
Bokaro: गले में लटका ‘आला’ चिकित्सकों की एक पहचान होती है. लेकिन कोरोना संकट के वक्त यह पहचान भी अब खोने की कगार पर है. अब संक्रमण से बचने के लिए बीजीएच के डाक्टरों ने कोरोना मरीजों की डॉक्टरी जांच के लिए दो सौ साल पुरानी विधि अपनायी है.

दरअसल 200 साल पहले भी डॉक्टर्स ऐसी ही विधि से लोगों का इलाज करते थे. इसके पहले चिकित्सक अपने कान को सीधे मरीज़ की छाती लगा कर सुनते थे. सन 1816 में फ्रांस के चिकित्सक रेन लेनेक ने पहली बार एक नई युक्ति लगाई. उन्होंने खोखली लकड़ी की दो नलियों को पीतल के एक कपलिंग से जोड़कर (जैसा कि पुरातन टेलीस्कोप में होता था) दुनिया का पहला डॉक्टरी आला बनाया. उन्होंने अपने अनुभवों को सन 1519 में प्रकाशित भी किया.
इसे भी पढ़ेंःजानिए झारखंड के उन दो डॉक्टर्स को जो प्रोफेशन से ऊपर उठकर कर रहे पब्लिक और सरकार की मदद
कालांतर में जैसे-जैसे विज्ञान आगे विकसित होता गया वैसे-वैसे हमारा यह “आला” भी विकसित होता गया, और यह एक प्रकार से डाक्टरों की पहचान बन गया. अब तो कई डिजिटल स्टेथोस्कॉप भी आ गए हैं जिसके द्वारा मोबाईल से ही हार्ट और फेफड़े के साउंड्स को रिकॉर्ड किया जा सकता है.

जब बीजीएच में गत रविवार को बोकारो के एकमात्र और झारखंड के तीसरे मरीज़ को भर्ती करना पड़ा तो चिकित्सों के सामने यह प्रश्न था कि उक्त मरीज़ की जांच कैसे की जाए, खासकर जब चिकित्सक सिर से पैर तक पीपीई के गाऊन से ढके होते हैं और उनका कान भी ढका रहता है और आमतौर पर उपयोग में आने वाले रबर ट्यूब के बने आले का उपयोग नहीं कर सकते.
ऐसे में हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ० सतीश कुमार, जिनके यूनिट में उक्त मरीज़ भर्ती है, ने सबों के सामने यह प्रस्ताव रखा कि अभी की घड़ी में, जब पूरे विश्व भर में ऐसा देखा जा रहा है कि मेडिकल स्टाफ कोरोना के संक्रमण से पीड़ित हो रहे हैं, रेन लैनेक साहब की पुरानी युक्ति काफी मददगार साबित हो सकती है (खासकर जब डाक्टरों का सर और कान भी ढका होता है और अपने आले को वो इनफेक्ट भी नहीं होने देना चाहते हैं ताकि कोरोना का इंफेक्शन उसके द्वारा उन्हें या किसी दूसरे आदमी को नहीं लगे).
यह डीएमएस इंचार्ज डॉ. एके सिंह सहित डॉक्टरों की पूरी टीम को पसंद आई और उन्होंने कार्ड बोर्ड के बने शटल कोर्क के डिब्बे को, जो करीब सवा फुट का होता है, इसके लिए उपयुक्त पाया. इसे फिलहाल आइसोलेशन वार्ड में उपयोग भी किया जाने लगा है.
बीजीएच के कोविड वार्ड में एक पोर्टेबल डिजिटल एक्स-रे और पैक्स सिस्टम भी स्थापित किया गया है, जिस से उक्त आले से कोई छाती में गड़बड़ी का संदेह होने पर तुरंत जांच की जा सके.
इसे भी पढ़ेंःरांची के हिन्दपीढ़ी इलाके के लोग क्यों जला रहे अखबारों को !




