
Patna : बिहार भाजपा में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है. खबर है कि विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे के बाद उम्मीदवारी की दावेदारी समाप्त होने से निराश भाजपा के बागियों का नया ठिकाना लोक जनशक्ति पार्टी बन गयी है.
भाजपा के दिग्गज नेता और पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने बगावत कर दी है. टिकट नहीं मिलने से नाराज राजेंद्र सिंह मंगलवार को लोजपा खेमें में चले गये. उनके नक्शे कदम पर उपाध्यक्ष रहीं डॉ उषा विद्यार्थी ने भी बुधवार को लोजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. डॉ. विद्यार्थी अब पटना जिले के पालीगंज विधानसभा क्षेत्र से लोजपा की प्रत्याशी होंगी.
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राजेंद्र सिंह भाजपा के कद्दावर नेता रहे हैं
जानकारों की मानें तो राजेंद्र सिंह के दिनारा सीट से उम्मीदवारी का असर कहीं न कहीं भाजपा और जदयू दोनों के प्रदर्शन पर होगा. दरअसल, बिहार भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष रहे राजेन्द्र सिंह को इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया है. 2015 विधानसभा चुनाव में राजेंद्र सिंह ने दिनारा सीट पर उम्मीदवारी की थी, हालांकि वे हार गये थे.
इस बार भी वो इसी सीट से टिकट चाहते थे लेकिन जदयू-बीजेपी गठबंधन में ये सीट जदयू के खाते में चली गयी. राजेंद्र सिंह भाजपा के कद्दावर नेता रहे हैं, वे संघ के प्रचारक भी रह चुके हैं. 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान इन्हें भाजपा की तरफ से सीएम उम्मीदवार भी माना जा रहा था. उस समय इनके प्रचार के लिए देशभर से आरएसएस व एबीवीपी के कार्यकर्ता प्रचार के लिए आये थे.
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रामेश्वर चौरसिया भी अब बागी हो गये हैं
इसी तरह रोहतास जिले का नोखा विधानसभा क्षेत्र भी जदयू के हिस्से में चला गया है. ऐसे में वहां के चार बार विधायक और उत्तर प्रदेश भाजपा के सह-प्रभारी रहे रामेश्वर चौरसिया भी अब बागी हो गये हैं. उन्हें भी लोजपा अपने यहां शरण देना चाहती है, हालांकि अभी चौरसिया ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है. रामेश्वर चौरसिया ने कहा कि वर्ष 2000 से लेकर 2010 के विधानसभा चुनाव तक वह लगातार नोखा से जीतते रहे.
बिहार भाजपा के 10-12 नेता कभी भी पाला बदल सकते हैं
वर्ष 2015 के चुनाव में वह सिर्फ इसलिए हार गये थे कि परिसीमन के कारण उनके क्षेत्र का कुछ हिस्सा सासाराम में चला गया था, लेकिन उसके बावजूद वह अपने क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं.
जानकारी के अनुसार राजेंद्र सिंह के संपर्क में बिहार भाजपा के करीब 10-12 नेता हैं, जो कभी भी पाला बदल सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो बिहार चुनाव से पहले बीजेपी के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा. माना जा रहा कि जो भी नेता बीजेपी से अलग राह लेंगे उनकी नाराजगी की मुख्य वजह टिकट नहीं मिलना ही होगा.
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