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चीफ जस्टिस गोगोई के लोकप्रियतावाद का खतरा संबंधी बयान के कई मायने  

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Faisal Anurag

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने लोकप्रियतावादी उभार को न्यायपालिका की स्वयत्तता और स्वतंत्रता को खतरे के रूप में रेखांकित कर एक नयी बहस की शुरूआत कर दी है. इस बहस का एक और कोण केंद्र के उस प्रस्ताव का भी है, जिसमें एक साथ देशभर में विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक समय करने के संबंध में है. 1967 के पहले तक देश के सभी राज्यों के विधानसभाओं का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही होता था. वह बैलेट पेपर का दौर था.

1967 के बाद अनेक विधान सभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ न हो कर अलग-अलग समय पर हुए हैं. चुनाव के समय के  अंतराल का कारण है, साझा सरकारों के दौर में अस्थायी गठबंधनों की विफलता, सरकारों की अस्थिरता और कई राज्यों में प्रेसिडेंट शासन को जबरन थोपा जाना.

भारत में धारा 356 का बेजा इस्तेमाल होता रहा है. सभी सरकारों ने प्रेसिडेंट रूल का राजनीतिक इस्तेमाल किया है. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले तक तो राज्य सरकारों की बर्खास्तगी आम बात थी. इस फैसले के बाद भी राज्य सरकारों को केंद्र की शासक पार्टी ने अपनी राजनीतिक मंशा और फायदे के लिए बर्खास्त किया है. अभी भी जम्मू और कश्मीर में विधानसभा भी है ओर प्रेसिडेंट रूल लगा हुआ है.

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इसी दौरान वहां स्थानीय निकायों के चुनाव भी हुए हैं और लोकसभा के भी. लेकिन विधानसभा में लोकप्रिय शासन की प्रक्रिया को बाधित ही रखा गया है. इसे लेकर अनेक राजनीतिक सवाल उठते रहे हैं.

भारत जैसे विविधता और बहुलतावादी जनतंत्र के लिए जरूरी है कि छोटे-बड़े सभी राजनीतिक दलों और विचारों की राय को महत्व दिया जाए. बहुमत का बेजा इस्तेमाल हमेशा घातक ही साबित होता है. राजनीतिक फैसले हड़बड़ी में नहीं किए जाने चाहिए. अभी चुनाव खत्म ही हुए हैं और व्यापक राजनीतिक सहमति के आधार पर ही राजनीतिक निर्णयों को अंजाम दिया जाना चाहिए. अनेक राजनीतिक दलों ने एक साथ चुनाव का विरोध किया है और कई दलों ने अभी अपनी कोई राय इस संदर्भ में प्रकट नहीं किया है.

सरकार के प्रस्ताव का समर्थन एनडीए के दायरे के दलों ने ही किया है. सरकार की ओर से इस तथ्य को यह रखना चाहिए कि विपक्ष की भी अपनी आवाज होती है. वह भले ही चुनाव नहीं जीत पाया हो, लेकिन इससे उसकी राजनीतिक हैसियत खत्म नहीं हो जाती है. प्रचंड बहुमतों की सरकार भी कई बार अपना कार्यकाल पूरा करने के पहले ही भारी विरोध का शिकार हुई हैं और अगले ही चुनाव में पराजित हुई हैं.

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1971 में प्रचंड जीत के साथ इंदिरा गांधी सत्ता में आयी थी, लेकिन 1973 के अंत तक उनके विरोध में देश में आंदोलन शुरू हो गया और 1977 में उन्हें सत्ता से बाहर भी होना पडा. 1984 में तो ऐतिहासिक जीत के बाद 1989 में राजीव गांधी सरकार से बाहर हो गए. इसे याद करने का अर्थ सिर्फ बहुमत का जनादेश बेहतर शासन के लिए होता है. किसी विचार को खत्म करने या संविधान के बेजा इस्तेमाल के लिए नहीं.

केंद्र सरकार को राजनीतिक विश्राम की एक लंबी प्रक्रिया के बाद ही एक साथ चुनाव के मामले में कदम बढ़ाना चाहिए. भारत में राज्यों की स्वायत्तता के सवाल को लेकर सरकारी आयोग बन चुका है और उसकी सिफारिशें मौजूद हैं. यह दीगर बात है कि उस सरकारी आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने का ईमानदार राजनीतिक प्रयास नहीं देखा गया. भारत के फेडरल ढांचे का हर हाल में संरक्षण जरूरी है. एक चुनाव की प्रक्रिया के नाम पर किसी भी तरह संविधान के बदलाव का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए.

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भविष्य के लिए यह कदम कतई भी सकारात्मक नहीं होगा. एक साथ चुनाव के लिए राजनीतिक सहमति से ही रास्ता निकलने की संभावना है. यह आशंका निराधार भी नहीं है कि वर्तमान दौर में संविधान की मूल भावनाओं के साथ किसी भी तरह का छेड़छाड़ संविधानवाद के लिए खतरनाक है.

इस तरह की आशंकाओं के बीच मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का यह भाषण बेहद गंभीर है, जो उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन के देशों के न्यायधीशों को संबोधित करते हुए दिया है. जस्टिस गोगोई  ने लोकप्रियतावाद के उभार को न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरनाक बताया है. उन्होंने कहा है कि बहुमत की सरकारों को यह लगता है कि जजों को बहुमत निर्वाचित नहीं करता है, लेकिन वे बहुमत की सरकारों के फैसलों को बदल देते हैं. उन्होंने कहा है कि न्यायपालिका को इन ताकतों के खिलाफ अपनी स्वतंत्रता और स्वयत्तता के लिए डटकर खड़ा होना चाहिए और उन्हें घुटना नहीं टेकना चाहिए. जैसा कि दुनिया के अनेक देशों में न्यायपालिका ने सरकारों के समक्ष किया है.

भारत के नए जनादेश के बाद ही जस्टिस गोगोई का यह बयान आया तो दुनियाभर की घटनाओं के सदर्भ में है, लेकिन इसके भारतीय संदर्भ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. भारत सरकार के मंत्रियों ने कोलेजियम के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका के संदर्भ में की गयी टिप्पणी प्रासंगिक होकर उभरती है. केंद्र के एक मंत्री ने कई बार जोर देकर कहा है कि कि अदालतों को चुनी गयी सरकार के फैसलों का आदर करना चाहिए.

उनके अनुसार अदालतों को अपने विवके और संविधान की मूल आत्मा की हिफाजत के अपने अधिकार के बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. भारत में अदालतों और सरकार के बीच का टकराव नया भी नहीं है. पिछले कुछ सालों में तो टकराव के सार्वजनिक होने के कई मामले सार्वजनिक भी हो चुके हैं. चार जजों की सार्वजनिक प्रेस वार्ता भी इसी का एक पहलू था.

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