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रैट फीवर का फैलना है खतरनाक, जाने क्या है लक्षण

सबसे बड़ी बात यह है कि यह बैक्टीरिया पानी या मिट्टी में भी कई हफ्तों या महीनों तक जीवित रह सकते हैं. 

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NW Desk : लेप्टोस्पायरोसिस ( Leptospirosis ) को ही रैट फीवर के नाम से जाना जाता है. यह एक जीवाणु के कारण फैलता है. यह बुखार जानवरों से इंसानों को और जानवरों में भी फैलता है. रैट फीवर लेप्टोस्पिरा जीनस बैक्टीरिया के कारण पनपता है. यह संक्रमित जानवरों के मूत्र से फैलता है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह बैक्टीरिया पानी या मिट्टी में भी कई हफ्तों या महीनों तक जीवित रह सकते हैं.

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जाने रैट फीवर के कारण

रैट फीवर या लेप्टोस्पायरोसिस अत्यधिक बारिश होने के चलते बाढ़ जैसी स्थिति पैदा होने पर जब चूहों की संख्या बढ़ जाती है तो तेजी से फैलने लगता है. .

रैट फीवर के फैलने का कारण हैं चूहे. संक्रमित चूहों के मूत्र में काफी लेप्टोस्पायर्स होते हैं. जब यह बाढ़ के पानी में मिल जाते हैं तो लोगों तक संक्रमण फैलने लगता है.

Leptospira जीवाणु त्वचा या आंखों, नाक या मुंह की झल्ली के जरिए शरीर में घुसने लगते हैं. इनके लिए त्वाचा में प्रवेश पाना उस समय आसान हो जाता जब त्वचा पर किसी प्रकार का घाव हो.

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जाने रैट फीवर से बचने के उपाय 

  • इस बीमारी से बचने के लिए गंदे पानी में घूमने से बचा करें.
  • चोट लगी हो तो उसे ठीक से ढंकना जरुरी है.
  • बंद जूते और मोजे पहन कर चला करें. जिन लोगों को मधुमेह की बीमारी है उन लोग के लिए सावधानी खास तौर पर महत्वपूर्ण है.
  • अपने पैरों को अच्छी तरह से जरुर साफ करें और उन्हें मुलायम सूती तौलिए से सुखाया करें. 
  • गीले पैरों में फंगल संक्रमण होने की आशंका बढ़ सकती है
  • पालतू जानवरों को निरंतर टीका लगवाएं, क्योंकि वे संक्रमण के संभावित वाहक भी हो सकते हैं.
  • जो लोग रैट फीवर या लेप्टोस्पायरोसिस के शिकार होते है, उन्हें तालाब में तैरने से बचना चाहिए. 
  • केवल सीलबंद पानी ही पीना चाहिए. 

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क्या है रैट फीवर के नुकसान

रैट फीवर होने का प्रमुख कारण संक्रमित पानी पीना. अगर कोई संक्रमित पानी पी रहा है तो उसे रैट फीवर होने की संभावना बहुत बढ़ ही जाती है.

लेप्टोस्पायरोसिस गुर्दे की क्षति, मेनिनजाइटिस (मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के चारों ओर सूजन), लीवर की विफलता, सांस लेने में परेशानी भी होती है. यह मौत का कारण भी बन सकता है.

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जाने रैट फीवर के लक्षण

रैट फीवर के कुछ लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, ठंड, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, पीलिया, लाल आंखें, पेट दर्द, दस्त आदि शामिल हैं.

किसी व्यक्ति के दूषित स्रोत के संपर्क में आने और बीमार होने के बीच का समय दो दिन से चार सप्ताह तक का हो सकता है.

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