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अब आदिवासी समाज को अपने पक्ष में करने के लिए संघर्ष कर रही है भाजपा

Faisal Anurag

झारखंड में आदिवासियों को अपने पाले में लाने का राजनीतिक संघर्ष तेज होता जा रहा है. राज्य की इस सबसे बड़ी आबादी के सहारे राजनीतिक कामयाबियों को हासिल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी का आक्रामक रुझान उसकी गतिविधियों से स्पष्ट है. आदिवासी समाजों के अंदर अनेक तरह की सामाजिक-राजनीतिक प्रवृतियां और उसकी अभिव्यक्ति है. पिछले कई दशकों से देखा जा रहा है कि आदिवासी समाज का बहुमत किसी भी एक राजनीतिक दल के साथ नहीं है. समय-समय पर वह जरूरतों के मुताबिक राजनीतिक निर्णय लेता रहा है.

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लोकसभा चुनाव में आदिवासी वोटों के रुझान का विश्लेषण भी बताता है कि अलग तरह से अलग-अलग क्षेत्रों में वह मौजूद रहा है. विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दल इस बात के लिए आशवस्त नहीं हैं कि उनका रुझान तब तक क्या रुख प्रदर्शित करेगा.

भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासी समाज के भीतर अपनी पैंठ बनाने के लिए कई तरह के कदम उठाये हैं. इसमें विभिन्न आदिवासी समाजों के अंतरविरोध को तेज करना एक है. ईसाई चर्च के खिलाफ जिस तरह की आक्रामकता भाजपा ने दिखायी है दरअसल वह आदिवासी समाज के गैर चर्च तबके को अपनी तरफ करने की कोशिश का हिस्सा है. पिछले कई दिनों से भाजपा की कई अनुषंगी संगठनों के बयान इस बात की पुष्टि करते हैं.

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सरकार के स्तर पर भी मुख्यमंत्री एक तरफ आदिवासियों, आर्थिक हितों पर जिस तरह की घोषणा कर रहे हैं, उसका भी संदेश यही है. मुख्यमंत्री की घोषणा है कि नये उद्योगों के लिए आदिवासियों को सरकार कई  तरह की सुविधा देगी. इसमें आधी कीमत पर जमीन का वायदा भी है. भाजपा के एक राज्यसभा सदस्य ने तो चर्च की जमीन को लेकर जिस तरह का अभियान तेज किया है, वह भी इसी का संकेत देता है. भाजपा की रणनीति यह दिख रही है कि सरकार के स्तर पर आदिवासियों के लिए आर्थिक वायदे किये जायेंगे और संगठन के स्तर पर लोगों के अंतरविरोधों को तेज करने के लिए अभियान चलाया जायेगा.

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आदिवासियों पर राजनीतिक कब्जे का संघर्ष नया नहीं है. झारखंड के गठन के बाद देखा गया है कि आदिवासियों की राजनीतिक अभिव्यक्ति अनेक तरीकों से होती रही है. चूंकि आदिवासी समूहों के बीच कई सवालों को ले कर आंदोलन होता रहा है. पिछले पांच सालों में भी आदिवासी असंतोष उभरा है. इसका स्वर भी सरकार विरोधी रहा है. आदिवासी आक्रोश लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला है. आदिवासियों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों के वोट शेयर का प्रतिशत इस तथ्य की पुष्टि करता है.

भारतीय जनता पार्टी को किसी भी आदिवासी लोकसभा क्षेत्र में कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा है. भाजपा समझ रही है कि विधानसभा और  लोकसभा चुनाव के समय वोटरों का रुझान भी एक जैसा नहीं होता है. यही कारण है कि उसने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 28 क्षेत्रों के लिए विषेश अभियान तेज कर दिया हे. हालांकि उसे यह भी मालूम है कि इन इलाकों में आदिवासी आक्रोश के कारण आदिवासियों के अनेक अंतरविरोधों की दीवार दरक गयी है. यही कारण है कि भाजपा गैर ईसाई आदिवासियों पर विशेष फोकस किये हुए है.

भाजपा के कई अनुषंगी संगठन आदिवासियों के भीतर इस तरह की राजनीति को अंजाम देने की कोशिश कर रही है जिससे उनमें आपसी सामाजिक सौहार्द कमजोर है. ओडिशा के आदिवासी इलाकों में भाजपा के इस तरह के प्रयोग सफल रहे हैं. झारखंड में पहले से ही भाजपा की रणनीति का यह हिस्सा रहा है. लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव के पहले उसे लग रहा है कि तमाम विकास संबंधी दावों के बाद भी आदिवासी वोट उसके लिए टेकेन फोर ग्रांटेड जैसा नहीं है.

पिछले पांच सालों में झारखंड सरकार की नीतियां आदिवासी इलाकों के संसाधनों को कारपारेट घरानों को देने की है. छत्तीसगढ़ में आदिवासी क्षेत्रों में इस तरह की नीति से उसे भारी नुकसान विधानसभा चुनाव में उठाना पडा. इस कारण भाजपा की 15 साल की सरकार को सत्ता से बाहर होना पडा. लोकसभ चुनाव में भी आदिवासियों का भाजपा विरोधी रुख दिखा. यही कारण है कि बस्तर के इलाके में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा. झारखंड के आदिवासियों का संघर्ष तीक्ष्ण है.

आदिवासी अपनी अस्मिता, संस्कृति और संसाधन पर समूह के सवाल पर उठ खड़े होते हैं. तमाम बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ झारखंड में आदिवासी प्रतिरोध का स्वर है. इसके साथ ही संविधान के कई मूल्यों, आर्टिकल और अनुच्छेद को लेकर भी आदिवासियों का आंदोलन जारी ही है. इसमें पांचवी अनुसूची ओर पेसा एक्ट के तहत अधिकार का संघर्ष व्यापक है. पिछले पांच सालों में इन सवालों ने राजनीतिक तेवर ले लिया है. भाजपा के भीतर का डर इस कारण ही है. भाजपा का मुख्य वोट आधार और आदिवाससियों के अधिकार के सवाल को ले कर भारी अंतरविराध दिखता रहा है. अब भी भाजपा की मुख्यधारा की राजनीति में आदिवासी अस्मिता की बात करने वालों के लिए जगह नहीं दिखती है.

लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि गैर आदिवासी क्षेत्रों के वोट शेयर की तुलना में उसे आदिवासी क्षेत्रों में कम वोट मिले हैं. भाजपा अपनी नई रणनीति से आदिवासी क्षेत्रों में विधानसभा चुनाव में अपना वोट शेयर बढ़ाने के लिए इस तरह की आक्रामक नीतियों का सहारा ले रही है.

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