
Dilip Kumar
Palamu: कोमल है कमजोर नहीं, इस शक्ति का नाम ही नारी है. इस ध्येय के साथ पलामू की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी कामयाबी का लोहा मना रही हैं. मकान बनाने का काम हो या फिर कल के भविष्य बच्चों को शिक्षा दे, उनके भविष्य को गढ़ने का. नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जिम्मेवारी निभाने, स्वरोजगार के साधन विकसित करने और इंटरनेशनल स्तर पर खेल प्रतिभा में अपना दमखम दिखाने में जिले की महिलाओं ने अपनी खास पहचान बन रखी हैं.
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नयना की लगान ने दिलाई पहचान

जिला मुख्यालय मेदिनीनगर निवासी जसविन्दर सिंह हैप्पी और हरजीत कौर की पुत्री नयना स्थानीय ब्राइट लैंड स्कूल में कक्षा दस की क्लास टीचर है. नयना की विलक्षणता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह हर महीने कुछ दिनों के लिए इंस्टीच्यूट ऑफ सिविल सर्विसेज (कोलकाता) में भी अपनी सेवा देती हैं. इस इंस्टीच्यूट में वह विद्यार्थियों को यूपीएससी परीक्षा के लिए तैयारी कराती हैं. नयना ने डालटनगंज में एक बुटिक की दुकान भी खोल रखी है, जहां वह अपने बचे समय का सदुपयोग करती हैं. कुल मिलाकर नयना ने लगन, ईमानदारी और निष्ठा से अपनी अलग पहचान बनायी है.
नयना का मानना है कि मुश्किल वक्त में भी हौसलों के सहारे आगे बढ़ा जा सकता है. वह कहती हैं कि महिलाओं का आत्मनिर्भर होना बेहद जरूरी है. वह कहती हैं कि महिलायें कार्यों को अधिक ईमानदारी से करती हैं, क्यांेकि वह अपेक्षाकृत ज्यादा संवदेनशील होती हैं. इस सवाल पर कि क्या पुरूष प्रधान समाज में उन्हंे कार्य करने में कभी दिक्कतें आयीं, नयना कहती हैं-नहीं. वह कहती हैं कि यह सच है कि ज्यादातर लोग दूसरों की तरक्की देखकर दुखी होते हैं लेकिन समाज में कई ऐसे भी लोग हैं, जो आपको आगे बढ़ाने में मदद करते हैं. वैसे भी अगर आपको आगे बढ़ना है तो आलोचकों को साथ रखना जरूरी है.
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केवल नयना ही नहीं, उनकी माता हरजीत कौर भी घर की दहलीज से बाहर निकल कर बुटिक के कारोबार में नयना का हाथ बंटाने लगी हैं. हरजीत कौर इसे सुखद अनुभव बताती हैं. उन्होंने कहा कि अब तो कई बार मेरे पिता को मेरे नाम से रेफर किया जाता है. यह मेरे लिए गर्व की बात है. महिलाएं किसी भी क्षेत्र पुरूषों से कम नहीं है. समाज ने भी अब इसे स्वीकार किया है.
महिला सब इंस्पेक्टर संभाल रही हैं उग्रवाद प्रभावित थाने की कमान

रौबदार ओहदे के साथ अपने हर काम को परफेक्ट कर अपनी एक पूरी यूनिट को साथ लेकर चलने का जज्बा देखना है तो महिला सब-इंस्पेक्टर नूतन मोदी को देखिये. इनके हवाले फिलवक्त उग्रवाद प्रभावित पाटन थाने की कमान है. नूतन मोदी का मानना है कि महिलाओं ने तो पहले ही साबित कर दिया है कि वे हर चैलेंज को पूरा कर सकती हैं. वे कहती हैं कि महिलाओं को चैलेंज तो हर जगह मिलते हैं, बस जरूरत है खुद के अंदर एक ऐसा आत्मविश्वास जगाने की, कि हम सबकुछ कर सकते हैं.
नूतन मोदी कहती हैं कि सिस्टम को जानने-समझने और गरीबों, असहायों, अभावग्रस्तों और पीड़ितों की सेवा करने का मौका पुलिस जॉब से बेहतर और कहीं नहीं मिल सकता. इतना ही नहीं इस जॉब में ग्राउंड जीरो से कुछ करने का मौका भी प्राप्त होता है. रेहला थाने की भी कमान संभाल चुकी नूतन मोदी कहती हैं कि अधिक से अधिक महिलाओं को पुलिस सेवा में आना चाहिए, ताकि समाज महिलाओं को कमजोर समझने की भूल न करे.
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वर्दी कभी महिला या पुरूष में फर्क नहीं करती. इसे पहनते ही हम सिर्फ फौजी हो जाते हैं. ऐसे में कोई भी चैलेंज पूरा करने में हिचकिचाहट भी नहीं होती, क्योंकि हमारी सोच ही महिला और पुरूषों में फर्क करती है.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जस्सी बिखेर रहीं जलवा

महिलाएं और लड़कियां किसी एक क्षेत्र में ही आगे नहीं बढ़ रही हैं. बल्कि उन्होंने हर मैदान फतह किया है. ऐसी ही एक लड़की है जस्सी सिंह, जिसने आत्मरक्षा के लिए कराटे का गुर सीखा और अब वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा बिखेर रही हैं.
पलामू जिले के जपला के एक छोटे से गांव में रहने वाले विपिन बिहारी सिंह और रेणु देवी की पुत्री जस्सी सिंह कराटे के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अब तक दर्जनों मेडल जीत चुकी हैं. डालटनगंज स्थित प्रतिष्ठत संत मरियम आवासीय विद्यालय में कक्षा छह में पढ़ने वाली जस्सी बेहद कम उम्र में कराटे की अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी बन गयी हैं. उनके कराटे प्रशिक्षक संतोष कुमार कहते हैं कि जस्सी विलक्षण प्रतिभा की धनी है.
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जस्सी सिंह ने अब तक आठ राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है और सभी में उसे गोल्ड मेडल हासिल हुआ है. इसके अलावा उसने दो इंटरनेशनल चैम्पियनशिप में भी भाग लिया. एक में जस्सी को गोल्ड मिला तो दूसरे में सिल्वर मेडल. जस्सी कराटे का एक वर्ल्ड कप भी खेल चुकी हैं. इसमें भी उसने अपनी प्रतिभा का लोहा मनाया और सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया.
शांति के हौसले को मिली उड़ान, बना डाले 150 मकान

जिले में महिला तरक्की की नयी इबारत लिखी जा रही है. इसकी एक नजीर है शांति देवी, जिसने अब तक 150 से ज्यादा मकानों की नींव रखी है. स्थानीय सुदना की रहने वाली 44 वर्षीया शांति देवी की पहचान आज एक कुशल रानी मिस्त्री के रूप में होती है. देखते ही देखते यह नाम हर किसी की जुबां में चढ़ गया है. यही वजह है कि चाहे शहर में शौचालय का निर्माण कराना हो या गगनचुम्बी इमारतों का, लोग शांति देवी की सेवा लेना चाहते हैं. रानी मिस्त्री शांति देवी भी एक नयी पहचान पाकर ‘रानी’ की तरह उत्साहित है. इसी का नतीजा है कि उसके हौसले बुलंद हैं. और वह सामाजिक बंधनों तथा परंपराओं से निकलकर खूबसूरत इमारतों को गढ़ने में जुटी हैं.
छत्तरपुर इलाके में रहने वाले राजेन्द्र प्रसाद की पत्नी शांति देवी रानी मिस्त्री के तौर पर अपने को स्थापित कर अपने तीन बच्चों का भरण-पोषण कर रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि शांति देवी एक-दो वर्ष से नहीं, बल्कि पूरे 19 साल से मकानों-भवनों का निर्माण कर रही हैं. फिलवक्त वह टीओपी-3 में एक चबूतरे के निर्माण में जुटी है. शहर के सुदना इलाके में अधिकतर घरों-मकानों का निर्माण शांति के हाथों ही हुआ है.
पलामू जैसा जिला जहां मानव तस्करी हमेशा से अभिशाप रहा है, वहां की महिलाओं के हौसलों को अगर इस प्रकार उड़ान मिलती रहे तो निश्चित तौर पर राज्य के दूसरे जिलों के लिए भी यह एक बेहतर उदाहरण हो सकता है.
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