Opinion

नरेंद्र मोदी सरकार के खाते में सफलताएं कम असफलताएं ज्यादा

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Manoj Kumar

नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली एनडीए की सरकार ने 6 साल पूरे कर लिये. वर्ष 2014 से वर्ष 2019 तक का प्रथम कार्यकाल सफल रहा और पुनः शानदार जनादेश प्राप्त कर दूसरे कार्यकाल का प्रथम वर्ष पूर्ण किया. गत दोनों लोकसभा के चुनाव में जनादेश हासिल हुआ और विभिन्न राज्यों के चुनावों में जो जीत मिली तथा अपने दल के व्यक्ति को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बनवाने में सफलता मिली. इससे तो लगता है कि नरेंद्र मोदी का कार्यकाल अब तक सफल रहा.

सत्ता पक्ष तथा इनके समर्थकों का कहना है कि अनुच्छेद 370 में संशोधन, अयोध्या मंदिर पर उच्चत्तम न्यायालय का निर्णय, तत्काल तीन तलाक की समाप्ति, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, जीएसटी, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, नागरिकता संशोधन आदि ऐतिहासिक कार्यों की वजह से यह सरकार पूर्ण सफल रही.

वहीं बीजेपी विरोधी राजनीतिक दल तथा उनके समर्थकों का कहना है कि मोदी सरकार असफल रही. उनका तर्क है कि नोटबन्दी एक गैर जरूरी कदम था. जिससे भारत की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी. सरकार का यह कहना कि नोटबंदी से ब्लैक मनी समाप्त हो जायेगा, नक्सल तथा आतंकवाद समाप्त हो जायेगा, नकदी लेन-देन कम हो जायेगी, अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी आदि. पर यह सभी घोषित लक्ष्य पाने में सरकार असफल रही तथा इसका नकारात्मक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ा, जो जीडीपी में दिखा भी. हां सैकड़ों लोगों को जान से हाथ भी धोना पड़ा, परेशानी हुई सो अलग.

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जीएसटी जिस वक्त लागू किया गया और जिस तरह से लागू किया गया, उससे लाभ की जगह नुकसान ही हुआ. जब अर्थव्यवस्था नोटबंदी की वजह से कमजोर हालत में थी, तभी जीएसटी को लागू किया जाना गलत था. “एक देश, एक टैक्स” सुनने में अच्छा है, पर टैक्स तो 5 स्तर का है. इस जीएसटी व्यवस्था से बिजली, पेट्रोलियम पदार्थ आदि कई चीज बाहर हैं तथा कई चीजों पर अव्यावहारिक टैक्स है, कई बार संशोधन हुए हैं. छोटे व्यापारियों को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है.

अयोध्या मंदिर निर्णय पर विपक्ष का कहना है कि यह न्यायालय का निर्णय है. कुछ ऐसा ही निर्णय हाइकोर्ट ने भी दिया था. उस वक्त यूपी और केंद्र में तो बीजेपी की सरकार नहीं थी. अतएव सरकार को इस निर्णय को अपनी उपलब्धि बताना गैरजरूरी है.

तीन तलाक आज भी है. हां, इंस्टेंट तीन तलाक पर कानून बना कर एक अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास हुआ. पर क्या रुक गया? कानून तो बाल विवाह के विरुद्ध भी है, कानून तो दहेज प्रथा के विरुद्ध भी है और व्यवहार में यह दोनों कुप्रथा लागू है.

उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत अपने क्रियान्वयन की वजह से मकसद से भटक चुका है.

नागरिकता संशोधन में धार्मिक आधार होना भारत के संविधान के विपरीत है. यह केवल धार्मिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण के मकसद से किया गया.

विपक्षी दलों तथा उनके समर्थकों का यह भी आरोप है कि आज लोकतंत्र ही सुरक्षित नहीं है. क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता खतरे में है. चाहे न्यायपालिका हो, केंद्रीय सतर्कता आयोग हो, चुनाव आयोग हो, रिजर्व बैंक हो समेत अन्य सभी संस्थाओं को सरकार अपने प्रभाव में ले चुकी है या लेने के प्रयास में है. और जब ये संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र नहीं रहेगी, तो हमारा लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रहेगा.

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विरोधियों का यह भी आरोप है कि यह सरकार केवल भावनात्मक मुद्दों को छेड़ कर चुनावी हित साधने का कार्य करती है और इसके बाद भी चुनावी सफलता न मिले तो जोड़तोड़ कर, राज्यपाल का दुरुपयोग कर सत्ता हड़प लेती है. जैसे मणिपुर, गोवा, बिहार, कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि.

विरोधियों का यह भी आरोप है कि विपक्षी नेताओं को फंसाने का कार्य किया जा रहा है. विपक्षी सरकारों को परेशान किया जा रहा है. बहुमत के बल पर ताबड़तोड़ कानून बनाये जा रहे हैं. अध्यादेश के द्वारा भी कानून बन रहे हैं. सरकार हर कार्य को चुनावी मकसद से कर रही है तथा हर वक्त सरकार चुनावी मोड में रहती है. एक और गंभीर आरोप यह कि सरकार की गैरजरूरी आक्रमक नीतियों की वजह से पारंपरिक मित्र पड़ोसी देशों से भी भारत के रिश्ते खराब हो रहे हैं.

खैर पक्ष और विपक्ष का अपना अपना तर्क व कुतर्क है. पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस सरकार में साहसिक निर्णय लेने की क्षमता है. दुश्मन देशों को मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत है. यह हिम्मत स्पष्ट जनादेश की वजह से भी है. वहीं आर्थिक क्षेत्र में इस सरकार को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है. यह सही है कि नोटबंदी अपने मकसद में असफल रहा तथा जीएसटी के क्रियान्वयन में कमी है. देश में अविश्वास का माहौल बन रहा है. कई संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह खड़े होते रहे हैं. आज कोरोना रूपी महामारी के वक्त कई कमियां दृष्टिगोचर हो रही हैं. मजदूरों की घर वापसी, ट्रेनों का भटकाव, मजदूरों की मृत्यु, भूखमरी आदि मानव त्रासदी जिससे निपटने में हमारी सरकार असफल रही है. लॉकडाउन जरूरी पर है, पर लंबे समय तक नहीं. 30 जनवरी के बहुत बाद लॉकडाउन किया जाना भी समझ से परे. लॉकडाउन के पहले मजदूरों के बाबत सही और पर्याप्त तैयारी का न होना भी इस त्रासदी की विभीषिका को बढ़ाने का काम किया. लॉकडाउन के पूर्व सभी राज्यों को विश्वास में न लेना भी उचित नहीं. राहत पैकेज तथा उसके क्रियान्वयन में कमियां स्पष्ट हैं. खैर सरकार से उम्मीद कि अपनी कमियों को दूर कर शेष कार्यकाल में जनता की बेहतरी के लिए काम करे. लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करे. शुभकामना.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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