Opinion

(मेडिकल) वेस्ट नहीं हैं ये बच्चे…

Monika Arya

एक बहुत अजीब मामला सामने आया. रांची के जगन्नाथपुर मेले में अर्द्धविकसित बच्चों के शवों का प्रदर्शन कर लोगों से पैसे वसूले जा रहे थे.

ये भी सुनने मे आया कि प्रदर्शन करने वाले लोग भूत के नाम का सहारा लेकर बच्चों को भय रस का आनंद दिलवा रहे थे. घटना सत्य थी, इसकी पुष्टि पुलिस के साथ साथ अन्य लोगों ने भी की.

घटना की डिटेल्स के साथ कुछ तस्वीरें भी शेयर की गईं थीं. इन पर नजर पड़ते ही अप्रैल 2017 में देवघर में घटी घटना याद आ गई. जिसमें एक दर्जन से ज्यादा नवजात अर्द्धविकसित बच्चों के शव केमिकल सॉल्यूशन में ग्लास जार में बंद मिले थे.

उस वक्त काफी हो-हल्ला होने के पश्चात मामला शांत हो गया था. और ये किसी को पता नहीं चल पाया कि ये बच्चे कहां से इतनी बड़ी संख्या में आए थे, और किसने इन्हें वहां डाला था.

जिस समय शुरुआत में उन बच्चों को भ्रूण कहा जा रहा था, तब एक चैनल के प्रोग्राम में चर्चा के दौरान मैंने कहा था कि ये भ्रूण नहीं है, बल्कि अविकसित या अर्द्धविकसित बच्चे हैं. चर्चा में शामिल डॉक्टर ने इसका समर्थन भी किया था.

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मैं बाद तक भी स्थानीय पत्रकारों से उस घटना का अपडेट लेती रही और उसी में पता चला कि जांच बेनतीजा रही है और फाइल बंद कर दी गई है.

इसके बाद कोलकाता में भी पिछले साल सितंबर माह में इसी तरह के बच्चों के मिलने की खबर मीडिया में बहुत तेजी से फैली थी. जिस पर कई लोगों ने मुझे और पालोना को भी टैग किया था. उस वक्त मैं इस पर कुछ लिख नहीं सकी थी.

कारण ये था कि जितनी तेजी से घटना वायरल हुई थी, उससे कहीं ज्यादा तेजी से वह दब गई. जिस घटना की तस्दीक शहर के एक बड़े ऑफिसर ने घटनास्थल पर जाकर की थी, जिस पर मेयर ने भी मुहर लगायी थी, जिसे कई बड़े क्राइम रिपोर्टर्स ने अपने नेशनल चैनल पर चलवा दिया था. वह खबर अचानक से गायब हो गई थी.

डॉक्टरों के हवाले से उसे मे़डिकल वेस्ट करार दिया गया. सवाल अनुत्तरित रह गये कि क्या मेडिकल वेस्ट और बच्चों में अंतर करना इतना मुश्किल है कि सामने से देखने से भी पता न लग सके और इतने बड़े-बड़े लोग भ्रम का शिकार हो जायें.

अब ये एक नया मामला सामने आया है. इसकी जांच पूरी होगी या नहीं, सभी सवालों के जवाब मिलेंगे या नहीं, मिलेंगे तो कब, ये खुद में एक बड़ा सवाल है.

अखबारों में अलग-अलग रिपोर्ट्स पढ़ने को मिल रही है. आरोपी प्रदर्शनकारियों और पुलिस अधिकारियों के हवाले से एक अखबार में लिखा गया है कि जांच चल रही है. इसके बाद ही मालूम होगा कि ये बच्चे असली हैं या नकली.

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हमें इस वक्तव्य पर हंसना चाहिए या रोना. सामने से देखने पर भ्रम हो भी जाए तो उऩ्हें स्पर्श कर इस हकीकत को जानने में कितना वक्त लगता कि बच्चे असली हैं या नहीं.

रांची की इस घटना का एक अन्य पहलू भी सामने आया है. जहां प्रदर्शनकारी लोगों के मुताबिक, ये रबर के गुड्डे हैं. वहीं कुछ लोगों का कहना ये भी है कि जागरुकता के लिए ऐसा किया जाना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है.

पैसे खर्च करके मैडिकल लैब में जाकर इस तरह के बच्चों को देखना सबके लिए संभव नहीं. खासकर मैडिकल स्टडीज में जिनका इंटरेस्ट रहा हो, वे जरूर इन बच्चों को देखना और इसके पीछे के कारणों को जानना पसंद करेंगे या भविष्य में इस तरह जन्मे शिशुओं के लिए काम करना चाहेंगे.

ऐसा पहले भी हाट बाजारों में होता रहा है, जब मनोरंजन का साधन ये मेले जागरुकता अभियानों का भी बड़ा केंद्र होते थे, या विशेष तरह से विकसित ये बच्चे आजीविका का साधन बन जाते थे, लेकिन वे जिंदा होते थे, जैसा जमशेदपुर के फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. विभाकर बताते हैं.

अपने बचपन की स्मृतियां ताजा करते हुए वह कहते हैं कि एक बार बचपन में मेले में जाने पर उन्हें ऐसा देखने को मिला था, जहां दो जुड़े हुए बच्चों को दिखाकर पैसा कमाया जा रहा था.

लेकिन मृत बच्चों के प्रदर्शन की बात उन्होंने भी पहली बार ही सुनी और वह अचंभित भी हुए. उनके मुताबिक, मृत बच्चों की प्रदर्शनी किसी भी तरह जायज नहीं है.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अब कैमिकल सॉल्यूशंस में बॉडीज को नहीं रखा जाता है. जो भी इस तरह के मॉडल हैं (मेडिकल भाषा में इन्हें मॉडल कहा जाता है, जो मेडिकल स्टूडेंट्स को पढ़ाने के काम आते है), वे बहुत पुराने हैं. अब तो नियम इतने सख्त हो गये हैं कि ऐसा करना संभव नहीं.

एक अन्य सवाल के जवाब में डॉ. विभाकर कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर कैमिकल सॉल्यूशंस में रखी बॉडीज के डिस्पोजल की भी एक कानूनी प्रक्रिया होती है, जिसे पूरा किये बिना डिस्पोजल संभव नहीं है.

इसके अलावा उन्होंने ये भी बताया कि संस्थान के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति को अनधिकृत रूप से ये मॉडल किसी जागरुकता या अन्य उद्देश्य के लिए नहीं दिये जाते.

मतलब ये स्पष्ट है कि देवघर या कोलकाता या रांची में मिले बच्चे किसी मैडिकल लैब से नहीं निकले थे. ऐसे में इस मामले की गहन जांच करना और भी जरूरी हो जाता है. मेला आयोजन समिति इससे पल्ला झाड़ती नजर आ रही है. उसका कहना है कि उसने इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी.

उसका कहना है कि यह कार्य उनकी अनुमति के बिना हो रहा था (ये कथन अपने आप में हास्यास्पद है कि उनकी परमिशन के बिना कोई वहां मौजूद था और उन्हें इसकी खबर तक नहीं थी).

उस मेडिकल कॉलेज का पक्ष आना अभी बाकी है, जहां से ये बच्चे लाने का दावा आरोपियों ने किया है. उसके प्रबंधन ने किस व्यक्ति या संस्था को ये बच्चे दिये, किन शर्तों पर दिये, किस वजह से दिये, ऐसा पहले भी कितनी बार किया गया है.

प्रदर्शन के बाद इन बच्चों का क्या होता है, क्या ये वापिस उसी कॉलेज में रख दिए जाते हैं, जब तक इन सभी सवालों के जवाब नहीं मिल जाते, जांच अधूरी रहेगी. ये जांच करते वक्त डॉ. विभाकर के कथन को ध्यान में रखना होगा.

ये अकेले हैं ऐसा प्रदर्शन करने वाले या ऐसे कई संगठन या लोग हैं, जो अलग-अलग जगह जाकर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं. क्या देवघर में मिले एक दर्जन से अधिक बच्चे भी बंगाल से ही लाकर वहां बोरे में बंद कर छोड़े गए थे.

क्या बंगाल इन बच्चों का मूल केंद्र है, क्या वहां इस तरह के डि-शेप्ड या अर्द्धविकसित बच्चे बहुतायत में मिल रहे हैं, यदि ऐसा है तो इसके पीछे क्या भौगोलिक या जैविक कारण है, ये सवाल भी जांच के दायरे में रखने होंगे.

इसके अलावा एक पक्ष और है, जो यदा-कदा ह्यूमैन ट्रैफिकिंग पर काम करने वालों से बातचीत के दौरान सामने आता रहा है. छोटे बच्चों का इस्तेमाल मानव तस्कर अंग निकालने के लिए भी करते है. विदेशों में उनकी स्किन की डिमांड भी बहुत होती है, बताते हैं कुछ एक्टिविस्ट.

अगर मैडिकल लैब्स अब इस तरह के बच्चों को प्रिजर्व करके नहीं रखते हैं, तो एक सवाल यकायक दिमाग में कौंधता है कि कहीं ये बच्चे वही तो नहीं, जिनका जिक्र ह्यूमैन ट्रैफिकिंग एक्टिविस्ट्स की बातचीत में होता है.

हो सकता है कि इस घटना के तार देवघर और कोलकाता से जुड़े राज भी खोल दे. हमें इंतजार तो करना चाहिए, लेकिन घटनाओं को भूलना नहीं चाहिए. जैसे हम देवघर और कोलकाता को भूल गये.

फिलहाल तो रांची पुलिस इस चुनौती से जूझ रही है कि इस तरह के अनोखे मामले को किन धाराओं में दर्ज करे. उनके सामने भी ऐसा मामला पहली बार आया है.

बच्चों के संरक्षण पर आज की तारीख में सबसे प्रभावी कानून जेजे एक्ट भी इस पर स्पष्ट कुछ नही कहता. बताते हैं बाल सखा के झारखंड समन्वयक श्री पीजूष सेन.

उनके मुताबिक, अगर ये साबित हो जाये कि बच्चे जिंदा थे, तो क्रुएलिटी अगेंस्ट चिल्ड्रेन के तहत सेक्शन 75 का केस बनता है. तब तो आइपीसी के भी कुछ सेक्शंस लग सकते हैं, लेकिन यदि ऐसा नही हो तो मृत शरीरों के प्रदर्शन पर जेजे एक्ट भी स्पष्ट कुछ नही इंडियन पीनल कोड भी यही कहता है.

संभवतः कानून की इस कमी से वे लोग भी वाकिफ हैं, जो बच्चों के प्रदर्शन के जरिए पैसा कमाते हैं, या उनके शवों को कहीं भी छोड़ देते हैं, या वे, जो बच्चों के अंगों की तस्करी में शामिल हैं और अंग निकालने के बाद बचे अवशेषों को कहीं भी फेंक देते हैं.

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता है और ये उनके निजी विचार हैं)

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