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धनबाद में ‘खेल’ मतलब ‘हाशमी’…आज भी दबदबा कम नहीं है

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Dhanbad: धनबाद में खेल मतलब एमएस हाशमी. वही हाशमी जो करीब 30 करोड़ के 34वें राष्ट्रीय खेल घोटाले के आरोपी हैं. मामले में काफी दिनों तक जेल में रहने के बाद छूटे. अब इस घोटाले को लेकर ईडी ने एफआईआर की है. पहले मामले की जांच एसीबी कर रही थी. जांच का संतोषजनक परिणाम नहीं था.

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सभी अभियुक्त जेल से बाहर आ गये. इसके बाद खेलमंत्री अमर बाउरी ने मामला सीबीआई को सौंपा है तो ईडी ने खेल घोटाले के आरोपियों आरके आनंद, पूर्व खेल निदेशक पीसी मिश्रा, आयोजन सचिव एमएस हाशमी और कोषाध्यक्ष मधुकांत पाठक को आरोपी बनाकर प्राथमिकी दर्ज की है.

कौन हैं हाशमी

एमएस हाशमी सन 1981 से ही धनबाद में खेल की राजनीति से जुड़े. पहली बार धनबाद फुटबाल संघ के संयुक्त सचिव बने. तब नया बाजार यूथ फुटबाल क्लब के सचिव की हैसियत से हाशमी ने खेल राजनीति में इंट्री मारी थी.

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दूसरी बार झारखंड क्रिकेट टीम में लंबे समय तक बैट्समैन के रूप में जमे रहनेवाले रोबिन मुखर्जी को हराकर संघ के सचिव पद पर कब्जा जमाया. इसके बाद तो 35 साल से अधिक समय के बाद भी धनबाद की खेल राजनीति में उनका दबदबा बना हुआ है. उनको हटाने की उनके विरोधियों की तमाम कोशिश हमेशा नाकामयाब होती रही है.

राष्ट्रीय खेल हाशमी ने ही लिया

कांग्रेस सरकार में खेल मंत्री रहे प्रिय रंजन दास मुंशी से अच्छे संबंध के कारण हाशमी ने राष्ट्रीय खेल के आयोजन की मेजबानी झारखंड के लिए प्राप्त कर ली. इससे पहले नाना प्रकार से खुद को झारखंड ओलंपिक संघ में स्थापित किया. हाशमी की पहले से ही अफसरों और कांग्रेस की सत्ता की प्रभावी लॉबी में पैठ रही. धनबाद के डीसी रहे अफजल अमानुल्लाह की खिदमत में हाशमी बिछे थे. उनके अन्य आईएएस, आईपीएस अफसरों से भी अच्छे ताल्लुक रहे. उनकी पहुंच का ही नतीजा है कि बेटा आमिर हाशमी एनएसयूआई का प्रदेश अध्यक्ष है.

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हाशमी के नाम से छपी थी एक किताब

अस्सी के दशक में हाशमी के नाम से छपी एक किताब ने तहलका मचा दिया था. करीब पांच सौ रुपये मूल्य की इस किताब में बीसीसीएल का तमाम कच्चा चिट्ठा था. हर तरह की गड़बड़ियों की जानकारी थी. यह किताब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई. इस किताब का नाम था, ‘इन साइड स्टोरी ऑफ द बीसीसीएल’. उस समय यह विवाद जोरों पर था कि क्या यह किताब हाशमी ने लिखी? हालांकि हाशमी अंग्रेजी बोलते थे.

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पर हाशमी को क्या पड़ी इस तरह की किताब लिखने की? वह धनबाद डीसी ऑफिस में एक सीनियर पदाधिकारी एसकेएल दास के बहुत करीब थे. बाद में आईएएस में प्रमोट होनेवाले दास विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. उनके ड्राफ्ट का कोई तोड़ नहीं था. इसलिए धनबाद आनेवाले डीसी उनसे सलाह लिए बिना शायद ही महत्वपूर्ण काम करते थे. चर्चा थी कि यह किताब एसकेएल दास ने ही लिखी. मगर, सरकारी पदाधिकारी होने के कारण वह लेखक के रूप में अपना नाम नहीं दे सकते थे. इसलिए हाशमी का नाम दे दिया. खैर, जो भी हो हाशमी को इस किताब ने प्रसिद्धि तो दे दी.

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राष्ट्रीय खेल के आयोजन से बदल गया रंग-ढंग

कांग्रेस की राजनीति में तोड़जोड़ करके जिला स्तर पर मामूली पद हासिल करनेवाले मूल रूप से मधुपुर के रहनेवाले हाशमी की बहुत ही मामूली हैसियत थी. धनबाद स्टेशन और इसके इर्द-गिर्द वह अक्सर देखे जाते थे. धनबाद के खेल आयोजनों और कुछ व्यवसायियों की सहायता से चल रहे हाशमी अपने ससुर के रेलवे क्वार्टर में आज भी रहते हैं.

हालांकि उनके पास कई लग्जरी गाडियां हैं. रांची सहित कई शहर में अब उनका ठिकाना है. हाशमी की कमाई के ढेर सारे चर्चे होने के बाद भी उनके चाहनेवाले धनबाद के खेल संघों में भरे पड़े हैं. उन्होंने हर वैसे आदमी को तरजीह दी, जिसने उसकी सल्तनत स्वीकार की. विरोधियों को धूल चटाने के बाद भी उनसे व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं रखी.

धनबाद फुटबाल संघ में जुबेर खान, नासीर दाद खान, जैनूल आबेदीन उर्फ झुन्नू आदि को स्थाई तौर पर स्थापित किया. बीएन ठाकुर, धनबाद के पूर्व बीडीओ विभाष चंद्र ठाकुर आदि को भी लाया और कुछ विरोधियों पर भी मेहरबानी दिखाई. इसे हाशमी की सफलता का राज कह सकते हैं. समर्थकों का कहना है कि धनबाद क्या झारखंड की खेल राजनीति में हाशमी साहब का कोई जोड़ नहीं है. राष्ट्रीय खेल के आयोजन में अपने दामाद को काम दिलाने के लिए खासे बदनाम हाशमी के खिलाफ मोर्चे पर यहां कोई मजबूती से खड़ा नहीं दिख रहा है.

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राष्ट्रीय खेल के नाम पर धनबाद में हुआ क्या

मैथन डैम के पास वाटर स्पोर्ट्स के लिए करोड़ों खर्च किए गये. बहुत से उपकरण विदेश से मंगाए गये लेकिन कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा है. गोल्फ ग्राउंड में बनाया गया स्क्वैश स्टेडियम कबाड़ हो गया है. बिरसा मुंडा पार्क में बना स्पोर्टस स्टेडियम भी अनुपयोगी ही है.

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