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संघर्ष के बल पर मुन्नी ने बनाई अपनी राह, हाथों के स्वाद ने समाज में दिलाया नया मुकाम

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…

Chhaya

Ranchi : कहते हैं कि संघर्ष करते रहना ही जिंदगी जीने का दूसरा नाम है. लेकिन अगर हौसले बुलंद हो तो मंजिल तक पहुंचना बेहद आसान हो जाता है. देश की कई महिलाओं का नाम आज बेहद चर्चित है. लेकिन कुछ महिलायें ऐसी भी हैं, जो अपने संघर्ष की बदौलत एक मुकाम हासिल कर चुकी हैं. लेकिन उन्हें जानने वाले बहुत कम लोग हैं. आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर एक ऐसी ही महिला की कहानी को साझा कर रहे हैं. जिन्होंने कई मुसीबतों को झेला और एक मुकाम तक पहुंच गयी हैं. ये कहानी है हिंदपीढ़ी के बंशी चौक की निवासी मुन्नी कुजूर उर्फ रानी की. जिनके हाथों में इतना स्वाद है कि लोग तारीफ करते नहीं थकते.

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मुन्नी दूसरों के घरों में बरतन धोती थी. दुकानों में झाड़ू लगती थी. हर दिन का सौ रूपया कमाती थी. बड़ी मुश्किल से ही परिवार का गुजारा कर पाती थी. लेकिन किसे पता था कि एक दिन ऐसा भी आयेगा कि मुन्नी के हाथों का स्वाद ही एक नयी पहचान दिला देगी. कभी झाड़ू और बरतन करने वाली मुन्नी ने अपनी जिंदगी में बहुत संघर्ष किया है. पिछले 25 सालों से खाना बनाने का काम कर रही हैं. शादी, पार्टियों या बड़े-बड़े रेस्टोरेंट से भी मुन्नी को खाना बनाने का ऑर्डर मिलता है. शुरूआती दौर में थोटे-मोटे बर्थडे पार्टी में खाना बनाने से शुरू हुआ मुन्नी का काम धीरे-धीरे रांची शहर और उसके बाद राज्य से होते हुए दूसरे राज्यों में फैला. खुद मुन्नी ने बताया कि कभी सोचा नहीं था कि खाना बनाने से इतनी प्रसिद्धी मिलेगी. उन्होंने बताया कि अब काफी संतुष्टि होती हैं कि लोग मेरे खाने के कारण मुझे जानते हैं. उन्होंने कहा कि मैंने कभी संघर्ष से मुहं नहीं मोड़ा.

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शादी पार्टियों में बरतन धोया करती थी

संघर्ष के बल पर मुन्नी ने बनाई अपनी राह, हाथों के स्वाद ने समाज में दिलाया नया मुकाम
प्रतीकात्मक तस्वीर

अपनी शुरूआती जिंदगी के बारे में बताते हुए मुन्नी ने बताया की पहले वो शादी, पार्टियों में खाना बनाने वाले कुक के साथ बरतन धोने का काम किया करती थी. काम के दौरान ही कुक कभी-कभी उन्हें मसाला पीसने, चिकेन या पनीर आदि फ्राई करने के अलावा सब्जियां बनाने भी काम कई बार  दिया करते थे. मुन्नी ने बताया कि ये काम करते हुए लगा कि जब मैं दूसरों के साथ रहकर इतना कर सकती हूं, तो खुद का व्यवसाय क्यों न चलाऊं. इसके बाद मुन्नी ने छोटे स्तर पर अपना बिजनेस शुरू किया. इसके बाद धीरे-धीरे इनके पास शादियों का और फिर दूसरे राज्यों से भी खाना बनाने के ऑर्डर आने लगे.

सीमेंट की बोरियों में कपड़ा भरकर बेचती थी

प्रतीकात्मक तस्वीर

शादी, पार्टियों में बरतन धोने का काम करने से पहले मुन्नी मेन रोड स्थित उर्वशी टेक्सटाइल्स में काम करती थी. जहां ये दुकान में झाडू लगाने के साथ ही यहां आने वाले कपड़ों को छांटती थी. इसमें से कुछ कपड़े ऐसे रहते थे, जो बेकार निकलते थे. मुन्नी इन कपड़ों को सीमेंट की बोरियों में बांधकर घर लाती थी और दस रूपये बोरे बेचती थी. उन्होंने बताया कि ऐसा करके वो 50 रूपया तक कमाती थी. यहां काम करते हुए इन्होंने दूसरों के घरों में काम भी किया. इनकी तीन बेटियां और दो बेटे हैं. जो इनके काम में इनकी सहायता करते हैं.

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दस लोगों की है टीम

प्रतीकात्मक तस्वीर

इन्होंने बताया कि इनकी वर्तमान टीम दस लोगों की है. जहां जितने लोगों की जरूरत होती है, वहां उतने ही लोगों को लेकर मुन्नी जाती हैं. इसके पहले भी इनके साथ काफी लोगों ने काम किया. इनमें से कुछ जरूरतमंद लोगों को इन्होंने प्रशिक्षण भी दिया और काम भी.

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मेरठ में सीखा खाना बनाना

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इन्हें कभी भी प्रोफेसनली खाना बनाने की ट्रेनिंग नहीं मिली. दस साल की उम्र में ये मेरठ के घरों में काम किया करती थी. खाली समय में इन्हीं घरों में मुन्नी कई तरह का खाना बनाना सीखा. मुन्नी ने जानकारी दी कि उस वक्त इसका जरा भी एहसास नहीं था कि दस साल की उम्र में सीखी हुई हुनर आगे चलकर काम आएगी. उन्होंने बताया कि मेरठ में इन्होंने पंजाबी, बिहारी, साउथ इंडियन समेत अन्य वेरायटी का खाना बनाना सीखा.

अंग्रेजी जानती तो अच्छा होता

प्रतीकात्मक तस्वीर

अपनी शिक्षा के बारे में मुन्नी ने बताया कि वो कभी स्कूल नहीं गई हैं. ऐसे में दूसरे राज्यों में जाने से उन्हें भाषा को लेकर बहुत परेशानी होती है. कई बार लोग हिंदी बोल नहीं पाते हैं और मुन्नी को अंग्रेजी आती नहीं. खुद में लगता है कि अगर अंग्रेजी भाषा आती तो बेहतर रहता. शायद बिजनेस और अच्छा चलता.

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दिल्ली से मिलते हैं ज्यादा ऑर्डर

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मुन्नी ने बताया कि उनके पास सबसे ज्यादा ऑर्डर दिल्ली से आते हैं. पहला ऑर्डर भी दिल्ली का ही था. वहीं मुंबई, पुणे, हैदराबाद, बिहार के अलावा सूरत से भी इनके पास लगातार ऑर्डर आते हैं. उन्होंने कहा कि पहली बार दिल्ली जाने का अनुभव काफी अजीब था. क्योंकि वे कभी पहले बाहर गई नहीं थीं. मेट्रो में चलना और दिल्ली जैसी जगह में जाकर काम करना काफी अलग था. लेकिन अब इस काम में अच्छा लगता है.

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