Opinion

रांची के हिन्दपीढ़ी इलाके के लोग क्यों जला रहे अखबारों को !

Surjit Singh

झारखंड में फेसबुक पर एक पोस्ट वायरल है. अखबार को जलाने का.  किसी एक अखबार को नहीं. रांची से छपने वाले सभी प्रमुख अखबारों को. यह पोस्ट Muslims of ranchi  नामक कम्यूनिटी पेज से जारी किया गया है.

अखिर क्यों ?

क्या अखबार और एक खास तबके  के लोगों के बीच की अविश्वास की खाई इतनी बढ़ गई है, नौबत यहां तक पहुंच गयी ?

आखिर रांची के एक खास तबके  के लोगों में मीडिया के प्रति इतनी नाराजगी क्यों है ?

इतना गुस्सा क्यों है कि वह अखबारों का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं ?

क्या, जैसा कि आरोप है मीडिया का एक हिस्सा भी अब सिर्फ खबर से ताल्लुक नहीं रखता, उनकी सोच बदल गयी है ?

या हिन्दपीढ़ी वाले मामले में “मीडिया” को गुमराह किया गया ?

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हिन्दपीढ़ी मुहल्ले के लोगों ने आरोप लगाया है कि मीडिया के द्वारा मुहल्ले को बदनाम किया जा रहा है ?

हिन्दपीढ़ी, वही मुहल्ला है, जहां की एक मसजिद से पिछले दिनों तबलीगी जमात के लोगों को निकाला गया था. जमात में शामिल मलेशियाई महिला को कोरोना पॉजिटिव पाया गया था. जिसके बाद से हिन्दपीढ़ी इलाके के कुल सात लोग कोरोना पोजिटिव पाये गये हैं.

अब यह जानना जरूरी है कि 9 अप्रैल को ऐसी कौन सी खबर अखबारों में छपी, जिससे लोग इतने नाराज हैं. खबर थीः 8 अप्रैल को नगर निगम के सफाईकर्मियों के वाहनों पर मुहल्ले के लोगों के द्वारा कथित रूप से थूके जाने की.  गौर करियेगा, किसी भी अखबार की खबर में “कथित” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था.

अधिकांश अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया. 10 अप्रैल को हिन्दपीढ़ी के लोगों ने इस तरह की किसी घटना के होने से इंकार किया. साथ ही मांग की कि जिस कर्मचारी पर थूका गया है, उससे पूछा जाये कि कहां और किस वक्त की घटना है. स्थानीय लोगों ने निगम के सफाईकर्मी और मीडिया पर मुहल्ले को बदनाम करने का भी आरोप लगाया है.

11 अप्रैल को “दैनिक जागरण” में खबर है कि पुलिस ने थूकनेवाले मामले की जांच की और जांच में आरोप को गलत पाया है. हालांकि खबर में किसी अधिकारी का बयान नहीं है. फिर भी यह सवाल तो उठता ही है ना कि क्या सफाईकर्मियों ने जानबूझ कर इस तरह की अफवाह उड़ायी.

हिन्दपीढ़ी के लोग किसी साजिश की बात कर रहे हैं. तो क्या सच में हिन्दपीढ़ी को लेकर कोई तबका साजिश कर रहा है. अगर साजिश है, तो प्रशासन को ऐसे लोगों की खोज कर सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है. ताकि भविष्य में कोई इस तरह की बात करके समाज को तोड़ने का काम ना कर सके.

तो क्या सिर्फ इस खबर की वजह से लोग नाराज हो गये और 10 अप्रैल की शाम होते-होते अखबारों को जलाने की तसवीरें सोशल मीडिया पर घूमने लगीं.

अगर, आप ऐसा सोच रहे हैं, तो शायद गलत सोच रहे हैं. बात कुछ ज्यादा ही गंभीर है. देश के कुछ टीवी चैनलों के द्वारा एक खास तबके के खिलाफ लगातार खबरें चलायी जा रही हैं. किसी भी गलती के लिए व्यक्ति के बजाय उस समुदाय को ही खराब बताने की होर मची हुई है. इन वजहों से इस खास तबके के लोगों में मीडिया के प्रति खराब नजरिया बन गया है.

बात रांची की करें तो 11 अप्रैल के अखबारों में हिन्दपीढ़ी के लोगों द्वारा अखबारों को जलाने की खबर किसी भी अखबार नहीं छपी है. आखिर, इसे छिपाने की जरूरत क्यों पड़ रही अखबारों को.

देश, राज्य या रांची शहर में अखबार जलाने की यह पहली घटना नहीं है. पहले भी नाराज लोग अखबार जलाते थे, जिसकी खबर भी छपती रही है.

हां, तब ऐसा करनेवाले लोग छोटे समूह में होते थे और सभी अखबार के बदले कोई एक अखबार निशाने पर होता था. तब तो वही अखबार प्रमुखता से जलाने की खबर को प्रकाशित करता था. फिर 10 अप्रैल की शाम को दर्जनों लोगों द्वारा अखबार जलाने की घटना को छिपाने की क्या जरूरत क्यों पड़ गयी.

अब उस खबर का जिक्र जो 10 अप्रैल को अखबारों में छपा. सभी अखबारों में नगर निगम के सीईओ मनोज कुमार, रांची की मेयर आशा लकड़ा या किसी अन्य सरकारी व्यक्ति का बयान को लगा कर खबर को पुष्ट करने की कोशिश की गयी थी.

किसी भी अखबार में हिन्दपीढ़ी के लोगों या पार्षदों का बयान लेना जरूरी नहीं समझा गया. अगर बात की जाती तो निश्चित रूप से घटना पर संदेह होता. तब खबरों में घटना को भले ही असत्य ना बताया जाता, लेकिन खबर में “कथित” शब्द का इस्तेमाल जरूर होता.

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मेयर का काम शहर की साफ-सफाई सुनिश्चित करना है. मेयर बनने के बाद इस काम में उनसे दलीय, सामाजिक, जातीय या धार्मिक राजनीति की उम्मीद नहीं की जाती.  शनिवार को अखबारों में उनका बयान छपा हैः हिन्दपीढ़ी में सफाईकर्मियों के साथ पुलिस का बाईक दस्ता तैनात किया जाये. ताकि सफाईकर्मी बिना डर भय के घर-घर में अपना काम कर सकें. उनकी यह मांग जायज है. पर उनके बयान में यह भी चेतावनी है कि अगर प्रशासन मदद नहीं करेगा तो सफाईकर्मी हिन्दपीढ़ी इलाके में काम पर नहीं जायेंगे. उनकी यह चेतावनी उनके राजनीतिक उद्देश्यों को सामने ला रही है.

संभव है अखबार जलानेवाले कल को फिर से अखबार खरीद कर, फिर से पढ़ना भी शुरू कर दें. पर मीडिया और एक खास वर्ग के लोगों के बीच जो अविश्वास बना है, वह खत्म हो जायेगा, इसकी उम्मीद लंबे समय तक तो नहीं की जा सकती है.

मीडिया में काम करनेवाले लोग किस दौर में पहुंच चुके हैं, इसका अंदाजा कुछ पत्रकारों के फेसबुक वॉल को देख कर लगा सकते हैं. माना हर आम व्यक्ति की तरह ही पत्रकारों का फेसबुक वॉल उनकी पर्सनल च्वाइस, निजी विचार हो सकता है. पर अगर किसी का निजी विचार भी एकतरफा नजर आने लगे, सामाजिक, जातीय या धार्मिक कट्टरता वाला हो, तो उसकी झलक उसकी रिपोर्ट में भी जरूर दिखेगी.

ऐसी स्थिति में मीडिया संस्थानों की भूमिका चुनौतीपूर्ण हो जाती है. क्योंकि पत्रकार ही संस्थान के आंख-कान-नाक होते हैं. जरूरत है मीडिया संस्थान अपने-अपने संस्थानों मे पत्रकारों को बतायें-सिखायें कि आप पत्रकार हैं. खबर करना आपका धर्म है. खबर पर सोंच को हावी ना होने दें. एकतरफा सोच खत्म करें. नहीं तो यह एक दिन उन्हें खत्म कर देगा.

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