न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में हम इमरजेंसी से क्या सबक ले सकते हैं

1,277

Faisal Anurag

mi banner add

नागरिकों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार भारत की राजनीति का एक ऐसा पहलू हैं, जो समय के साथ अपनी ताकत का बारबार अहसास करते हैं. इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी की घोषणा कर नागरिकों के जीने के अधिकार तक को जिस तरह खत्म करने का प्रयास किया था उसे देश ने अस्वीकार कर दिया. मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत से न केवल इंदिरा गांधी को सत्ता से बंदखल किया बल्कि यह संदेश भी दिया कि भारत का संविधान और जनगण की स्वतंत्रता लोकतंत्र में सर्वोपरि है. संविधान का बेजा इस्तेमाल किसी भी हालत में जनता के लिए ग्राह्य नहीं होगा. भारत के लोगों ने यह भी साबित किया कि यह संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं है बल्कि वह एक ऐसा जीवंत मूल्य है, जो लोकतांत्रिक चेतना का निरंतर विकास करता है.

इसे भी पढ़ेंः महामारियों से निपटने की सरकारों की तैयारी हमेशा निराशा ही बढ़ाती है

बावजूद इसके संविधान के साथ खिलवाड़ की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हो गयी है. भारत में शासकों के निरंकुश हो जाने की आशांका भी दस्तक देती ही रहती है. दुनिया के अनेक देशों का अनुभव बताता है कि लोकतंत्र और संविधान का गुणगान करते हुए शासक निरंकुश हो जाते हैं ओर लोकतंत्र की प्रक्रिया को ही बाधित कर देते हैं. भारत में लोकतंत्र के समक्ष यह चुनौती भी है. भारत के लोकतांत्रिक समाज को अभी पूरी तरह जीवंत होने में अनेक सामाजिक राजनीतिक बाधाओं से टकराना है. आर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी की बढ़ती खाई को पाटे बगैर समानतामूलक लोकतंत्र का निर्माण संभव नहीं है. और न ही संविधान की प्रस्तावना के मूल्यों को जीवन का हिस्सा बनाना.

इसे भी पढ़ेंः आखिर कितने बच्चों की मौत के बाद जागेगी समाज और व्यवस्था की संवेदना

लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं है. चुनाव लोकतंत्र का एक अहम मूल्य है. लेकिन लोकतंत्र की सीमाएं मानव समाज के समान लोकतांत्रिक संवेदना के निर्माण के साथ ही विस्तारित होती हैं. भारत के समाज के अंदर कई  तरह के ऐसे मूल्य हैं जो वर्चस्ववाद के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक विचारों को खाद पानी देते हैं. इमरजेंसी के खत्म होने के बाद हुए अनेक अध्ययनों में इस तरह की प्रवृतियों की पहचान की गयी थी. जिसमें सामाजिक निरंकुशता के तत्व मौजूद हैं. 44 सालों के बाद भी इन प्रवृतियों की मौजूदगी बनी हुई है. यही कारण है कि नागरिकों के एक तबके में एक सर्वसत्तावादी शासन की आकांक्षा प्रकट होती है और व्यक्ति पूजा की प्रवृति इस प्रवृति को घातक रूप देती है. इस प्रवृति के खिलाफ  डा. अंबेडकर की दी गयी चेतावनी अब भी भय पैदा करती है. अंबेडकर ने 9 दिसंबर 1946 को दिए गए अपने भाषण में इस चेतावनी को दिया था. उन्होंने तीन प्रमुख खतरों की विशेष रूप से पहचान की थी. एक तो लोकतंत्र में जनांदोलनों का का स्थान, दूसरा  करिश्माई नेताओं के अंधानुकरण की प्रवृति और तीसरा राजनीतिक लोकतंत्र की सीमाएं.

Related Posts

पलामू : बारिश थमते ही घटा कोयल का जलस्तर, मेदिनीनगर में चार दिनों से जलापूर्ति ठप

पंप के फुटबॉल तक पानी पहुंचाने के लिए पिछले 48 घंटे से चैनल खुदवाने का कार्य चल रहा है

आज के संदर्भ में भी ये तीनों प्रवृतियां स्पष्ट हैं. भारत का लोकतंत्र जिस तेजी से केवल राजनीतिक घेरे में बंद होता जा रहा है वह बेहद ही खरनाक है. कानून के बड़े जानकार मिहिर देसाई अनेक बार कह चुके हैं कि भारत में बिना अपातकाल घोषित किए भी अपातकाली अधिकारों का इस्तेमाल शासक कर सकते हैं. आज के हालात में जिस तरह संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण हुआ है उसके अनेक खतरे हैं. इसके साथ ही देश में जिस तरह असमहति के प्रति राजनीतिक हमले किए जा रहे हैं, वह संविधान की अभिव्यक्ति की आजादी को ही सीमित करता जा रहा है. अपातकाल की ही तरह जनांदोलनों के साथ जिस तरह का शासकीय व्यवहार है, उससे स्पष्ट है कि हालात गंभीर हैं.

अपातकाल का वास्तकिवक सबक तो यही है कि संविधान की प्रासतावना के मूल्यों की हर कीमत पर हिफाजत की जाए. संविधान के मूल्यों को को दिखवटी घेरे से बाहर शासकों और नागरिकों के लिए जीवंत मूल्य बना दिया जाए.  इस बात की संवैधानिक गारंटी किये जाने की भी जरूरत है कि संविधान संशोधनों के नाम पर किसी भी सूरत में संविधान के किसी भी अनुच्छेद या आर्टिकल की मूल भावना से बारीक छेड़छाड़ न हो. देश के अंदर ही संविधान की समीक्षा किये जाने की बात करने वाले वाली धारा भी मौजूद है. जस्टिस वेंकटचलैया के नेतृत्व में वाजपेयी सरकार के समय बना संविधान समीक्षा आयोग को लेकर अनके संदेह हैं. इस आयोग की राजनीतिक मंशा सवालों के घेरे में रही है. यह आशंका इसलिए भी बलवती रहती है क्योंकि संविधान समीक्षा कर बदलाव की मांग करने वाली राजनीतिक प्रवृति बारबार सिर उठाती है.

मौजूदा दौर में जब अपातकाल के दिनों को याद किया जाता है तो यह ताकत जरूरत मिलती है कि जनता भले ही मुखर न तो लेकिन वह आजादी के संघर्ष से पैदा हुए मूल्यों के अनुकूल भारत के निर्माण का स्वप्न देखती है. हालांकि 1975 के बाद अनेक राजनीतिक सामाजिक उतार-चढाव के दौर से देश गुजरा है. पीढ़ीगत आकांक्षाओं के नये बदलाव के दौर में अब भारत है. नयी पीढ़ी की आकांक्षाएं और सपने कई अर्थों में बहुत अलग हैं. लेकिन उनके भतर भी वर्चस्ववादी प्रवुतियों की कमजोरी मौजूद हैं. ऐसी स्थिति में व्यक्तिवाद का करिश्मा उन्हें ज्यादा आकर्षित कर रहा है. 2019 के चुनाव में इस आकर्षण की भी अहम भूमिका रही है. इस का यह अर्थ नहीं कि इस पीढ़ी के पास चेतना की कमी है. इस पीढ़ी में असीमित संभावना है. जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के साथ पुख्ता किया जाये और सामाजिक आर्थिक विषमताओं के साथ इतिहास की वर्चस्ववादी प्रवृतियों के संजाल को खत्म किया जाये. यह एक बड़ा  सामाजिक कर्म है. जिसकी कामयाबी राजनीति के लोकतांत्रिक प्रवृतियों को नया तेवर प्रदान करेगी. अपातकाल का सबक है कि समाज जितना लोकतांत्रिक समानता की ओर विकसित होगा देश में अपातकाल की संभावना उतनी ही कम होगी.

इसे भी पढ़ेंः प्राइवेट प्रैक्टिस करनेवालों की सूची सरकार के पास, एसीबी जांच के बाद होगी कार्रवाई

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
%d bloggers like this: