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करार की मियाद पूरी, 26,000 करोड़ के प्रोजेक्ट में दो साल की देरी, 2019 में प्लांट से शुरू होना था बिजली उत्पादन

स्थापना दिवस समारोह में सीएम ने खुद स्वीकार किया, प्रदेश में बिजली की है दिक्कत, अब 2020 से  शुरू होगा उत्पादनतीन मई 2015 को राज्य सरकार और एनटीपीसी के साथ 4000 मेगावाट प्लांट के लिये हुआ था एमओयू

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Ranchi: राज्य गठन के बाद अब तक झारखंड में एक मेगावाट भी बिजली का उत्पादन नहीं बढ़ सका है. इसकी वजह यह है कि 18 साल में एक भी पावर प्लांट स्थापित नहीं हो पाया. तीन मई 2015 को राज्य सरकार ने एनटीपीसी के साथ पतरातू में 4000 मेगावाट पावर प्लांट के लिए करार किया था. करार के मुताबिक 2019 तक 800 मेगावाट की तीन यूनिटें स्थापित की जानी थी. 2019 तक 2400 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, जबकि 2023-24 तक एनटीपीसी को 800 मेगावाट की दो यूनिटें स्थापित किया जाना है. लेकिन, 2019 तक तीन यूनिट स्थापित नहीं हो पायेंगी. स्थापना दिवस समारोह में खुद सीएम रघुवर दास ने स्वीकार किया कि प्रदेश में बिजली की दिक्कत है और 2020 तक तीन यूनिट से उत्पादन शुरू होगा.

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क्या थीं करार की शर्तें

  • 2.73 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलेगी
  • राज्य सरकार को 85 फीसदी बिजली मिलेगी
  • 26000 करोड़ रुपये निवेश किये जायेंगे
  • 74 फीसदी राशि एनटीपीसी लगायेगी
  • 26 फीसदी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी
  • ऐसे चली प्लांट निर्माण की प्रक्रिया
  • तीन मई 2015 राज्य सरकार और एनटीपीसी के साथ एमओयू
  • ज्वाईंट वेंचर के लिए 29 जुलाई 2015 को करार
  • 28 सितंबर 2015 को सीएम ने ज्वाइंट वेंचर के गठन को स्वीकृति दी.
  • पीटीपीएस एसेट के लिए औने-पौने दाम पर लगाई गयी कीमत
  • 700 एकड़ जमीन- 474.6 करोड़
  • ऐश पोंड 1125 एकड़- 762.75 करोड़
  • रेलवे ट्रैक 34 एकड़- 23.05 करोड़
  • पीटीपीएस का एसेट-137.59 करोड़
  • प्लांट के लिए बनहर्दी कोल ब्लॉक भी आवंटित

पतरातू पावर प्लांट के लिए बनहर्दी कोल ब्लॉक का भी आवंटन हो चुका है. इस कोल ब्लॉक की ड्रिलिंग में 900 मिलियन टन कोयला होने का अनुमान लगाया गया है. कोयले की कीमत 33 हजार करोड़ रुपये आंकी गयी है. हर साल 20 मिलियन टन के हिसाब से 700 मिलियन टन कोयले की खपत होगी. एक पावर प्लांट की अधिकतम सीमा 35 साल होती है.

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कैसे पूरी होगी मांग,2019 तक चाहिये 5696 मेगावाट बिजली

2019 में 5696 मेगावॉट बिजली की जरूरत होगी. जबकि वर्तमान में पांचों लाइसेंसी मिलकर 3255 मेगावाट ही बिजली की आपूर्ति कर रहे हैं. डीवीसी के कमांड एरिया में अपना नेटवर्क की भी बात कही गयी है. कमांड एरिया में चतरा, गिरिडीह, कोडरमा, धनबाद, बोकारो, रामगढ़ और हजारीबाग आता है. फिलहाल इन जिलों में डीवीसी बिजली की आपूर्ति कर रहा है. जो मांग से 18.5 फीसदी कम ही है.

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पन बिजली परियोजना में भी पेंच

  • राज्य में 5 फीसदी भी पन बिजली नहीं,  हाइडल पावर प्लांट पर ग्रहण, 68 स्थान किये गये थे चिन्हित.
  • फीडबैक वेंचर को किया गया था परामर्शी नियुक्त, 400 मेगावाट बिजली उत्पादन का था लक्ष्य.
  • केंद्रीय मापदंड के अनुसार किसी भी राज्य में 60 फीसदी थर्मल पावर और 40 फीसदी हाइडल पावर का होना जरूरी.

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सोलर पावर में भी पेंच

  • गाइडलाईन की अनदेखी कर अफसरों ने तय किया था 2.50-3.50 की जगह 4.90-4.95 रू प्रति यूनिट रेट, टेंडर करना पड़ा रद्द.
  • फिर 2.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से 600 मेगावाट बिजली खरीदने का निर्णय लिया, नियामक आयोग ने भी रेट को नहीं दी स्वीकृति.
  • राज्य सरकार ने 2019 तक 2650 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का रखा है. लक्ष्य अब तक सिर्फ देवघर में ही 14 मेगावाट सौर ऊर्जा का ही उत्पादन.
  • राज्य में 0.2 फीसदी सौर ऊर्जा भी नहीं है.

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