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कहानियां झारखंड आंदोलन की-3 : 72 घंटे का झारखंड बंद, जिसने सरकार को हिला दिया था

Ranchi : साल 1989 में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्हें झारखंड आंदोलन का टर्निंग प्वॉइंट कहा जाता है. इनमें से एक घटना थी- ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) द्वारा 72 घंटे का झारखंड बंद. आजसू के आह्वान पर 72 घंटे का झारखंड बंद हुआ था. इस दौरान पूरे छोटानागपुर इलाके में सबकुछ ठप पड़ गया था. झारखंड आंदोलनकारी देवशरण भगत बताते हैं कि दो दिन में कई इलाके में रेलवे लाइन उड़ा दी गयी. सड़क मार्ग भी पूरी तरह से ठप हो गया था. माहौल हिंसक हो गया था. हालत यह हो गयी थी कि जो अलग राज्य के समर्थक नहीं थे, वे भी बाहर निकलने के लिए हरे रंग की पट्टी खोजने लगे थे, ताकि वे आंदोलनकारियों के प्रकोप से बच जायें. इस घटना से पहले झारखंड आंदोलन इतना हिंसक कभी नहीं हुआ था.

आंदोलन से जुड़े पुष्कर महतो ने कहा कि 72 घंटे के बंद के पहले दिन डोरंडा इलाके में काफी हलचल थी. बड़ी संख्या में आंदोलनकारी वहां जुट रहे थे. जितनी भी दुकानें थीं, सबको बंद कराया जा रहा था. कई लोगों की पिटाई भी की गयी. इस दौरान देखा गया कि डोरंडा स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया खुला हुआ है. बड़ी संख्या में आंदोलनकारी उसमें घुस गये और पैसे लूटने की कोशिश की. उस समय रांची के सिटी एसपी तेज तर्रार अरविंद पांडे थे. सूचना मिलते ही अरविंद पांडे और एसडीओ अवधेश कुमार दल-बल के साथ पहुंचे. बैंक को लुटने से बचा लिया गया. पुलिस ने बल प्रयोग किया और आंदोलनकारियों को तितर-बितर कर दिया. पुलिस ने दौड़ाकर कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया कई लोग फरार होने में सफल रहे. कई आंदोलनकारी दौड़ते हुए बीएमपी मैदान की दीवार फांदकर भाग गये.

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पुष्कर बताते हैं कि गिरफ्तार लड़कों में पथलकुदवा और सिरम टोली के कई युवाओं ने जेल में अपना-अपना नाम एवं पता गलत दर्ज कराया था. सभी पढ़नेवाले छात्र थे और अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जेल में अपना नाम व पता गलत दिया था. राजू महतो नामक आंदोलनकारी राजेंद्र महतो के नाम से जेल भेजे गये थे. प्रभात किरण लकड़ा, विल्सन लकड़ा, आनंद कुजूर, शांति प्रकाश लकड़ा सहित कई जवान लड़के जेल भेजे गये. वरिष्ठ पत्रकार बलबीर दत्त की पुस्तक झारखंड आंदोलन एक प्रत्यक्षदर्शी में दर्ज है कि 72 घंटे के बंद के दौरान राज्य में 512 आंदोलनकारी गिरफ्तार किये गये थे. लेकिन, आज तक बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में 72 घंटे के दौरान गिरफ्तार हुए लोगों का रिकॉर्ड नहीं है. पुराने आंदोलनकारी बताते हैं कि कई आंदोलनकारियों को मारकर फेंक देने की योजना थी. कई लोग मारे भी गये.

पर, इस बंद के दौरान इस इलाके में सबकुछ ठप हो गया था. इसी वजह से केंद्र सरकार के साथ त्रिपक्षीय वार्ता का द्वार भी खुला और झारखंड आंदोलन को बल मिला.

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