Opinion

मोदी सरकार का एक साल: बंटा हुआ भारत और पाई-पाई के मोहताज राज्य

Soumitra Roy

दोबारा कुर्सी संभाले एक साल पूरा होने पर मोदी ने देशवासियों के लिए एक चिट्ठी लिखी है. चिट्ठी सभी अखबारों में छपी है. पहले पन्ने पर. चिट्ठी में आत्मनिर्भर भारत,  20 लाख करोड़ के पैकेज और मज़दूरों की बदहाली पर पहले तो घड़ियाली आंसू बहाए गए हैं. चिट्ठी के अगले हिस्से में इसे लिखने का असली मंतव्य सामने आया है. 2019 की जीत को सही ठहराने की कोशिश.

जनशक्ति, राष्ट्र शक्ति, सबका साथ-सबका विकास जैसे शब्द इतिहास के गर्भ में अब सड़ने लगे हैं. मोदी और उनकी बीजेपी के पास आज ऐसा कुछ नहीं है कि वे जीत का जश्न मना सकें. बीते 5-6 साल में विकास, लोगों की जिंदगी बदलने और भ्रष्टाचार खत्म करने के सारे दावे तार-तार हो चुके हैं.

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नागरिक अधिकार, प्रेस और मीडिया की स्वतंत्रता, देश को एक सक्षम, शक्तिशाली प्रशासन देने के दावों के चिथड़े उड़ चुके हैं. पूरी दुनिया देख रही है कि कोरोना संक्रमण काल में मोदी की सरकार हालात को संभालने की जगह अनियोजित रोडमैप और भ्रष्टाचार के खुले खेल से लोगों की जान को खतरे में डाल चुकी है. इकोनॉमी और जीडीपी के कल आये आंकड़े साफ बताते हैं कि मोदी अपनी दूसरी पारी में नाकाम हो चुके हैं.

सिर्फ स्वास्थ्य तंत्र ही नहीं,  देश के मौजूदा संसाधनों के आपातकालीन स्थितियों में नियोजन भी सरकार के बस में नहीं रही. दूसरी पारी शुरू होते ही मोदी ने पूरे देश को पुलिस राज में बदल डाला. देश को सांप्रदायिक रूप से ही नहीं,  राज्यों के स्तर पर बांटने में भी उनकी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. मोदी ने देश के संघीय ढांचे को तार-तार कर दिया है.

अब तो यह भी निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आगे अगर देश बाढ़ या सूखे की विभीषिका झेलता है, तो भी मोदी सरकार सारी जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ देगी.
कैग की रिपोर्ट उठाकर पढ़ लीजिये. सरकार का राजस्व संकलन, राजस्व घाटा दोनों आज गंभीर हालत में हैं. ये कोरोना काल से पहले की स्थिति है. यानी मोदी के पहले कार्यकाल में GST और नोटबन्दी दोनों प्रयोग नाकाम हुए हैं. 77% छोटे-मझोले उद्योगों के पास सैलरी देने तक का पैसा नहीं है.

FISME की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि 62% MSME छंटाई का रास्ता अपनाने जा रहे हैं. कोरोना संक्रमण ने देश में 22 करोड़ बेरोजगार पैदा कर दिए हैं. आगे यह 50 करोड़ तक जा सकता है. राज्यों को बाज़ार से उधार लेने को कहा गया है. देश के दर्जन भर राज्य कंगाल हो चुके हैं. मोदी सरकार ने उन्हें पाई-पाई के लिए मोहताज़ कर दिया है.

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मोदी के बुलेट ट्रेन का दावा रेलगाड़ियों के रास्ता भटकने और 9 दिन में ढाई कोस की घटनाओं से ध्वस्त हो चुका है. खुद प्रधानमंत्री पर पीएम केयर्स के नाम से चंदा हड़पने के गंभीर सवाल हैं. PPE किट के दर्जनों घोटाले उजागर हो चुके हैं. खुद उनका ही गुजरात गंभीर घोटाले, अव्यवस्था, अराजकता के बीच फिलहाल लाशें उगल रहा है.

आत्मनिर्भर भारत के नारे को देश के मज़दूरों ने पैदल, साइकिल, रिक्शा और सड़क पर पैदा हुए बच्चे और बूढ़े मां-बाप को गोद में उठाकर घर पहुंचने की अदम्य कोशिश के रूप में जान देकर साबित किया है. करीब 700 जानें गई हैं. मोदी लाशों पर खड़े हैं. कोरोना का प्रकोप भारत में इतना नहीं हुआ होता, अगर सरकार एयरपोर्ट पर जांच में सावधानी बरतती.

लेकिन उसने एमपी की कमलनाथ सरकार गिरने तक का इंतज़ार किया. खुद सरकार के मंत्री तब कोरोना गो का नारा दे रहे थे. फिर मोदी किस आधार पर जीत के जश्न को जायज़ बता रहे हैं? क्या उन्हें अपने गुजरात की बदहाली दिखाई नहीं देती, जहां के वे 2001 से 2014 तक सीएम रहे?

मोदी का 5 ट्रिलियन इकोनॉमी का दावा भी अब जुमला बन गया है. खुद अर्थशास्त्री यह मान रहे हैं कि देश अगले 2 साल तक सिर नहीं उठा सकेगा. आप निष्पक्ष सर्वे करवा लीजिये. देश की 136 करोड़ की आबादी में लगभग आधे यह मानेंगे कि 2019 में मोदी को राष्ट्रवाद के नाम पर वोट देना एक बड़ी ग़लती थी.

इसके बावज़ूद अगर प्रधानमंत्री की चिट्ठी की भाषा इस कदर अहंकार, गर्व और बेबुनियाद तथ्यों से भरी है तो यही कहना होगा कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि. आने वाले समय में देश इसे सच होता जरूर देखेगा और भुगतेगा.

डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं.

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