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दर्द-ए-पारा शिक्षक: गर्मी की छुट्टियों में दूसरे के घरों की मरम्मत कर चलाना पड़ा परिवार

Ranchi:  सम्मान से पेट नहीं भरता. पेट भरने के लिए पैसों की जरूरत होती है. कुछ लोग सम्मान तो देते हैं लेकिन कुछ लोग नहीं. किसी को जोर देकर तो नहीं कह सकते कि सम्मान दें. ये कहना है एक पारा शिक्षक का. ऐसे पारा शिक्षक जो नामकुम के सुदूर गांव हुआंगहातु में बच्चों को पढ़ाते हैं. नाम अनुप तिर्की. गवर्मेंट अपग्रेड मिडिल स्कूल हुआंगहातु में बच्चों को पढ़ते हैं.

साल 2006 से अनुप बच्चों को पढ़ा रहे हैं. अपने बारे में कहते हैं, सम्मान की क्या बात करें. आमदनी भी तो होनी चाहिए. समय इतना मिल नहीं पाता कि कुछ और करें. पारिवारीक खेती बाड़ी इतनी है नहीं कि साल भर अनाज मिले. राशन कार्ड है जिससे अनाज मिल जाता है.

लेकिन अनाज होना काफी नहीं है. बच्चों को पढ़ाने के अलावा जनगणना, सर्वे आदि के काम मिलते रहते हैं. जिसमें अपने ही पैसे लग जाते हैं. घर की स्थिति बताते हुए कहा कि ये कभी भी गैस सिलेंडर नहीं जलाते. क्योंकि पैसा इतना है नहीं कि गैस लें और हर महीने भरा सकें. जंगल है तो लकड़ियां मिल जाती हैं. जिससे काम चलता है.

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गर्मी की छुट्टियों में दूसरे के घरों में छप्पर बनाते थे

अन्य आजीविका के साधनों के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि समय तो इतना है नहीं की कोई अन्य आजीविका का विकल्प बनाकर रखें. इसलिए छुट्टियों के दौरान आसपास के घरों में ही कुछ कर के कमा लेते हैं.

गर्मी की छुट्टी की बात करते हुए इन्होंने कहा कि पचीस दिन लगभग स्कूल बंद था. इस दौरान आसपास के घरों में छप्पर बनाया. जिससे 120 से 200 रुपये तक की कमाई होती थी. गांव घर में होने के कारण लोग अधिक पैसे नहीं देते हैं. लेकिन बरसात के पहले लोग अपने अपने घरों की मरम्मत कर लेते हैं. जिस कारण काम मिल गया.

अन्य दिनों में तो घर के आंगन और थोड़ी बहुत खेत में सब्जियां होती हैं. इसी को बाजार में बेच लेते हैं. जिससे घर का ऊपरी खर्च चल रहा है. इतना नहीं होता तो और परेशानी होती. करमा पर्व के दौरान केंदू और भेलवा की टहनियों को बाजार में बेचते हैं.

वो भी नामकुम, धुर्वा, चुटिया जैसे बाजारों में जो इनके गांव हुआंगहातु से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं. ये दूरी साइकिल से तय करते हैं. क्योंकि किराये का पैसा नहीं होता और दूसरा विकल्प भी नहीं है.

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मानदेय से नहीं है संतुष्ट, बार-बार कर्ज लेना पड़ता है

मानदेय के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि ये अपने मानदेय से संतुष्ट नहीं है. इनके परिवार में पत्नी और तीन बच्चे हैं. मानदेय के कारण बच्चों को अच्छे स्कूल तक में नहीं पढ़ा सकते हैं. मानदेय कब मिलेगा ये तय नहीं रहता. दो बच्चें स्कूल जाते हैं. एक अभी छोटा है.

इन्होंने बताया कि मानदेय इतना कम है कि इच्छाएं मारके कर्ज चुकाना पड़ता है. घर परिवार में किसी को कुछ बीमारी हो जाने पर रिश्तेदारों से कर्ज लेना पड़ता है. घर का राशन भी उधार करके ही पूरा करते हैं. उधार का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि महिला समिति समेत कई रिश्तेदारों से कर्ज ले रखा है.

जो लगभग 30 हजार है. अप्रैल माह का मानदेय तो लोगों का कर्ज चुकाने में चला जा रहा है. फिर भी कर्ज पूरा नहीं हुआ है.

आने वाले दिनों में सरकार का रवैया ठीक नहीं ही रहेगा

पारा शिक्षकों की स्थिति पर फीकी हंसी देते हुए कहते हैं, आने वाले समय में भी लगता है सरकार का रवैया पारा शिक्षकों के लिए सही नहीं रहेगा. क्योंकि पिछले कुछ सालों में जिस तरह से सरकार की नीति रही है, उससे यही अनुमान लगाया जा सकता है. कहा कि पारा शिक्षक की नौकरी में आने से पहले ये बच्चों को ये ट्यूशन पढ़ाया करते थे. लेकिन अब इतना समय नहीं रहता. कहा कि सरकार कभी न कभी स्थायी करेगी.

इस उम्मीद से पारा शिक्षक की नौकरी पकड़ी थी. नहीं पता था कि इस हद तक घर परिवार के लोगों को परेशानी होगी. हर अवसर में कर्ज लेना पड़ता है. उम्मीद है कि सरकार अभी भी पारा शिक्षकों के मानदेय में बढ़ोतरी करे. नहीं तो घर परिवार तो चलने वाला नहीं. कम से कम नियमित मानदेय ही दे दें.

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