
Avinash, jamshedpur: जमशेदपुर वासियों के लिए संस्थापक दिवस (थर्ड मार्च) जश्न की तारीख होती है. लेकिन आज ही के दिन ठीक 33 साल पहले 1989 में यह जश्न, उस वक्त गम में बदल गया था, जब संस्थापक समारोह के दौरान लगी आग में 50 से ज्यादा लोग जलकर खाक गये. यह साल और भी खास इसलिए था क्योंकि संस्थापक की 150 वीं जयंती थी. प्रबंधन चाहता था कि यह अवसर शहरवासियों के लिए यादगार हो, लेकिन समारोह में लगी भीषण आग में लगभग 50 लोगों की मौत हो गई और अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए.
वीआईपी गैलरी में लगी थी आग
आग उस गैलरी की छत पर एक चमक के रूप में शुरू हुई जिसमें वीआईपी लोग बैठे थे. टेन्ट के नीचे फॉल्स सीलिंग में आग फैलने के बाद ही इसका पता चला. दहशत को रोकने के लिए लोगों को बैठने की घोषणा की गई, मगर जैसे ही कपड़ा और बांस का ढांचा जलने लगा, लोगों में भगदड़ मच गई. इससे पहले कि हर कोई सुरक्षा के लिए आगे बढ़ता, समारोह को लेकर बनी संरचना पूरी तरह से ढह गई. 800 लोगों में से लगभग 200 लोग इसमें फंस गए. जब तक एम्बुलेंस पहुंचा, तब तक गैलरी मलबे में तब्दील हो चुकी थी और कई शव पहचान से परे थे. कंपनी पर गंभीर लापरवाही के आरोप भी लगे और यह मामला सर्वोच्च न्यायलय तक गया.
ऐसा खौफनाक मंजर था
कुछ ने अस्पतालों में दवाओं की कमी और चिकित्सा कर्मचारियों के रवैये की भी शिकायत की. लेकिन अस्पताल खून से रंजित थे. कोई भी अस्पताल, चाहे वह कितना ही एडवांस क्यों न हो, 200 गंभीर रूप से जलने के मामलों को एक साथ संभालने के लिए तैयार नहीं था. हालांकि ज्यादातर लोग डॉक्टरों की तारीफ कर रहे थे. आग में अपने पिता को खोने वाली इप्सिता चंदा ने कहा था-हम डॉक्टरों को दोष नहीं दे सकते. उन्होंने चौबीसों घंटे काम किया. संजय गोयल की कुछ समय पहले दिल की सर्जरी हुई थी, उन्हें नया जीवन मिला था, लेकिन यह नया जीवन कुछ ही पलों में राख में तब्दील हो गया था. वह अपने भाई के साथ आग में जलकर मर गए.
मरने से पहले मृत बच्चे को दिया जन्म
मैडोना लोबो, जो अगले महीने एक बच्चे को जन्म देने वाली थी, 80 प्रतिशत जल गई थी. अस्पताल में मरने से पहले उसने एक मृत बच्चे को जन्म दिया. पति ने गंभीर रूप से जली अपनी पत्नी की आवाज़ सुनने की भीख मांगी. डॉक्टर उन्हें दूसरी मंजिल से पांच मिनट के लिए पत्नी के पास ले गए. इला गांगुली सुरक्षित गैलरी से भाग निकलीं लेकिन अपने पति की मदद के लिए वापस दौड़ पड़ी. मेजर वाधवा के ससुर ने खुद को जलाकर एक बच्चे सहित कई लोगों को बचाने में मदद की. डॉ. आरएस चौधरी ने अपनी पत्नी और बेटे को आग में खो दिया. उनके शवों की पहचान करने के बाद वह जीवित बचे लोगों के इलाज में लग गए.
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