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दर्द-ए-पारा शिक्षक: बूढ़ी मां घर चलाने के लिए चुनती है इमली और लाह, दूध और सब्जियां तो सपने जैसा

Chhaya

Ranchi :  घर नहीं चलता मानदेय से. स्कूल के बाद या छुट्टी के दिनों में इमली, महुआ, लाह और कुसूम चुनते हैं. घर में वृद्ध मां है. जानती है घर नहीं चलता बेटे के मानदेय से. ऐसे में मां को कुछ न कुछ तो करना ही होगा. कुछ ये कहना है पारा शिक्षक हरि सिंह कैता का. इनकी मां कड़ी धूप में भी जंगलों में जाकर लाह चुनकर लाती हैं. न्यूज विंग की टीम जिस वक्त इनके घर पर पहुंची थी, तब इनकी मां लाह चुनकर लौटी ही थी. हरिसिंह और इनका परिवार सुदूर हुवांगहातु गांव में रहता है.

इस बारे में बताते हुए हरि सिंह ने बताया कि इमली, महुआ, लाह और कुसुम के बीज को स्थानीय बाजारों में बेचते हैं. जहां इमली से प्रतिकिलो इन्हें 20 से 25 रूपये किलो तक की आमदनी होती है. वहीं महुआ और कुसुम के बदले भी इन्हें इतना ही मिलता है. जबकि लाह प्रतिकिलो 150 से 200 रूपये किलो ये बेचते हैं. इन्होंने बताया कि स्कूल के बाद समय इतना मिलता नहीं है कि कुछ और विकल्प अपनाएं.

ऐसे में जंगल से बीज चुनकर ही घर चलता है. लेकिन एक किलो बीज जमा करने में समय ज्यादा लगता है. इन्होंने बताया कि आठ दिन में एक किलो लाह जमा होता है. लेकिन इसके पैसे अधिक मिलते हैं. वर्तमान में हरि गवर्मेंट अपग्रेडेड मिडिल स्कूल हुवांगहातु में कार्यरत हैं.

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कुछ बीज बेचकर और कुछ मां के विधवा पेंशन से चलता है घर

मानदेय बंद होने की बात करते हुए हरि ने कहा कि मानदेय सिर्फ फरवरी माह से बंद नहीं है. अक्टूबर से लेकर जनवरी तक सिर्फ एक बार ही मानदेय मिला. जबकि पारा शिक्षक नवंबर से हड़ताल पर थे और जनवरी में स्कूल जाने लगे थे. इसके बाद भी सिर्फ एक माह का मानदेय दिया गया.

हरि ने कहा कि मां बीज चुनकर लाती है, तो घर चल रहा है. फिर मां को मिलने वाला विधवा पेंशन भी है. जिससे तेल, सर्फ, साबुन का खर्च निकल जाता है. बातचीत के दौरान इन्होंने कहा कि पहले तो मानदेय नियमित मिलता था. ऐसे में मां के पैसे बचते थे. लेकिन फरवरी से स्थिति ऐसी हुई कि मां के बचे पैसे लगभग चार हजार पूरा ही खर्च हो गये. सिर्फ चार हजार से ही इतने दिनों तक घर का उपरी खर्च चला. इनके परिवार में इनकी मां, हरि की पत्नी और भाई का एक बेटा है. जिसकी जिम्मेवारी हरि पर ही है. उन्होंने बताया कि मां के कारण कर्ज नहीं हो रहा, कम ही सही लेकिन  कुछ काम तो चल ही जाता है.

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दाल, दूध, हरी सब्जियां नहीं लेते, हैसियत नहीं है

घर परिवार का जिक्र करते हुए इन्होंने बताया कि ये कभी भी दूध नहीं लेते. दाल और सब्जियां लेना तो चाहते हैं, लेकिन इतने पैसे नहीं की ले पाएं. पहले तो ले लेते भी थे, लेकिन अब नहीं ले पा रहे. स्थिति ही ऐसी हो गयी है. राशन कार्ड है जिससे अनाज मिल जा रहा. घर में थोड़ी बहुत खेती करते हैं, जिससे धान होता है और तीन-चार माह का अनाज मिल जाता है. लेकिन पिछले कुछ महीनों से तो यहीं अनाज बेचकर घर चला रहेल हैं. क्योंकि जरूरत होती ही है और 600 रूपये में घर नहीं चल सकता. खराब लगता है कि मां के पैसे लिए हैं.

हरि ने बताया कि कई बार नियमित मानदेय मिलने पर भी स्थिति ऐसी हुई है, जब जमीन गिरवी रखना पड़ा है. फरवरी से तो गिरवी नहीं रखा है जमीन. लेकिन वर्तमान में पेड़ गिरवी है. वो भी मात्र एक हजार रूपये में. इन्होंने बताया कि पेड़ इनके निजी जमीन में है, अब किसी तरह पैसे जमा करके पेड़ छुड़ाया जायेगा. हरी सब्जियां गांव में नहीं मिलती. बाजार जाना होता है, लेकिन इसके लिए भी 20 से 40 रूपये भाड़ा चाहिए होता है. जिससे लंबे समय से घर में हरी सब्जी नहीं बनी है.

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मानदेय से उधार और मुलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं

अप्रैल माह का मानदेय मिल चुका है. ऐेसे में इन पैसों से सबसे पहले उधार कर्ज चुकाया हूं. लेकिन  अभी भी एक हजार का कर्ज है, जो रिश्तेदारों से लिए हैं. इसके बाद मुलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं. कुछ पैसे बचाकर भी रखने होते हैं, क्योंकि घर में बीमारियां भी लगी रहती हैं. बीमारियों का जिक्र करते हुए इन्होंने मां को काफी लंबे से बुजुर्गों वाली कई बीमारियां हैं.

वहीं खुद हरि को भी लंबे समय से पेट दर्द की शिकायत है. जिसका ये इलाज पैसों के अभाव में नहीं करा पा रहे हैं. इन्होंने कहा कि पेट दर्द काफी लंबे समय से है और समय-समय पर ये होती रहती है. ऐसे में परेशानी बहुत है, लेकिन मानदेय के कारण इलाज नहीं करा पा रहे. उज्जवला योजना का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि उज्जवला योजना से गैस तो लिए, लेकिन पिछले आठ माह से सिलेंडर नहीं भरवा पाने की की वजह से गैस चूल्हा भी बंद है. अब जंगल से लकड़ियां चुनकर लाते हैं और उसी से खाना बनता है.

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मजदूरी करने के लिए राज्य के बाहर जाने की थी योजना: मानदेय की बात करते हुए इन्होंने कहा एक बार घर की स्थिति बहुत की खराब हो गयी थी. तब कुछ समझ नहंीं आ रहा था. योजना थी मजदूरी करने के लिए राज्य के बाहर चला जाउं. लेकिन परिवार वालों ने समझाया, खास कर मां और बहन ने कि कभी न कभी स्थिति अच्छी होगी. पैसे बढ़ेंगे. लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया. इन्होंने बताया कि ये मानदेय से संतुष्ट नहीं है और शायद कोई भी पारा शिक्षक संतुष्ट नहीं है. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता. परिवार वालों की बात से इस नौकरी में है.

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