
Zeb Akhtar
नब्बे के दशक से कश्मीर को लेकर फिल्में बनाने का दौर एक रफ्तार के साथ शुरू हुआ है. इनमें से कुछ फिल्मों को बाक्स ऑफिस के तय फार्मूलों को ध्यान में रखकर बनाया गया है तो कुछ के सहारे कश्मीर की समस्या को समझने की कोशिश की गयी है. हालिया दिनों में आयी हैदर, मुल्क और वहां इसी तरह की फिल्में हैं. जो बॉक्स ऑफिस के मापदंडों के जद्दोजहद के साथ घाटी में फैली विभिन्न तरह की समस्याओं की पड़ताल करती हैं. इसी तरह की एक और फिल्म आयी है, नो फादर इन कश्मीर.
इसे भी पढ़ेंः सिनेमा और राजनीति एक-दूसरे के प्रतिबिंब: अनुपम खेर
यह फिल्म नया सिनेमा के नये मुहावरों को गढ़ती हुई नजर आती है. जिसमें घाटी की त्रासदी से सबसे अधिक प्रभावित वहां की आधी आबादी यानी, महिलाओं के एकांकी जीवन, उनका जुझारूपन और उनकी जिंदगियों में क्रमशः आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की गयी है. इस फिल्म को अलग से इसिलए रेखांकित करने की जरूरत है. अश्विन कुमार द्वारा निर्देशित इस फिल्म में हिंदी, अंग्रेजी और कश्मीरी – तीनों ही भाषाओ का इस्तेमाल किया गया है.
इसका एक मकसद इसे अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म पर ले जाना हो सकता है. फिर भी फिल्म अपने मूल मकसद को मजबूती से पकड़े रहती है. बहरहाल, अगर कथानक पर बात करें तो इसका अधिकतर हिस्सा घाटी की उन अर्ध बेवाओं या अर्ध-विधवाओं के दुख और पीड़ा से परिचय कराता है जिनके पतियों को फौज ने या पुलिस ने गिरफ्तार किया. लेकिन फिर ये लोग वापस नहीं लौटे. आखिर कहां गये वे लोग? हद तो ये है कि इन गिरफ्तारियों को भी कहीं दर्ज नहीं किया गया.
इसे भी पढ़ेंः जम्मू-कश्मीर के सोपोर में सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़, एक आतंकी ढेर
क्या वे जिंदा बचे हुए हैं या मर गये, या कहीं और कस्टडी में रखे गये हैं? आखिर ऐसे लोगों की बेवाएं क्या करें? अपने पतियों का इंतजार करें या फिर दूसरे के साथ विवाह कर घर बसा लें. सवाल यहीं नहीं खत्म हो जाते. फिर उनके बच्चे क्या करेंगे? क्या वे अपने पिता की तलाश में निकलें? और फिर तलाशें भी तो कहां? और पिताओं के तलाशने में आनेवाले जोखिम के लिए जिम्मेदार कौन होगा. पुलिस, प्रशासन या घाटी में तैनात फौज. इस तरह से फिल्म अपने सबजेक्ट के लिहाज से नया और अछुआ हो जाताी है.
कश्मीर की समस्या को आज तक राजनीतिक और सामाजिक नजरिये से ही देखा जा सका है. लेकिन वहां की महिलाओं के नजिरये से, जो कि किसी भी अन्य विपदा की तरह, कश्मीर की विपदा को भी पुरुषों से अधिक झेलने के लिए विवश हैं, उनके नजरिये से घाटी से गुजरना एक अलग तरह की त्रासदी से गुजरने जैसा है.
कहानीः फिल्म में नूर (जारा वेब) एक युवा मुस्लिम लड़की है. वो लंबे समय से इंग्लैंड में रहने के बाद अपनी मां (नताशा मागो) के साथ कश्मीर के अपने पुराने घर में रहने के लिए वापस आती है. नूर आदतन अपने मोबाईल पर सेल्फी खींचती रहती है. नूर के वालिद को कई साल पहले पुलिस किसी मामले में पूछताछ के लिए थाने ले गयी थी. लेकिन फिर उसके बाद उनकी वापसी नहीं हो सकी. अब नूर की मां अर्धबेवा की जिंदगी गुजार रही है. वो फिर से शादी कर नयी जिंदगी गुजारना चाहती है. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. कश्मीर में ही नूर की मुलाकात माजिद (शिवम रैना) से होती है. माजिद की कहानी भी कुछ-कुछ नूर की जैसी ही है.
उसके पिता को भी कुछ दिन पहले सेना के अधिकारियों ने बुलाया था. और फिर वो भी वापस नहीं लौटे. इसलिए नूर की मां की तरह ही माजिद की मां भी अर्धबेवा है. नूर और माजिद को अपने पिता के बारे में सबकुछ जानने की ख्वाहिश है. वो जानना चाहते हैं कि आखिर उनके साथ क्या बीती होगी. माजिद के साथ मिलकर नूर अपने और उसके पिता के साथ हुए हादसे का पता लगाना चाहती है.
इस दरम्यान दोनों दूर पहाड़ों के ऊपर चले जाते हैं. वहां तलाशी के दौरान दोनों को मिलती हैं कुछ हड्डियां और कुछ नरकंकालों के सड़े हुए हिस्से. इस घटना के बाद नूर और माजिद को सेना की ओर से गिरफ्तार कर लिया जाता है. अब सेना उनके साथ क्या बर्ताव करने वाली है, फिल्म की कहानी यहीं से शुरू होती है. क्या अब उनकी तलाश पूरी हो पायेगी या उनका भी वही हस्र होने वाला है जो उनके वालदैन का हुआ है.
फिल्म इन्हीं जिज्ञासाओं के साथ, छोटी-छोटी मानवीय संवेदनाओं को उकेरती हुई आगे बढ़ती है और देखने वालों की इसमें रुचि बनी रहती है. कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान पा चुकी `नो फादर इन कश्मीर’ मानवीय त्रासदी को उभारनेवाली एक बेहतरीन फिल्म बन पड़ी है.
इसे भी पढ़ेंः सात जुलाई : धोनी का जन्म व भारतीय सिनेमा की रखी गयी थी नींव




