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जहां राज्य का भविष्य तय करती है सरकार, उसकी नाक के नीचे बस्ती का इतना बुरा हाल?

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  • हाल विधानसभा से दो किलोमीटर दूर बसे मल्हार कोचा का
  • न आधार न राशन कार्ड, कपड़ों से ढंकी झोपड़ियों में रहते हैं लोग
  • विधानसभा जाने वाले माननीयों की नजर तक नहीं गयी
  • मांग के गुजर बसर करने वालों को सरकारी योजनाओं की जानकारी भी नहीं

Chhaya

Ranchi: घर की दहलीज में पैर रखते ही बेतरतीब पड़े बरतन, गंदगी और भिनभिनाती मक्खियां गरीबी बयां करती हैं. यह हाल है मल्हार कोचा में रहने वाली जुगत्री मल्हारिन का. जुगत्री एक बानगी भर है. इसकी स्थिति देख समझ में आ जाता है कि सरकारी योजनाएं ऐसे घरों और इलाकों से कोसों दूर हैं.

मल्हार कोचा की दूरी राज्य का भाग्य और भविष्य तय करने वाली विधानसभा से महज दो किलोमीटर है. यह मौसीबाड़ी इलाके में आता है. इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोगों का बसर भीख मांग कर या कबाड़ी के काम से चलता है.


जुगत्री के पास न तो आधार कार्ड है, न वोटर कार्ड और न ही राशन. भीख मांग कर अपना बसर करने वाली जुगत्री का कहना है, “मुझे इन कार्डों की जानकारी भी नहीं है क्योंकि मेरा कोई बच्चा नहीं है. पति भी नहीं रहे जो मुझे इन सबके बारे में बताते. टूटी सी झोपड़ी है, जो बारिश में टपकती है.”

ये हाल सिर्फ जुगत्री का नहीं, बल्कि शीतल देवी, असरीता समेत कई परिवारों का है, जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं और भीख मांग के गुजारा करते है. कुछ लोगों को पहचान पत्रों की जानकारी भी है, लेकिन जन्म तारीख मालूम नहीं होने के कारण, पत्र कभी बने नहीं.
इलाका मौसीबाड़ी से आधा किलोमीटर अंदर जाने पर है. कुछ दूर के बाद यहां पक्की सड़क भी नहीं है.

जन्म तारीख पता होता तो ये स्थिति नहीं होती

इसी इलाके में रहती हैं शीतल देवी जो जुगत्री की तरह मांग कर आजीविका चलाती हैं. शीतल ने आधार कार्ड के लिये आवेदन किया था लेकिन जन्म तारीख नहीं पता होने के कारण कार्ड नहीं बना.

झुंझलाते हुए शीतल ने कहा- अगर जन्म की तारीख मालूम होती तो ये हालत कभी न होती. एक दिन भीख नहीं मांगने से पेट नहीं भरता. दस्तावेज कहां से लायें. मांगेंगे नही तो खायेंगे क्या?

यही हाल असरीता का भी है जिनके घर में छोटे-छोटे बच्चे भी हैं. असरीता ने बताया कि उनके बच्चों और उनका भी आधार कार्ड, वोटर कार्ड कुछ भी नहीं है. बच्चों का जन्म घर में हुआ. ऐसे में जन्म की तारीख पता नहीं. राशन कार्ड का लाभ तो कभी नहीं मिला.

इस इलाके में लगभग पांच सौ लोगों की आबादी है. लोगों से बात करने से जानकारी मिली की कभी भी सरकारी जानकारी के लिए इलाके में कैंप नहीं लगता. इलाके की मुख्य सड़क से हटते ही गरीबी का अलग मंजर देखने मिलता है जहां सारी सरकारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं.

रोजगार गारंटी योजना काम की नहीं

इस इलाके में जाने से पता चलता है कि भले सरकार शहरी रोजगार गारंटी योजना चलाती है लेकिन राजधानी से मात्र सात किलोमीटर की दूरी में बसी इस बस्ती के लोगों के रोजगार की गारंटी नहीं है.

क्षेत्र के रूपेश ने बताया कि उनके चार बच्चे हैं. कबाड़ी का काम करते हैं. घर बस कपड़ों से ढंका, बारिश हो जाये तो सब पानी पानी. इनकी पत्नी और किसी भी बच्चे का आधार कार्ड या वोटर कार्ड नहीं है.

काम के बारे में पूछने पर रूपेश ने बताया कि एक दिन कमाने नहीं जायेंगे तो चूल्हा नहीं जलेगा. काम देने के लिए योजनाएं हैं, इसकी जानकारी नहीं. कभी कोई कैंप आदि लगता ही नहीं, लगे भी तो लाभ कैसे लें, दिन तो मांगने और बेचने में बीतता है.

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केंद्र से लेकर राज्य सरकार चला रही रोजगार के लिए योजनाएं

भले ही आधार कार्ड और वोटर कार्ड जैसे पहचान पत्र इन लोगों के पास नहीं है लेकिन शहरी क्षेत्र से सटे होने के बाद भी इन तक रोजगार योजनाएं नहीं पहुंच पायीं. नतीजा ये है कि ये लोग अब तक भीख मांगते हैं.

केंद्र सरकार की ओर से पिछले साल शहरी रोजगार गारंटी योजना की शुरूआत की गयी जिसका मुख्य उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना है. लगभग दो महीने पहले झारखंड सरकार ने भी रोजगार गारंटी योजना भी बीपीएल परिवारों के लिये शुरू की.

राज्य सरकार की योजना के तहत ऐसे लोगों को मनरेगा से जोड़ कर रोजगार उपलब्ध कराना है. वहीं केंद्र सरकार की ओर से पहले से कई ऐसी योजनाएं रोजगार के लिए चलायी जा रही हैं.

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आधार कार्ड देने के हैं और भी प्रावधान

सामाजिक कार्यकर्ता स्वाति नारायण ने कहा कि मौसीबाड़ी के इलाके में लोग 50 सालों से रह रहे हैं जो बेघर हैं. सिर्फ आधार कार्ड की बाध्यता के कारण इन्हें सरकारी योजनाओं से वंचित किया जा रहा है. जबकि किसी सामाजिक संगठन या जनप्रतिनिधि से ये जानकारी मिलने पर कि उक्त व्यक्ति बेघर है, लाभ दिया जा सकता है.

स्वाति ने बताया कि दिल्ली जैसी शहरों में कई संगठनों के साथ मिलकर उन्होंने ऐसा किया है. लेकिन झारखंड में ऐसा नहीं है. लोग राशन तक नहीं ले पा रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि सरकार प्रयास करे और लोग जागरूक हों.

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