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शायद फिर झारखंड के गांव में एक नयी आवाज सुनने को मिले की मनरेगा नहीं मरेगा

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Deb Malia

मनरेगा एमआईएस में ऐसे कई प्रावधान कर दिए गए है. जिसको किए बिना अगला काम नहीं किया जा सकता है, जैसे कि डीपीआर फ्रीज किए बिना जीईओ टैगिंग नहीं हो सकती, जीईओ टैगिंग किए बिना मस्टर रोल नहीं निकल सकती. तीन बार जीईओ टैगिंग होनी जरूरी है. परिसंपत्ति निर्माण के दौरान और इसकी नियंत्रण स्थानीय प्रशासन के हाथों में नहीं छोड़ा गया है. इसमें बड़े पैमाने में कार्य खुलने में बाधाएं आ रही है और निरंतर बिना रुके कार्य चल नहीं सकती. पिछले साल मनरेगा एमआईएस में मजदूरों के 100 दिन के डिमांड एंट्री होने पर ऐसा चेक लगा दिया गया था कि कोई मजदूर अगर  दिन का डिमांड कर दिया तो आगे उसके डिमांड पे मस्टर रोल नहीं निर्गत हो सकती है, फिर चाहे वो भले ही 100 दिन काम न किया हो. ऐसी केंद्रीकृत व्यवस्था में केंद्र सरकार अब राज्यों को फण्ड Sanction करती है और ऐसा करने के लिए उनकी अपनी प्रशासनिक प्रक्रिया भी है. मान लीजिए किसी मजदूर ने काम किया पर प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण राज्य को पैसा Sanction नहीं हुआ तो मजदूरी मजदूरों की रुकेगी, प्रशासनिक पदाधिकारियों की नहीं, ऐसी व्यवस्था है एमआईएस.

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पंचायत के प्रतिनिधि मनरेगा में रूचि नहीं लेते

अक्सर एमआईएस में देखा गया है कि तथ्य सही नहीं होते क्यूंकि अभी भी बड़े पैमाने में हर जगह बिना मस्टर रोल के या किसी दुसरे के जॉब कार्ड पर काम करने की प्रक्रिया चलती है. फेक डिमांड या फेक मस्टर रोल निकालना, अभी भी उतना ही आसान है जितना की पहले था.  ठेकेदारों के ऊपर नियंत्रण एमआईएस से नहीं की जा सकती है और योजना बनाओ अभियान के तहत जो ग्रामीणों को अपनी योजनाओं को चयन करने का एक मौका मिला था अब वो भी खत्म कर दिया गया है. पंचायत के प्रतिनिधि मनरेगा में रूचि नहीं लेते क्यूंकि ना इसमें उनको प्रशासनिक स्वीकृति देने का कोई अधिकार है और न भुगतान करवाने का, ना उनको शिकायतों के निवारण करने  का कोई रास्ता दिखता है.  सब कुछ इतना केंद्रीकृत है की स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही पूरी तरह से खत्म ही हो गयी है और एमआईएस पर संख्या का खेल चल रहा है.  हर जगह सामाजिक अंकेक्षण से यह दिखता है कि योजनाओं के विषय पर जो तथ्य एमआईएस पर नजर आती है, ज्यादातर तथ्य सही नहीं पाए जाते है. 14% योजनाएं ऐसी है जिसमें बिलकुल काम नहीं हुआ और सारे पैसे की निकासी हो गयी है. राज्य भर से सुनने को मिलता है कि मजदूरों का आधार किसी दुसरे के बैंक खाते से लिंक हो जाने की वजह से मजदूरी दुसरे के खाते में चली जा रही है. बड़े पैमानें में ठेकेदार कार्यरत है. 100% डीबीटी टारगेट जल्द पूरा करने के लिए सही मजदूरों के जॉब कार्ड को डिलीट किया जा रहा है. भ्रष्टाचार वहीं के वहीं है. बस इसकी प्रक्रियाएं बदल गयी है. पॉवर एमआईएस समझने वालों के हाथों में और ज्यादा सीमित हो गयी है.

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कई रोजगार सेवक छोड़ रहे है अपनी नौकरी 

सरकार की Good Governance की और एक नयी निदर्शन मनरेगा में सिटीजन इनफार्मेशन बोर्ड और सात रजिस्टर है. सिटीजन इनफार्मेशन बोर्ड के माध्यम से योजना की जानकारी पब्लिक को जाती है और 7 रजिस्टरों में पंचायतों में चल रही कार्य का विश्लेषण किया जाता है. यह विचार काफी अच्छा है लेकिन इसका क्रियान्वयन हास्यास्पद है. आजकल रोजगार सेवक एमआईएस से रिपोर्ट निकाल निकाल कर साथ रजिस्टर में सांटते हुए दिखते है, जिससे उनका काफी समय भी बर्बाद होता है. एमआईएस की गलत तथ्य पंचायत की सात रजिस्टर में भी आ जाती है और बिना वजह अधिकारियों का समय भी नष्ट होता है. कई रोजगार सेवक इन कारणों से अपनी नौकरी भी छोर रहे हैं. राज्य में करीब १५% रोजगार सेवक की वैकेंसी है. यह ना केवल काम को रोक रही है बल्कि मनरेगा को भी जमीनी स्तर में खत्म कर रही है. रजिस्टर अगर रखना ही था तो क्यूँ नहीं पहले काम किया गया की तथ्य रजिस्टर में एंट्री होता और उसके बाद एमआईएस में, इस तरह पारदर्शिता भी व्यवस्था में आती. पर सरकार को अपनी एमआईएस में इतना ज्यादा भरोसा है की यह भूल गई है की उनमे एंट्री करने वाले उसी व्यवस्था के अंग है. जिस व्यवस्था को सुधारने का कोई कोशिश किए बिना ही एक तकनीकी समाधान ला दिया गया.

अगर केंद्र सरकार चाहे तो एमआईएस का इस्तेमाल को सही तरीके से और भुगतान की प्रक्रिया को तकनीकी मदद से विकेन्द्रित तरीके से भी कर सकती है. अगर सरकार की मंशा हो तो मनरेगा की क्रियान्वयन को एमआईएस से  डी-लिंक कर इसके तथ्य की एंट्री कार्य के पश्चात एक सप्ताह के अन्दर भी किए जा सकते है.  कार्य का तथ्य दर्शाना ही उद्देश्य है तो जरूरी नहीं की क्रियान्वयन पूरी तरीके से एमआईएस पर निर्भर कर दिया जाए. जिससे की  अलग अलग समस्याए पैदा होती है. केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि देश के हर एक कोने में हर एक गाँव टोला में एक तरीके से एक ही जैसे कार्य नहीं चल सकते और हर जगह की अलग अलग खासियत और प्रक्रियाएं है, उनको बिना समझे सिर्फ एमआईएस की मदद से व्यवस्था में गुणवत्ता और पारदर्शिता लाने की कोशिश हमेशा बिफल ही रहेगी.

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व्यवस्था में गुणवत्ता और पारदर्शिता लाने की कोशिश हमेशा बिफल

सरकार को यह मूल बात समझनी चाहिए कि मनरेगा का सफल क्रियान्वयन निर्भर करता है सिर्फ दो बातों पर, सही समय पर काम मिलना और सही समय पर सही भुगतान मिलना. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकारा है कि स्टेज टु डिले यानि एफटीओ सिगनेचर  होने से लेकर मजदूर की खाते में राशि जमा होने तक की देरी अभी भी ५७% है. सिर्फ ४३% भुगतान ही सही समय पर हो पाते है. उसमे भी ऐसे कई भुगतान है जो दुसरे के खाते में जाती है. ऐसी भी कई भुगतान है जो एयरटेल पैमेंट बैंक में चली गयी थी. तकनीक जरूरी है पर इंसान के जरुरत अनुसार. तकनीक ऐसी नहीं चाहिए जो इंसान को इतना निर्भर कर दे कि इंसान तकनीक का  गुलाम बन जाए.

परिसम्पत्तियों का निर्माण भी तभी हो पाऐगा जब मजदूरों को सही समय पर पूरा भुगतान होगा. यह ज़रूरी नहीं की एक केंद्रीकृत व्यवस्था से ही Good Governance संभव है. विकेंद्रीकृत व्यवस्था से भी Good Governance संभव  है. इसका उदहारण हमलोग केरल में देख चुके है.

मनरेगा में भुगतान समय पर मिलने से मजदूरों की रूचि बनी रहेगी. यह सरल बात है कि जितनी जल्दी केंन्द्र सरकार को समझ आ जाए उतना अच्छा है, शायद फिर झारखंड के गांव में एक नयी आवाज सुनने को मिले की मनरेगा नहीं मरेगा अगर समय पर भुगतान मिलेगा.

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(यह लेखक के निजी विचार है .)

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