुपये है, क्योंकि बीएसएनएल के ज़्यादातर ग्राहक कम आमदनीवाले हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्य सभा में बीएसएनएल के लिए आर्थिक पैकेज की बात कही तो है लेकिन कंपनी के भविष्य को लेकर अटकलें जारी हैं.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आख़िर एक ज़माने की नंबर वन कंपनी बीएसनएल इस हाल में कैसे पहुंची?

बीएसएनएल का लॉन्च

19 अक्टूबर 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ से बीएसएनएल मोबाइल सेवा की शुरुआत की.

अगले दिन बीएसएनल ने जोधपुर में सेवा की शुरुआत की, जहां अनुपम श्रीवास्तव बीएसएनएल के जनरल मैनेजर के पद पर थे.

अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं, “जब हमें बीएसएनएल की सिम्स (सिम कार्ड) मिलती थीं तब हमें पुलिस, प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षा देने के लिए बताना पड़ता था क्योंकि अव्यवस्था का ख़तरा पैदा हो जाता था. वो दिन थे जब बीएसएनएल सिम्स के लिए तीन से चार किलोमीटर लंबी लाइनें लगती थीं.”

ये वो वक़्त था जब निजी ऑपरेटरों ने बीएसएनएल के लॉन्च के महीनों पहले मोबाइल सेवाएं शुरू कर दी थीं लेकिन बीएसएनएल की सेवाएं इतनी लोकप्रिय हुईं कि बीएसएनएल के ‘सेलवन’ ब्रैंड की मांग ज़बर्दस्त तरीक़े से बढ़ गयी.

अधिकारी गर्व से बताते हैं कि “लॉन्च के कुछ महीनों के बाद ही बीएसएनल देश की नंबर वन मोबाइल सेवा बन गयी”

सरकारी दखल

डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलिकॉम (डीओटी) से बीएसएनएल का जन्म अक्टूबर 2000 में हुआ. इसमें भारत सरकार की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी थी.

बीएसएनएल की डोर डीओटी के हाथों में है जो भारत सरकार के संचार मंत्रालय का हिस्सा है.

एमटीएनएल मुंबई और दिल्ली में ऑपरेट करती थी जबकि बाकी देश में बीएसएनएल की मौजूदगी है.

साल 2000 में स्थापना के बाद बीएसएनएल के अधिकारी जल्द से जल्द मोबाइल सेवाएं शुरू करना चाहते थे ताकि वो निजी ऑपरेटरों को चुनौती दे सकें लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक उन्हें ज़रूरी सरकारी सहमति नहीं मिल पा रही थी.

विमल वाखलू उस वक्त बीएसएनल में वरिष्ठ पद पर थे. वो बताते हैं, “हम काफ़ी निराश थे. हम एक रणनीति पर काम करना चाहते थे ताकि हम मुक़ाबले को पीछे छोड़ सकें.”

वो कहते हैं, “बीएसएनएल के बोर्ड ने प्रस्ताव पारित कर सेवाओं को शुरू करने का फ़ैसला किया.”

उस वक्त डॉक्टर डीपीएस सेठ बीएसएनएल के पहले प्रमुख थे. वो सरकार के साथ अपने रिश्तों पर बहुत बात नहीं करना चाहते लेकिन कहते हैं कि शुरुआत में फ़ैसले लेने में जो आज़ादी थी वो धीरे-धीरे कम होने लगी.

विमल वाखलू बताते हैं, “जब बीएसएनएल की सेवाओं की शुरुआत हुई, उस वक़्त निजी ऑपरेटर 16 रुपये प्रति मिनट कॉल के अलावा 8 रुपये प्रति मिनट इनकमिंग के भी पैसे चार्ज करते थे. हमने इनकमिंग को मुफ़्त किया और आउटगोइंग कॉल्स की कीमत डेढ़ रुपये तक हो गयी. इससे निजी ऑपरेटर हिल गये.”

बीएसएनएल कर्मचारी 2002-2005 के इस वक्त को बीएसएनएल का सुनहरा दौर बताते हैं जब हर कोई बीएसएनएल का सिम चाहता था और कंपनी के पास 35 हज़ार करोड़ तक का कैश रिज़र्व था, जान-पहचान वाले बीएसएनएल सिम के लिए मिन्नतें करते थे.

लाल फ़ीताशाही

बीएसएनएल कर्मचारी और अधिकारी 2006-12 के वक्त को आज की बीएसएनएल की स्थिति से सीधा जोड़ते हैं.

ये वो वक़्त था जब मोबाइल सेगमेंट में जबर्दस्त उछाल था लेकिन बीएसएनएल लाल फ़ीताशाही में फंसी थी.

मार्केट में अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए बीएसएनएल के लिए ज़रूरी था कि वो जल्द फ़ैसले ले, नये उपकरण ख़रीदे.

निजी कंपनियां जहां ऐसे फ़ैसले तुरंत ले लेती थीं, सरकारी कंपनी होने के कारण जहां बीएसएनएल के लिए टेंडर की प्रक्रिया पूरे होने में महीनों लग जाते थे.

एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ना लेने की शर्त पर बताया कि वो बीएसएनएल के विस्तार का छठा चरण था. उस वक्त भारत में करीब 22 करोड़ मोबाइल कनेक्शंस में बीएसएनएल का मार्केट शेयर 22 प्रतिशत था.

वो बताते हैं, “कंपनी ने 93 मिलियन लाइंस क्षमता बढ़ाने के लिए टेंडर निकाला लेकिन किसी न किसी कारण से उसमें महीनों लग गये. कभी भ्रष्टाचार के आरोप से देरी होती, कभी किसी और कारण से. नतीजा ये हुआ कि 2006-12 के बीच बीएसएनएल की क्षमता में जहां मामूली इज़ाफ़ा हुआ, कंपनी के मार्केट शेयर में गिरावट आयी जबकि निजी ऑपरेटर्स आगे निकल गये.”

वो कहते हैं, “उस वक्त कंपनी के कर्मचारियों, अधिकारियों में बेचैनी थी. हम सोचते थे हम क्यों पीछे छूट रहे हैं. लोगों ने नेटवर्क कंजेशन और अन्य समस्याओं के कारण बीएसएनएल छोड़ निजी कंपनियों की ओर रुख किया.”

लोग बीएसएनएल की सेवा से बेहद नाराज़ थे.

उसी दौरान बीएसएनएल के पी अभिमन्यु अहमदाबाद गये. शाम को उनकी तबीयत गड़बड़ायी तो उन्हें डॉक्टर के पास ले जाया गया.

बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन के महासचिव पी अभिमन्यु बताते हैं, “डॉक्टर ने मुझसे कहा, आप पहले मेरी मदद करिए, तब मैं आपकी मदद करूंगा. मेरे पास बीएसएनएल मोबाइल है. कॉल सुनने के लिए मुझे सड़क पर जाना पड़ता है, चिल्ला कर बात करनी पड़ती है. आप पहले मेरी समस्या का समाधान करिए.”

एक्सपर्ट बताते हैं कि इस दौर में मंत्रालय से भी सहमति आने में भी वक़्त लग रहा था.

टेलिकॉम सेक्टर मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर सूर्या महादेवन के मुताबिक़ स्थिति इतनी बिगड़ी कि बाज़ार में एक सोच ऐसी भी थी कि मंत्रालय में कुछ लोग कथित तौर पर चाहते थे कि बीएसएनएल का मार्केट शेयर गिरे ताकि निजी ऑपरेटरों को फ़ायदा पहुंचे.

दयानिधि मारन साल 2004-07 संचार मंत्री रहे जबकि उनके बाद ए राजा 2007-10 तक.

बीएसएनएल की ख़राब हालत पर ए. राजा से तो संपर्क नहीं हो पाया लेकिन संचार मंत्री रहे दयानिधि मारन कहते हैं, “मेरे वक़्त में बीएसएनएल फलफूल रही थी. बीएसएनएल बोर्ड के पास कोई भी निर्णय लेने के पूरे अधिकार थे. वो बीएसएनएल का सबसे बेहतरीन समय था और उसका विस्तार हो रहा था. मेरे वक़्त एक भी टेंडर कैंसल नहीं हुआ. किसी के पास ये साबित करने के लिए एक भी काग़ज़ है क्या? मेरे वक्त एक निजी आपरेटर बीएसएनएल को टेकओवर करना चाहता था तो हमने उस पर जुर्माना लगाया.”

मारन इन आरोपों का खंडन करते हैं कि सरकार निजी ऑपरेटरों के प्रभाव में काम कर रही थी.

दयानिधि मारन ने कहा, ‘मेरे वक़्त के दौरान बीएसएनएल एग्रेसिव थी और प्राइवेट ऑपरेटर भाग रहे थे.’

मारन पर चेन्नई में अपने घर पर बीएसएनएल लाइंस के ग़ैरक़ानूनी दुरुपयोग के आरोप भी लगे लेकिन दयानिधि मारन उन्हें ‘राजनीति से प्रेरित बताते हैं जहां उन्हें बदनाम करने कोशिश की गयी.’

मामला अदालत में है.

साल 2010 का 3जी ऑक्शन

साल 2010 में 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई, जिसमें सरकारी कंपनी होने के कारण बीएसएनएल ने हिस्सा नहीं लिया.

बीएसएनएल को पूरे देश के लिए स्पेक्ट्रम तो मिले लेकिन जिस दाम पर निजी कंपनियों ने नीलामी में स्पेक्ट्रम खरीदे थे, बीएसएनएल से कहा गया कि वो भी वही दाम दे.

साथ ही बीएसएनएल को वायमैक्स तकनीक पर आधारित ब्रॉडबैंड वायरेलस ऐक्सेस (बीडब्ल्यूए) स्पेक्ट्रम के लिए भी भारी रक़म देनी पड़ी.

इसका असर एमएटीएनएल और बीएसएनएल की आर्थिक स्थिति पर पड़ा.

एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस कारण बीएसएनएल ने इस नीलामी में 17,000 से 18,000 करोड़ खर्च किये जिससे उसका खज़ाना खाली हो गया, जबकि एमटीएनएल को तो कर्ज़ लेना पड़ा जिसे चुकाने के लिए उसे 100 करोड़ रुपये महीना देना पड़ता था.

उम्मीद की किरण

पूर्व अधिकारियों के मुताबिक साल 2014 से 2017 बीएसएनएल के लिए थोड़ी उम्मीद का दौर था जब बीएसएनएल ने “ऑपरेटिंग प्रॉफिट्स” कमाये और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बीएसएनएल के “ऑपरेटिंग मुनाफ़े” का ज़िक्र किया.

बीएसएनएल के पूर्व प्रमुख अनुपम श्रीवास्तव के मुताबिक, “साल 2014-15 में बीएसएनएल का ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट 67 करोड़ रुपये, साल 2015-16 में 2,000 करोड़ रुपये और साल 2016-17 में 2,500 करोड़ रुपये था. साथ ही 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी जब लाल किले की प्राचीर से बीएसएनएल की सफ़लता का उल्लेख किया तो वो बीएसएनएल के बेहतर दिनों के आगमन का संकेत था.”

इसके अलावा बीएसएनएल और एमटीएनएल ने बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम सरेंडर किया, जिससे उसे सरकार से पैसे मिले और उसकी बिगड़ती आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर हुई.

उधर पूर्व बीएसएनएल अधिकारी विमल वाखलू ने कहा कि आपरेटिंग मुनाफ़े की बात करना किसी मज़ाक की तरह है क्योंकि इस आंकड़े पर पहुंचते वक्त उपकरणों के डेप्रिसिएशन या अवमूल्यन (घटती कीमत) को ध्यान में नहीं रखा गया.

अनुपम श्रीवास्तव इससे सहमत नहीं और कहते हैं कि ऑपरेटिंग मुनाफ़ा निकालते वक्त डेप्रिसिएशन के बारे में सोचा गया था. उनके मुताबिक बीएसएनएल की अकाउंटिंग प्रक्रिया आला दर्जे की है.

जियो का आगमन

बाज़ार में रिलायंस जियो का आना एक गेम चेंजर था जिससे बाज़ार की सभी टेलिकॉम कंपनियों पर भी असर पड़ा.

जहां बीएसएनएल का एक वर्ग अपनी हालत के लिए जियो को ज़िम्मेदार ठहराता है, एक दूसरे वर्ग इससे सहमत नहीं.

बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन के पी अभिमन्यू बीएसएनएल की आथिक स्थिति के लिए जियो की प्राइसिंग स्ट्रैटजी और नीतिकर्तांओं पर कंपनी के कथित प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं जिस कारण एअरसेल, टाटा टेलिसर्विसेज़, रिलायंस इन्फ़ोकॉम, टेलिनॉर जैसी मध्यम या छोटी टेलिकॉम कंपनियां बंद हो गयीं.

उधर पूर्व बीएसएनएल अधिकारी विमल वाखलू के मुताबिक “बीएसएनएल और एमटीएनएल को जियो से कोई चुनौती नहीं मिली. जब जियो ने अपने सेवाएं शुरू कीं, उनकी हालत पहले ही खराब थी. कई लोग जियो को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.”

एक पूर्व बीएसएनएल अधिकारी के मुताबिक जियो ने अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए बड़ी रक़म लगायी है तो किसने दूसरी कंपनियों को इतने बड़े निवेश से रोका है.

4जी स्पेक्ट्रम नीलामी

आश्चर्य की बात कि जब दुनिया 5जी स्पेक्ट्रम की ओर बढ़ रही है, बीएसएनएल के पास 4जी स्पेक्ट्रम नहीं है.

अधिकारियों के मुताबिक जब 2016 में 4जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई तो फिर बीएसएनएल को बाहर रखा गया.

एक अधिकारी के मुताबिक बीएसएनएल मैनेजमेंट ने इस बारे में सरकार का ध्यान खींचने के लिए 17 पत्र लिखे लेकिन चीज़ें नहीं बदलीं.

अधिकारी के मुताबिक, “फ़ाइल दफ़्तर में घूमती रही. फ़ाइल आगे क्यों नहीं बढ़ी इसके बहुत से कारण हो सकते हैं.”

दयानिधि मारन के मुताबिक कि बीएसएनएल की हालत ख़राब होने का कारण है कि उसे 4G स्पेक्ट्रम नहीं दिया गया. सरकार नहीं चाहती कि बीएसएनएल निजी आपरेटर्स के साथ मुक़ाबला करे. सरकार उसका गला घोंटना चाहती है.

ये कहानी लिखते वक्त उस वक्त के टेलीकॉम मंत्री रहे मनोज सिन्हा से संपर्क नहीं हो सका. अगर उनसे बात हो पायी तो हम इसे अपडेट करेंगे.

एक सोच है कि बीएसएनएल को अब सीधा 5जी के बारे में सोचना चाहिए लेकिन अधिकारी के मुताबिक 5जी का रास्ता 4जी से होकर ही जाता है ताकि सिस्टम के नेटवर्क और उपकरणों को 5जी के लिए तैयार किया जा सके.

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बीएसएनएल का भविष्य

एक पूर्व अधिकारी नाम ना लेने की शर्त पर बताते हैं बीएसएनएल में काम करने की स्वतंत्रता नहीं और वो खुद को बंधा महसूस करते हैं, जैसे और बीएसएनएल के विस्तार को लेकर होने वाले खर्च के प्रस्ताव सरकार के पास लंबे समय तक बिना किसी फ़ैसले के लटके रहते हैं.

इसलिए ज़रूरत है काम के तरीके को सुधारने की.

बीएसएनएल के पहले प्रमुख डॉक्टर डीपीएस सेठ से लेकर आज के अधिकारी मानते हैं बीएसएनएल को सरकारी मदद की ज़रूरत है, कम से कम कुछ महीनों की.

बीएसएनएल अधिकारियों के मुताबिक बीएसएनएल के पास देश के अलग अलग जगहों पर ज़मीन है जिसकी बाज़ार में कीमत एक लाख करोड़ के आसपास है, 20,000 करोड़ रुपये के टॉवर्स हैं और 64,000 करोड़ रुपए के ऑप्टिकल फाइबर्स हैं जिनकी लंबाई करीब आठ लाख किलोमीटर है. और ज़रूरत पड़ने पर इससे पैसा बनाया जा सकता है.

अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं, “भारत जैसे देश में एक पब्लिक सेक्टर ऑपरेटर की ज़रूरत है ताकि बाज़ार में एक सरकारी संस्था की उपस्थिति और संतुलन रहे.”

उधर प्रोफ़ेसर सूर्य महादेवन बीएसएनएल के निजीकरण के पक्ष में हैं.

वो कहते हैं, बीएसएनएल को आप जितना लंबा चलायेंगे, उसे उतना घाटा होगा. बीएसएनएल में कोई जवाबदेही नहीं है. न किसी को अच्छे काम के लिए ईनाम मिलता है न बुरे काम के लिए सज़ा. बहुत सी हमारी सरकारी संस्थाएं तभी काम करती हैं जब उन्हें बचा  कर रखा जाए, उन्हें प्रतियोगिता से बाहर रखा जाये, और उनके सामने कोई चुनौती न हो.”

दयानिधि मारन कहते हैं कि वो निजीकरण के पक्ष में नहीं हैं लेकिन बीएसएनएल को ऐसा माहौल दिया जाना चाहिए ताकि वो निजी कंपनियों के साथ मुक़ाबला कर सके.

उधर बीएसएनएल मैनेजमेंट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कंपनी को बचाने के लिए “सर्वाइवल प्लान” पर सरकार काम कर रही है और इससे ज्यादा वो कुछ नहीं कह सकते.

(बीबीसी से साभार)

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