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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष : जिंदगी का सफर मुश्किल था, मगर कभी हार नहीं मानी रजिया बेगम ने

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Manoj Dutt Dev

Latehar : यह सबकुछ आसान नहीं था. कम उम्र में शौहर की मौत. ऊपर से चार बच्चों की जिम्मेदारी. रोजगार करने पर सामाजिक दबाव. भूख से तड़पते बच्चों का बिलखना. इतना काफी था किसी के भी टूट जाने के लिए. मगर, रजिया नहीं टूटीं. मुश्किल समय में अपनी हिम्मत न खोकर अपने बच्चों की उच्च शिक्षा बरकरार रखते हुए लातेहार की रजिया बेगम ने जिंदगी के मुश्किल सफर को आसान कर दिखाया.

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पति की हत्या के बाद टूटा मुसीबतों का पहाड़

झारखंड राज्य के लातेहार जिला मुख्यालय की रहनेवाली रजिया बेगम की शादी बगल के पलामू जिला मुख्यालय के भट्टी मुहल्ले में रहनेवाले कमाल खान से वर्ष 1995 में हुई थी. शादी के बाद उन्हें तीन संतानें हुईं. कमाल खान स्वास्थ विभाग में दैनिक भत्ता पर कार्य कर अपना परिवार चलाते थे. कुछ समय के लिए कमाल खान ने स्वास्थ्य विभाग में ड्राइवर का भी काम किया, मगर कमाल के लिए परिवार चलाना मुश्किल हो रहा था. तभी वर्ष 2004 में कमाल रजिया और बच्चों के साथ लातेहार अपनी ससुराल में आकर रहने लगे और एनएच-75 पर चलनेवाली बसों में एजेंट का काम करने लगे. किसी तरह वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे. इस बीच लातेहार में उन्हें चौथी संतान भी हुई. हर दिन कमाल समय से घर से निकलते थे और समय से घर लौटते थे. कमाल के बढ़ते कदम से कुछ लोगों को परेशानी होने लगी और वर्ष 2005 में एक दिन दुश्मनों ने कमाल की हत्या कर दी. थाना में मामला दर्ज जरूर हुआ, मगर मामले का खुलासा नहीं हुआ. मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. रजिया इस मुश्किल घड़ी में टूटीं नहीं और न ही उन्होंने भीक मांगी. दूसरी शादी का सामाजिक और पारिवारिक दबाव जरूर बना, मगर उन्होंने दूसरी शादी भी नहीं की. जिंदगी का सफर मुशकिल था, मगर कभी हार नहीं मानी रजिया बेगम ने. उन्होंने वह कर दिखाया, जो उनके लिए बहुत कठिन था.

दूसरी शादी करती, तो बच्चों को मिलनेवाला प्यार शायद नहीं मिलता

रजिया बेगम ने न्यूज विंग के दूसरी शादी क्यों नहीं करने के सवाल पर बताया कि जब शौहर की हत्या हुई थी, तब उम्र बहुत कम थी. उस वक्त छोटा बेटा फरदीन चार-पांच माह का था. सामाजिक और पारिवारिक दबाव तो दूसरी शादी करने लिए जरूर बना था, मगर मैंने ठान लिया था कि किसी भी कीमत पर दूसरी शादी नहीं करूंगी. यदि कर ली होती, तो जो प्यार आज बच्चों को दे रही हूं, शायद वह प्यार इन्हें नहीं मिल पाता और बच्चे बड़े होते, तो उन पर भी कुप्रभाव पड़ता. इसलिए दूसरी शादी नहीं की. आज अपने दो बेटों मुस्तफा आलम (24), फरदीन (17) और दो बेटियों चांदनी परवीन (21) और गुलफ्शा परवीन (19) के साथ खुश हूं. सभी काम के साथ-साथ पढ़ाई कर रहे हैं.

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नहीं रुकने दी बच्चों की पढ़ाई, बच्चों ने भी खूब दिया साथ

रजिया बेगम ने बताया, “शौहर की जब हत्या हुई, उस वक्त बच्चे बहुत छोटे थे. फरदीन तो चार-पांच माह का था और गोद में ही रहता था. पैसों की बहुत किल्लत थी. मगर, किसी तरह अमवाटीकर सरकारी स्कूल में संयोजिका बनकर मध्याह्न भोजन बनाकर जीविकोपार्जन किया. मगर, समाज में मेरा काम करना लोगों को रास नहीं आया और मुझ पर काम छोड़ने का दबाव बनाया. मैंने काम छोड़ दिया. थोड़ी शिक्षित थी, इसलिए साक्षरता मिशन से जुड़ गयी. इससे जो कुछ मिलता था, उसी से गुजारा करती थी. बड़ा बेटा मुस्तफा आलम 12-13 वर्ष की उम्र में पढ़ाई के साथ-साथ एक निजी कपड़े की दुकान में काम करने लगा. थोड़ा पैसा वहां से भी आना शुरू हुआ. मगर दबाव में मुझे साक्षरता का भी काम छोड़ना पड़ा. मगर, मैं हारी नहीं. कुछ सपोर्ट मां-पिता से भी मिला. आज बेटा कपड़े की दुकान में काम करने के साथ-साथ बीए में पढ़ रहा है. बेटी चांदनी एमए कर रही है. साथ ही वह वी-मार्ट शॉपिंग मॉल में जनसंपर्क पदाधिकारी के पद पर है. गुलफ्शा परवीन बीए में पढ़ाई कर रही है. गुलफ्शा भी पढ़ाई के साथ-साथ एसजीआरएस कौशल विकास केंद्र में काम करती है. वहीं, छोटा बेटा सिर्फ पढ़ाई करता है. वह अभी 10वीं में है.

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नामुमकिन को मुमकिन किया है रजिया बेगम ने

बहुत ही छोटी सी उम्र में शादी और शादी के 11 वर्षों बाद पति की हत्या और साथ-साथ चार बच्चों के भरण-पोषण, पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी रजिया बेगम को तोड़ नहीं सकी. रजिया ने डटकर हर मुश्किल, हर मुसीबत का सामना किया. सामाजिक-पारिवारिक दबाव भी उनके मजबूत इरादे के सामने टिक न सका. रजिया ने अपनी हर निजी ख्वाहिश को कुर्बान कर अपने बच्चों को सही दिशा दी. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर इस मां को, इस नारी शक्ति को सलाम.

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