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इमरजेंसी लगी तो जेल में डाला, चुनाव हुआ तो धनबाद लोकसभा सीट से जीते AK Rai

Naveen Sharma

Ranchi : ऐसे दौर में जब राजनीति और कारोबार में कोई खास भेद नहीं नजर आता है ऐसे में धनबाद के कोयलांचल के मजदूर नेता एके राय ऐसी शख्सियत हैं जो अपनी सादगी, ईमानदारी और जुझारूपन की वजह से अलग से चमकते आभामंडल के साथ नजर आते हैं. राय दा जिन मजदूरों का प्रतिनिधित्व करते थे वे उन्हीं की तरह का सादगीपूर्ण जीवन जीते थे. इसी कारण वे टायर का चप्पल पहनते थे ताकि वो जल्दी घीसे नहीं ज्यादा दिनों तक चले.

राजनीति में मची लूट खसोट की वजह से इस बात पर यकीन करना मुश्किल होता कि तीन बार सांसद रहने वाला इन्सान कैसे इस तरह का सादा जीवन भी जी सकता है. आजकल तो एक मुखिया या वार्ड कमिश्नर भी बड़ी-बड़ी SUV गाड़ियों पर अकड़ कर चलते नजर आते हैं. ऐसे दौर में एके राय जैसे लोग भीड़ में अलग ही नजर आते हैं.

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केमिकल इंजीनियर थे

धनबाद के कोयला खदानों वाले इलाके में लंबे समय तक एके राय की तूती बोलती थी. उनके मजदूर आंदोलन और माफिया विरोधी अभियान की देश-विदेश में ख्याति रही है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से राजनीति शुरू करनेवाले राय पहले सिंदरी खाद कारखाना में केमिकल इंजीनियर थे.

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कॉमरेड राय 60 के दशक से झारखंड की राजनीति में सक्रिय रहे. इंदिरा गांधी ने जब 1975 में इमरजेंसी लगायी तो एके राय, शिबू सोरेन और बिनोद बिहारी महतो, तीनों को जेल में बंद किया गया. शिबू सोरेन और बिनोद बिहारी महतो तो जल्दी ही जेल से निकल आये थे, लेकिन कामरेड राय पूरी इमरजेंसी जेल में रहे. जेल में रह कर ही इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के संसदीय चुनाव में धनबाद से जीत कर पहली बार सांसद बने थे.

आज के पतनशील राजनीति के दौर में उन गिने-चुने राजनेताओं में थे, जिनकी सफेद चादर जैसे निर्मल व्यक्तित्व पर एक भी बदनुमा दाग नहीं.

जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों की निष्ठा पर कोई संदेह नहीं कर सकता. चरम विरोधी भी नहीं. लेकिन ईमानदारी उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा भर थी.

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धनबाद लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे

वैसे भी राजनीति एक तरह से कालिख की कोठरी की ही तरह की होती है. इसमें रह कर भ्रष्टाचार और अन्य गलत कामों से दूर रहना नामुमकिन सा लगता है.

इस तरह का असंभव सा काम धनबाद लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे कामरेड एके राय ताउम्र करते रहे. अपनी तरह का रेयर हार्डकोर ईमानदार ये नेता ताउम्र धनबाद के कोयलांचल के मजदूर की आवाज बुलंद करता रहा.

घर नहीं बसाया

राय दा ने शादी नहीं की. अपना घर परिवार नहीं बसाया. अपनी सारी जिंदगी मजदूर और सर्वहारा की लड़ाई में झोंक दी. कम्युनिस्ट होते हुए भी राय बाबू के बहुत स्वतंत्र विचार थे.

सांसद के रूप में पेंशन और अन्य सुविधाएं लेने से किया इन्कार

एके अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे. एक तरफ जहां अधिकतर नेता अपनी सुविधाएं बढ़ाने के लिए बेताब रहते हैं उन्होंने सांसद के रूप में पेंशन और अन्य सुविधाएं लेने से इन्कार कर दिया था. सांसदों को दी जानेवाली सुविधाओं का विरोध करनेवाले वह अकेले सांसद थे.

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मार्क्सवादी समन्वय समिति नाम से अपनी पार्टी बनाई

राय दा ने माकपा से अलग होकर अपनी पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति (एमसीसी) बनायी थी. हालांकि, उनका मजदूर संगठन बिहार कोलियरी कामगार यूनियन सीटू से संबद्ध है.एक खपड़ैल के घर में बिना बिजली के जिंदगी गुजार देनेवाले राय दा के प्रशंसक उनके विरोधी भी रहे हैं. राय दा की वामपंथी विचारक के रूप में पहचान रही है.वह बड़े अंग्रेजी अखबारों में लेख भी लिखते थे.

उनका दशकों पहले कोयलांचल सहित देश के मजदूर आंदोलन में दबदबा रहा है. छत्तीसगढ़ के किसान-मजदूर नेता शंकर नियोगी गुहा उनके समकालीन रहे हैं. कोयलांचल में पहलवानों के जोर से मजदूर आंदोलन के नाम पर ठेकेदारी और चंदाखोरी करनेवालों को राय साहब के आंदोलन के कारण बैकफुट पर आने को विवश होना पड़ा था.

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अलग राज्य के लिए बने झामुमो के संस्थापकों में प्रमुख

एके राय ने शिबू सोरेन और बिनोद बिहारी महतो के साथ 70 के दशक में झारखंड अलग राज्य के आंदोलन को नये सिरे से गति दी थी. झामुमो के गठन में उनका महती योगदान रहा है. उस दौरान उनके जुलूस में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती थी. जिले के कई विधानसभा क्षेत्र में उनकी पार्टी का कब्जा था.

आज भी इनकी पार्टी के एक विधायक हैं अरूप चटर्जी. राय दा को उनकी पुण्यतिथि पर नमन. हम दुआ करें की उनके जैसे और नेता राजनीतिक में आएं.

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