
Ranchi: झारखंड की गठबंधन की सरकार की गांठ अब ढीली पड़ चुकी है. राज्यसभा में झामुमो को अपना उम्मीदवार उतारना महंगा पड़ रहा है. कांग्रेसी नेताओं औऱ विधायकों के आक्रोश को देखते हुए प्रभारी अविनाश पांडेय ने एक-एक कर सभी नेताओं और विधायकों से बंद कमरे में बात की.
मंत्रियों को छोड़ कर विधायकों ने एक सुर से सरकार को बाहर से समर्थन देने की बात कही. यदि विधायकों की बात मानी गयी तो कांग्रेस के चारों मंत्री बन्ना गुप्ता, रामेश्वर उरांव, बादल पत्रलेख और आलमगीर आलम को अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना होगा. वो साधारण विधायक के तौर पर सरकार में शामिल रहेंगे. इस बात की आधिकारिक घोषणा कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडेय आलाकमान से हामी मिलने के बाद कर सकते हैं.
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दरअसल राज्यसभा में कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारना चाह रही थी. इस बाबत सीएम हेमंत सोरेन ने दिल्ली जाकर सोनिया गांधी से भी मुलाकात की थी. यह तय किया गया था कांग्रेस और झामुमो की तरफ से गुलाम नबी आजाद राज्यसभा के लिए उम्मीदवार होंगे. लेकिन दिल्ली से वापस आकर हेमंत सोरेन ने सबको चौंका दिया. उन्होंने अपनी पार्टी की तरफ से महुआ माजी के नाम पर मुहर लगा दी. जिसके बाद से राजनीतिक सर्गमी तेज हो गयी थी.
विधायकों ने प्रभारी को कहा- वापस लें समर्थन
झामुमो की तरफ से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा करने के बाद दिल्ली से झारखंड कांग्रेस के प्रभारी रांची पहुंचे. रांची पहुंच कर उन्होंने अपने सभी विधायकों से बारी-बारी बंद कमरे में मुलाकात की. पुख्ता सूत्रों ने बताया कि मंत्रियों को छोड़ कर बाकी सभी विधआयकों ने प्रभारी को यही सलाह दी कि सरकार में कांग्रेस बाहर से समर्थन दे. विधायकों की सलाह मान कर अब कांग्रेस झामुमो को यह बताना चाह रही है कि उसका अपना भी वजूद है. कहा जा रहा है कि विधायकों ने कहा कि अगर सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया गया तो आनेवाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का ग्राफ राज्य में गिर सकता है.
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