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मिशन 2024 के गेम प्लान पर शुरू हुआ काम : भाजपा के बाद झामुमो का जनजातीय महोत्सव पहला स्ट्रोक

Political Editor

Ranchi: देश में आमचुनाव होने में अभी लगभग 20 महीने बचे हैं लेकिन इसको लेकर चुनावी हांडी चढ़नी शुरू हो गयी है. मिशन 2024 के गेम प्लान पर काम शुरू हो गया है. झारखंड भी इससे अछुता नहीं है. झारखंड की राजनीति जनजातीय समुदाय पर केन्द्रित रही है. लोकसभा हो या विधानसभा इस प्रदेश के आदिवासी ही तारणहार बनकर सामने आते हैं. झारखंड में लोकसभा की 14 सीटें हैं जिसमें 5 सीटें जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित है. इसी तरह विधानसभा की 81 सीटों में 28 सीटें एसटी के लिए आरक्षित है. यानि लोकसभा हो या विधानसभा जिसके साथ जनजातीय समुदाय उसी का झारखंड में बेडा पार होता रहा है.

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को तीन एसटी आरक्षित सीटों पर जीत मिली थी और एक-एक सीट झामुमो और कांग्रेस के खाते में गया था. लेकिन विधानसभा चुनाव में बाजी बिलकुल ही पलट गयी थी. विधानसभा में आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित 28 सीटों में से दो सीटें ही भाजपा के खाते में आई थी. बची हुई सीटों पर कांग्रेस और झामुमो को बढ़त मिली थी. एक सीट झाविमो को मिली थी. परिणाम यह हुआ कि भाजपा को झारखंड की सत्ता गंवानी पड़ी. झारखंड राज्य गठन के बाद रघुवर दास को छोड़कर तमाम मुख्यमंत्री इसी समुदाय के रहे हैं.

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आदिवासी वोटों का झुकाव सत्ता तक पहुंचने की चाबी है. द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने के बाद यह समाज देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है. आजादी के बाद पहली बार एक आदिवासी महिला देश के शीर्ष पद पर आसीन हुई हैं. भाजपा ने इसका श्रेय भी खूब बटोरा. खुद को आदिवासियों का सच्चा पैरोकार बताया. लेकिन झामुमो ने विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के बजाए द्रौपदी मुर्मू के लिए वोटिंग कर बता दिया कि वह आदिवासी एजेंडे से कोई कॉमप्रोमाइज नहीं करने वाला.

इधर, झारखंड की राजनीति में मचे उथल-पुथल के बीच झामुमो ने आदिवासी हित में एक और दांव खेल दिया है. राज्य बनने के बाद पहली बार झारखंड जनजातीय महोत्सव कराया जा रहा है. इसके जरिए समृद्ध जनजातीय जीवन दर्शन की झलकियां दिखायी जाएंगी. विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर 9 अगस्त को महोत्सव का आगाज होगा जो 10 अगस्त तक चलेगा. इसमें आदिवासियों की कला-संस्कृति, साहित्य, मानवशास्त्र पर संगोष्ठियां होंगी.

उनके खान-पान को प्रदर्शित किया जाएगा. परिधान पर फोकस करते हुए फैशन शो होगा. इस महोत्सव में आदिवासी बहुल छत्तीगढ़, ओडिशा, मिजोरम समेत कई राज्यों के कलाकार शामिल होंगे. छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल को भी आमंत्रित किया गया है.

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मुख्यमंत्री खुद कर रहे आयोजन की निगरानी

जमीनी हकीकत को भांपते हुए भाजपा ने जनजातीय समुदाय को एक बार फिर अपने पक्ष में करने की कवायद तेज की है तो सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के कान खड़े हो गए हैं. भाजपा ने बीते पांच जून को राजधानी में जनजातीय गौरव सम्मेलन का आयोजन कर इसकी शुरूआत की तो पहली बार अंतरराष्ट्रीय मूलवासी दिवस के मौके पर दो दिवसीय जनजातीय महोत्सव के आयोजन को भाजपा की राजनीतिक काट के तौर पर देखा जा रहा है. महोत्सव का आयोजन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर किया गया है. वे स्वयं इसकी निगरानी भी कर रहे हैं.

आयोजन के दौरान देशभर से जनजातीय समुदाय का जमावड़ा राजधानी रांची में होगा. झारखंड मुक्ति मोर्चा इस बात को प्रचारित कर रही है कि भाजपा का आदिवासी प्रेम सिर्फ दिखावा है. एक आदिवासी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा तरह तरह का षड्यंत्र कर रही है. इस सम्मेलन के बहाने इस मैसेज को और अधिक लोगों तक पहुंचाने की कवायद होगी.

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शुरू से ही झामुमो का कोर वोटर रहा है जनजातीय समुदाय

झामुमो की राजनीति की जड़ में हमेशा से जनजातीय समुदाय रहा है. आज भी आदिवासी समाज में सर्वमान्य नेता झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन ही हैं. शिबू सोरेन से मिली विरासत को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बखूबी सम्हाल रहे हैं. इसी का नतीजा है कि अलग राज्य बनने के बाद जब झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व हेमंत सोरेन को मिला तो उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में 28 जनजातीय सीट में से 19 सीटों पर अपनी पार्टी का परचम लहराया. राज्य में अबतक संपन्न चुनाव में झामुमो को सबसे ज्यादा 18 सीटें ही मिली थी. हेमंत ने अपने नेतृत्व में 30 सीटें लायी जिसमें 19 सीटें उन्हें जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित सीट पर मिला.

कांग्रेस को छह और भाजपा को मात्र दो सीटों से संतोष करना पड़ा. सभी पार्टियां बखूबी समझती हैं कि आदिवासी सपोर्ट के बिना झारखंड की सत्ता पर काबिज होना असंभव है. जानकारों का कहना है कि द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर भाजपा इस समाज को अपनी ओर करने की कोशिश में है. इसलिए जनजातीय महोत्सव के जरिए झामुमो यह मैसेज देना चाह रहा है कि वही आदिवासियों का सच्चा हितैषी है.

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2014 में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था आदिवासी समुदाय

2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा को 37 सीटों पर जीत मिली थी. तब मोदी लहर चल रही थी. उस दौरान भाजपा ने एसटी की 28 सीटों में से 11 सीटों पर कब्जा जमाया था. उसके सहयोगी आजसू को भी एसटी की दो सीटें मिली थी. इसके बावजूद 13 एसटी सीटों पर जीत के साथ झामुमो टॉप पर रहा. झामुमो ने साबित कर दिया था कि मोदी लहर के बावजूद आदिवासी उनके साथ थे. इसके अलावा निर्दलीय गीता कोड़ा और एनोस एक्का की जीत हुई थी. लेकिन 2019 के चुनाव में एसटी की 9 सीटें गंवाकर भाजपा सत्ता से बाहर हो गई.

जानकारों का कहना है कि इसी कमी को पाटने के लिए आदिवासी वोट बैंक को साधने की कवायद चल रही है. हालांकि 2024 आने में वक्त है. तब देखना होगा कि राष्ट्रपति के पद पर द्रौपदी मुर्मू का आना भाजपा को फायदा पहुंचा पाता है या आदिवासियों की सहानुभूति झामुमो के साथ बनी रहती है.

2024 के लोकसभा चुनाव से सीधा संबंध

मालूम हो कि वर्ष 2024 में देश में लोकसभा चुनाव होना है. झारखंड में भी 14 लोकसभा सीटें हैं. इन सीटों में अधिकतर पर जीत तभी संभव है, जब आदिवासी वोटर भी बढ़चढ़कर किसी का साथ दें. इसे ध्यान में रख कर आदिवासियों के बीच भाजपा अपनी मजबूत पकड़ बनाना चाहती है. भाजपा अपने सम्मेलन के जरिए आदिवासियों को एकत्र कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज का विवरण दे चुकी है.

वह बता चुकी है कि भाजपा के पास इस समय कितने सांसद, विधायक व मंत्री आदिवासी समुदाय से हैं. कोशिश किसी तरह से आदिवासियों को अपने पाले में लाने की है. झामुमो को भाजपा की यह रणनीति ठीक तरह से समझ में आ रही है. इसलिए अब उसने भी भाजपा के काट में दांव खेलना शुरू कर दिया है.

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