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कहानियां झारखंड आंदोलन की-6 : जब आंदोलनकारियों का होनेवाला था सेंदरा

Dr Deosharan Bhagat

[dropcap]व[/dropcap]ह झारखंड आंदोलन का दौर था. मैं, प्रभाकर तिर्की और प्रवीण उरांव एक ही मोटरसाइकिल से दोपहर को खूंटी, तोरपा, कोलेबिरा और सिमडेगा के एक कार्यक्रम के लिए निकले. ठंड का समय था. हमलोग छात्र थे और उस समय पॉकेटमनी भी हमारे पास नहीं थी. गाड़ी से हम सबसे पहले खूंटी कॉलेज पहुंचे.

भाषण देना हममें से किसी को नहीं आता था. बस मकसद यह था कि छात्रों तक यह संदेश पहुंचे कि अलग राज्य के आंदोलन से छात्रों को क्यों जुड़ना चाहिए. इसके लिए आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन) से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे और समिति गठित करते हुए बंद को सफल बनाने का आह्वान किया जाता था. खूंटी जाने पर रात हो गयी. हमलोगों को आगे तोरपा जाना था. खूंटी छात्रावास में भोजन के बाद सभी तोरपा के लिए निकले.

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तोरपा में आंदोलनकारियों को समझा गया डाकू

तोरपा पहुंचने में रात के 12 बज गये. सभी वहां सो चुके थे. ऐसे में हमलोगों को समझ में नहीं आया कि अब जायें कहां. किसी को पहचानते भी नहीं थे. ऐसे में खपरैल का एक लंबा सा छात्रावासनुमा घर दिखा. घर के पास जाकर आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि, अंदर एक दीया जल रहा था. दरवाजे से अंदर झांककर देखा, तो पता लगा कि वह लड़कियों का हॉस्टल है. ऐसे में हमलोग तुरंत वहां से निकल गये.

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वहीं बगल में एक चर्च दिखा. वहां एक फादर बैठकर कुछ लिख-पढ़ रहे थे. हमलोग उनके पास गये और अपना परिचय दिया. बताया कि हमलोग ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन के छात्र नेता लोग हैं. कोलेबिरा जाना है, लेकिन रात होने के कारण अब यहीं ठहरना चाहते हैं. इस पर फादर ने पुआल के एक कुम्बा को दिखाया और उसी में सोने को कहा. हम सब साथी कुम्बा में गये, तो वहां पहले से सोये हुए कुछ लोगों को देखा. ठंड का समय था और हम सभी साथियों के पास कोई गर्म कपड़ा भी नहीं था. प्रवीण उरांव ने पुआल से ही मुझे और प्रभाकर को ऊपर से ढंक दिया.

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इस क्रम में एक सो रहे व्यक्ति की नाक में पुआल का टुकड़ा सट गया और वह चिल्लाने लगा. बोला कि पुआल उठानेवाले अंगसी से वह हम सबों का पेट फाड़ देगा. हमलोगों ने उससे कहा कि हम अपनी इच्छा से यहां नहीं आये हैं. हमें फादर ने भेजा है. अगर आपको आपत्ति हो रही है, तो हम जाते हैं. इस पर वह शांत हो गया. रात उसी कुम्बा में बितानी पड़ी. सुबह फादर को धन्यवाद देने हम सब गये. वहां हॉस्टल की लड़कियां दिखीं. वे रात वाली घटना को लेकर जानकारी दे रही थीं. इसके बाद हमारे साथियों को देखकर लड़कियों ने कहा कि हमलोगों ने रात को समझा कि डाकू लोग आये हैं. अगर इसे लेकर हल्ला हो गया होता, तो संभव था कि सभी मेहमानों का सेंदरा हो जाता.

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हौसलों, जज्बातों से मिला झारखंड

इसके बाद सभी साथी सिमडेगा गये. वहां हॉस्टल में मीटिंग की. फिर सभी कुरडेग चले गये. वहां भी रात होने पर फंस गये. रुकने के लिए सभी ने मुखिया के पास जाने का प्लान बनाया. उनके घर जाने पर उनकी मालकिन ने कहा कि मुखिया जी अभी घर पर नहीं हैं. सिमडेगा गये हैं. इस बीच एक दूसरा व्यक्ति वहां पहुंचा. मालकिन के इशारे पर पता चल गया कि वही व्यक्ति मुखिया है. उसे हम सबों ने जोहार किया और अपना परिचय दिया. कहा कि रात में यहीं रुकने की इच्छा है. मुखिया ने रात को अपने घर में ठहराया. पुआल बिछायी गयी. रातभर उनसे झारखंड आंदोलन के बारे में बात की. उन्हें आंदोलन को समर्थन देने को कहा. हालांकि उन्होंने कहा कि वे कांग्रेस समर्थक हैं.

सुबह होने पर सभी साथी सिमडेगा कॉलेज गये. वहां से गुमला, चैनपुर, डुमरी और फिर रांची लौटे. उस समय न तो समुचित साधन थे, न ही पैसा. इसके बावजूद मन में जज्बा, आत्मविश्वास और जोश लिये किसी डर के बिना झारखंड आंदोलन के लिए संघर्ष किया गया. उस दौरान एमसीसी या कोई नक्सली संगठन नहीं हुआ करता था.

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