Opinion

जब मंत्री ही हत्यारों- दंगाईयों के पक्ष में हों, हथियारों की पूजा करें, तब राज्य कैसे होगा अव्वल- कैसे आयेगा निवेश

Faisal Anurag

क्‍या झारखंड की उन्‍नति एक ऐसे हालात में संभव हैं, जब सरकार के मंत्री ही लगतार कानून और नियमों को चुनौती देना अपना अधिकार समझता हो. राज्‍य में यह एक बड़ा सवाल उठा खड़ा हुआ है. हत्‍यारों का महिमामंडन, दंगाईयों को बचाने के लिए धरना और हथियारों की पूजा जब केंद्रीय और राज्‍य के वरीय मंत्री ही करने लगें तो यह अंदेशा स्‍वाभाविक ही है कि इससे विकास की संभावनाएं धूमिल होंगी. क्या इन हालातों को देख कर कोई निवेशक झारखंड में आने की योजना बनायेगा.

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बौराये सत्ताधारी कानून की अवमानना करते हुए जानते हैं कि कानून को वे अपने तरीके से इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं. यही कारण है कि कानून की अवज्ञा करते रहे हैं. यह सत्ता के निरंकुश हो जाने का संकेत भी है और साथ ही कि वे लोकतंत्र में एक राजा की तरह हैं. उन्हें लगता है वे चाहे कुछ भी करें उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की संभावना नहीं हैं. उनकी सत्ता सुरक्षित है. इस भावना के कारण देखा जा रहा है कि देश के अनेक मंत्री और सत्ता दल के सांसद-विधायक मनमानी करते हैं. प्रशासन को अपने अनुकूल चलाने लगते हैं और नियमों की परवाह तक नहीं करते. आम जनता को यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि वे बेहद ताकतवर हैं. झारखंड में इसका अत्यंत भद्दा प्रदर्शन  देखा जा रहा है. पिछले दिनों की घटनाओं ने यह प्रमाणित कर दिया है कि इन जनप्रतिनिधियों की नजर में कानून उनके हिसाब से ही चलना चाहिए और जो उनके हिसाब से नहीं चलेंगे उन्हें ये ताकतवर लोग विभिन्न तरीकों से परेशान करेंगे.

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झारखंड के एक मंत्री रणधीर सिंह की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है. तस्वीर में मंत्री हथियारों की पूजा करते दिख रहे हैं. उसमें कुल 19 आग्नेयास्त्र हैं. सवाल उठता है  कि इतने हथियार मंत्री के पास आये कहां से हैं. सभी सरकारी हथियार जैसे दिखते हैं. इसका मतलब यह निकलता है कि मंत्री अपने अंगरक्षकों और आवास गार्ड के हथियारों की पूजा कर रहे हैं. सवाल यह भी उठता है कि क्या इस तरह हथियार की पूजा करते फोटो वायरल करने का क्या मकसद है. मंत्री क्या दिखाना चाहते हैं. मंत्री रणधीर सिंह पहले भी कई कारणों से चर्चा और विवाद में बने रहे हैं. सरकार के एक मंत्री का यह आचरण न केवल सार्वजनिक मर्यादाओं के खिलाफ है.  इस बात की उम्मीद तो नहीं है कि इस कारण मंत्री से सरकार कोई कारण बताओ नोटिस जारी करेगी. यह बात आमतौर पर कही जाती है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है. लेकिन बावजूद इसके इस तरह हथियार की पूजा की तस्वीर खिंचवाना और उसे वायरल करने के अपने संदेश हैं और इसमें यह अंतरनिहित है कि यह मामला कोई आत्मसुरक्षा भर का नहीं है, बल्कि इससे बताने की कोशिश की  जा रही है कि यह सामंतवादी शक्तिप्रदर्शन है.

यह विडंबना ही है कि लोकतंत्र के बावजूद सत्ता और सामंती वर्चस्ववादियों के बीच गहरा तालमेल है. इससे आमजन में दहशत भी पैदा की जाती है और यह जताया जा रहा है कि गैर संवैधानिक कदम उठाना उनके अधिकार का ही हिस्सा है. जरूरत इस बात की है कि इस तरह की मानसिकता की रोकथाम का पुख्ता प्रबंध किया जाए और ऐसे लोगों  को दंडित करने की भी व्यवस्था की जाए. हालांकि आज की राजनीति जिस दिशा में है, उसमें इस तरह की कोई भी उम्मीद रखना बेमानी है.

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एक अन्य मंत्री हैं, सीपी सिंह. मंत्री सी पी सिंह कैबिनेट में होने के बावजूद थाना में धरना देते हैं और पुलिस की कार्रवाई को खुलेआम प्रभावित करने की पूरी कोशिश करते हैं. सी पी सिंह ने एक सांप्रदायिक तनाव के बाद हुई गिरफ्तारी को लेकर विरोध में धरना दिया. इस तरह न केवल उन्होंने जांच की प्रक्रिया को प्रभावित किया. बल्कि एक खास समूह के लिए, जिन्हें पुलिस ने दंगा करने के आरोप में पकड़ा था, उसके लिए अपने संवैधानिक शपथ का भी ध्यान नहीं रखा. उन्होंने अतीत में भी ऐसा कई बार किया है और इस कारण संदेह और भेदभाव को बढावा दिया जाता रहा है. इसका असर उन एजेसियों पर पड़ता है जो उपद्रवों को सख्ती से निपटना चाहते हैं और आरोपियों को गिरफ्तार करते हैं. अगर गिरफ्तारी के क्रम में कुछ निर्दोष भी गिरफ्तार हुए हैं तो उसके विरोध का और भी रास्ता है. बतौर एक मंत्री और एक नेता का भेद मिटा देना कितना उचित है, यह सवाल तो अपनी जगह है ही. अभी कुछ साल पहले जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने धरना दिया था, तब उनपर खूब राजनीतिक प्रहार हुआ. कहा गया कि  इस धरना से लोकतंत्र तार तार हुआ है और एक संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंची है. यही नहीं भाजपा सहित केजरीवाल विरोधियों ने उनसे इस्तीफा तक मांग लिया. मीडिया में भी यह मामला छाया रहा, मीडिया का स्वर भी कमोवेश यही रहा. लेकिन इसके बाद भी यह सिलसिला जारी है. वर्तमान में देखा जा रहा है कि भाजपा सरकार के मंत्रियों के ऐसे कदम की आलोचना न ही विपक्ष पूरी तरह कर रहा है और ना ही मीडिया में इसे उठाया जा रहा है. मानदंडो का यह दोहरापन ही इस तरह के कदम को मात देता है.

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झारखंड में यह भी देखा गया है कि एक केद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने किस तरह मॉबलिंचर सजायाफ्ताओं का नागरिक अभिनंदन किया. देशभर में इसकी चर्चा हुई, लेकिन ऐसे कदमों को हतोत्साहित करने की पहल नहीं की गयी. यहां तक कि जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने भी ट्विट करके इस घटना पर अफसोस जाहिर किया था. यशवंत सिन्हा ने ट्विटर पर लिखा थाः पहले मैं लायक बेटे का नालायक बाप था, अब रोल बदल गया है. पिता के इस बयान और देश-विदेश में हुई फजीहत के बाद जयंत सिन्हा ने इस पर सफाई जरुर दी थी, लेकिन उन्होंने मॉबलिंचिंग के आरोपियों को माला पहनाने को लेकर कभी ना तो अफसोस जाहिर किया और न ही माफी मांगी.

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एक ओर झारखंड के मुख्‍यमंत्री न्‍यू झारखंड की बात कर रहे हैं. मुख्‍यमंत्री न केवल अनेक तरह की महत्वाकांक्षी योजनाओं की लगातार घोषणा हैं. वहीं दूसरी ओर सरकार में बैठे उनके सहयोगियों की गतिविधियां  राज्‍य में पूंजी निवेश के सपने को पलीता लग रहा है. विकास के मामले में राज्‍य को अव्वल लाने के प्रयास इसमें कितने सार्थक होंगे यह गंभीर सवाल है.

 

 

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