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दर्द-ए-पारा शिक्षक: इच्छाओं को मारकर जीते हैं, दाल अगर बनी तो सब्जी नसीब नहीं

Chhaya

Ranchi : एक ऐसी महिला जो सास, देवर, पति और अपने तीन बच्चों का खर्च उठाकर घर चलाती है. वो भी सिर्फ पारा शिक्षक की नौकरी से मिलने वाले मानदेय से. अजीब बात है. लेकिन उस महिला की स्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वो किस तनाव से गुजरकर अपने परिवार का पालन करती है. वो भी इतने विषम परिस्थितियों में.

अपने सीरीज के दौरान न्यूज विंग को एक ऐसी ही पारा शिक्षिका मिली. जो साल 2005 से काम कर रही है. ये उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय सिठियो नयाटोली में कार्यरत है. इनका नाम लक्ष्मी रानी उरांव है. इनकी स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है  कि न्यूज विंग से बातचीत के दौरान ये शिक्षिका दो बार रो गयी. अपनी स्थिति बताते हुए इन्होंने कहा कि ससुराल तो ससुराल कई बार मायके की भी जरूरतों को इन्हें पूरा करना पड़ता है. इस वजह से कई बार पति से बकझक भी हो जाती है. पति की गांव में ही एक दुकान तो है, मगर वो भी राशन की नहीं है. बस कुछ उपरी सामान ही उसमें रखते हैं. गांव वाले कभी-कभार खरीदारी कर लेते हैं.

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इन्होंने खुद बताया कि ये अपने घर के लिये राशन दूसरे दुकान से खरीदती हैं. राशन कार्ड नहीं है, जिससे परेशानी ज्यादा है. दूसरे दुकानों में कर्ज बहुत ज्यादा है, सामान लेने जायें तो दुकानदार भी दस बातें सुना देते हैं. घर की स्थिति बस इतनी है कि किसी तरह से बस पेट भर रहा है.

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बिल नहीं देने पर काटी गयी बिजली, केस भी हुआ पर अब भी बकाया

घर के जरूरी सामानों के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि इच्छाओं को मारकर घर चला रहे हैं. इच्छाएं तो ऐसी बहुत हैं कि कम से कम नये कपड़े लें. नये कुछ सामान लें, लेकिन नहीं ले पाते. छोटी बेटी मेरे ही स्कूल में पढ़ती है. पैसा तो नहीं लग रहा. मगर दो बच्चे बड़े हैं, जिसमें से एक साइकिल से जाता है और दूसरी बेटी गाड़ी से जाती है. लेकिन उसे भेजने के लिए कई बार तो भाड़े के लिए पैसा नहीं होता है. तो कई बार तो दूसरों से पैसे मांगकर देते हैं, तब बेटी स्कूल जा पाती है.

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बिजली बिल का जिक्र करते हुए लक्ष्मी ने बताया कि पिछले साल इनकी बिजली काट दी गयी थी. बिजली बिल बीस हजार हो गया था. बिजली बोर्ड ने केस कर दिया. ऐसे में उधार लेकर कुछ पैसा तो चुकाया, लेकिन अभी भी सात माह का बिल बकाया है. उधार लेकर इतने बड़े परिवार को चला रही हूं. किस परेशानी में हूं ये कोई नहीं समझ सकता.

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सब्जी या दाल में कोई एक चीज ही पकती है घर में

आंखें नम करते हुए इन्होंने कहा कि घर में सब्जी या दाल में कोई एक चीज ही बनती है. छोटे छोटे बच्चें है लेकिन इन्हें पौष्टिक भोजन नहीं दे पाती. दाल बनने से सब्जी नहीं बनाती, बच्चे ऐसी ही खाते है. गांव में तो तरह तरह की सागें मिलती है. जिससे चल जाता है. वहीं गांव में पांच दस रूपये में गांव वालें पर्याप्त मात्रा में सब्जी दे देते है. नहीं तो बाजार से कभी भी सब्जी नहीं लेती. बीस रूपये किलो सब्जी खा नहीं सकते. क्योंकि पांच माह का मानदेय रोक के एक माह का मानदेय मिलता है. इन्होंने बताया कि इन्होंने गैस पिछले नवंबर से नहीं भराया है. घर में दूध पिछले चार साल से बंद है. बात चीत के दौरान इन्होंने कहा कि साल 2014 से ही मानदेय रोक रोक के दिया जा रहा है. तब से ही घर में दूध बंद है. नही ंतो पहले महीने के सात तारीक तक पैसे मिल जाते थे.

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कर्ज लिये तीन साल हो गये, लेकिन एक भी किस्त नहीं चुकायी

इन्होंने बताया कि साल 2016 में देवर की सड़क दुर्घटना हो गयी थी. सर में चोट आयी. इलाज महंगा था तो महिला समिति से 60 हजार का लोन लिया. जिसके लिये हर माह पांच सौ रूपये देने होते हैं. लेकिन तीन साल होने के बाद भी अब तक एक भी किस्त नहीं चुका पायी हूं. इसके लिये बाद में फिर से घर की जरूरतों के लिये 15 हजार का कर्ज ली. इन दोनों कर्ज के ब्याज भी बढ़ते जा रहे हैं. उम्मीद थी कि पारा शिक्षक की नौकरी में कभी न कभी स्थायीकरण होगा. इतना नहीं भी तो सरकार समय पर मानदेय दें. लेकिन ये भी नहीं हो रहा. स्थिति इतनी खराब है कि दो कमरे के घर को भी पूरा नहीं कर पा रहे. ये अपने मानदेय से संतुष्ट नहीं हैं.

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लोगों से बात तो सुननी है, घर से भी तनाव

इन्होंने पारिवारिक स्थिति बताते हुए कहा बहुत तनाव महसूस होता है. सास-बहु का रिश्ता काफी अजीब होता है. महसूस हो ही जाता है. सास कहीं न कहीं बोल ही देती है. लक्ष्मी ने बताया कि   हालांकि सास कुछ दूर देवर के साथ रहती है. बार-बार घर बनाने की बात कही जाती है. देवर से भी दस तरह की बातें कही जाती हैं. उनका कहना है कि जब तक घर नहीं बनाया जायेगा, तब तक नौकरी नहीं करेंगे.

ऐसे में वहां भी जरूरतें पूरी करनी होती हैं. इन परिस्थितियों को किसी के सामने कह भी नहीं सकते. महिला समिति से लिये कर्ज की बात करते हुए इन्होंने कहा कि महिला समिति की ओर से भी बार- बार पैसे की मांग की जाती है. जिसके कारण गांव में भी शिक्षक के रूप में इज्जत नहीं मिल रहा. कई बार तो झगड़ा हो जाता है. लेकिन हर किसी को कैसे कहें कि पैसे ही नहीं मिल रहे. गांव में तो अब बिलकुल भी इज्जत नहीं रही.

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