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झारखंड के गांव-गांव की आम कहावत “मनरेगा में जो काम करेगा वो मरेगा”

“मनरेगा तो मरेगा”

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Deb Malia

झारखंड के किसी भी गांव में चले जाइए और नरेगा शब्द का बस ज़िक्र कर दीजिए, उसके बाद आपको जो सुनाई देगा, वो तीन शब्द, झारखंड में पिछले 12 सालो की नरेगा की कहानी को दर्शाता है. “मनरेगा तो मरेगा” या “मनरेगा में जो काम करेगा वो मरेगा” यह झारखंड के गांव में एक आम कहावत बन चुकी है. झारखंड के गांव-गांव और टोला-टोला तक मनरेगा का नाम तो पहुंचा है पर काम नहीं. मनरेगा एक जन हितकारी योजना होने के बावजूद आज सिर्फ एक उपहास और मुहावरा बन कर रह गयी है.

क्यों मनरेगा में काम ही नहीं करना चाहते है लोग

झारखंड जैसा राज्य, जिसमें करीब 50% से ऊपर आबादी किसी न किसी प्रकार से मजदूरी के ऊपर निर्भर है. इस राज्य के प्राकृतिक संसाधनों के विकास में मनरेगा जैसी योजना वरदान साबित हो सकती थी. लेकिन क्यों, ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है. लोग आजकल मनरेगा में काम ही नहीं करना चाहते.
आज भी झारखंड के किसी भी क्षेत्र में किसी भी गांव में जाने से यह पता चलता है कि मनरेगा मजदूरों की मजदूरी बड़े पैमाने पर बकाया है. 2011 से लेकर 2018 तक ऐसे सैकड़ों मजदूर मिलेंगे, जिनकी मजदूरी बकाया है. इसके भी कई कारण है. कई ऐसे मजदूर हैं जिन्होंने काम तो किया, लेकिन मास्टर रोल में नाम नहीं होने के कारण उनको मजदूरी नहीं मिली. मनरेगा में ऐतिहासिक रूप से ठेकेदारी चलती आयी है जो ठेका में मजदूरों को काम करवाती है तथा उनको पूरी मजदूरी से वंचित रखती है. ऐसी कई योजनाएं है जो बिना लाभुक या मजदूरों को पूछे ही बंद हो गई जिसके कारण मजदूरों को आखिरी के कई सप्ताह की मजदूरी मिल नहीं पायी है. ऐसे मजदूर अब मनरेगा से इस कदर परेशान हो चुके हैं कि दोबारा इस योजना में काम नहीं करना चाहते. 

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मनरेगा योजना से खत्म हो रही है मजदूरों की रूचि

मनरेगा में यह प्रावधान है कि मजदूर अपने समय और सुविधा के हिसाब से काम की डिमांड करेंगे और कम से कम 14 से लेकर 100 दिन तक का काम की मांग एकसाथ कर सकते हैं. प्रशासन की जिम्मेवारी है कि वो 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध करवाएं और अगर ऐसा वो नहीं कर पाए तो मजदूर ऐसे में बेरोजगारी भत्ता का हक़दार होगा. मनरेगा नियंत्रण मजदूरों तथा ग्रामीणों के हाथ में रखने के लिए यह प्रावधान काफी उपयोगी है. लेकिन दुख की बात यह है कि झारखंड में मनरेगा का डिमांड सिस्टम कभी स्थापित हो ही नहीं पाया, डिमांड और बेरोजगारी भत्ते जैसे शब्द महज कानून के प्रावधान बनकर रह गये है. जबकि पूरा काम ठेकेदारी से चलता रहा. गरीब मजदूरों को काम से मतलब था. कानूनी प्रावधानों की जागरूकता न होने की वज़ह से और स्थानीय प्रशासन, स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति, समूह तथा ठेकेदारों की मिलीभगत से इस योजना का पूरा लाभ कभी भी जरुरतमंद ग्रामीणों के हाथ में पहुंच नहीं सका. मजदूरी देरी से मिलना, कम मिलना या तो नहीं मिलना काफी साधारण बात हो गयी और मजदूरों की रूचि इस योजना से धीरे-धीरे खत्म हो रही है.

मजदूरी का बड़ा हिस्सा स्थानीय अधिकारी तथा ठेकेदारों के पॉकेट में

जब राज्य में मनरेगा मजदूरी में कैश पेमेंट की नीति अपनाई गयी तो मनरेगा के कामों में तेजी आती हुई नजर आई थी. हालांकि उस वक्त भी मजदूरों को पूरी मजदूरी नहीं दी जाती थी और मजदूरी का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी तथा ठेकेदारों के पॉकेट में जाता था.
राज्य सरकार ने हमेशा से ही मनरेगा की मुलभुत समस्याओं को दरकिनार किया. मजदूरों की जागरूकता बढ़ाने के लिए कभी कोई कोशिश नहीं हुई. मजदूरों को यह भी नहीं पता था कि आवेदन या शिकायत देना है तो दे किसे ? हां, यह बात ज़रूर थी कि अपनी मजदूरी नहीं मिलने पर मजदूर जरूर स्थानीय मुखिया, ठेकेदार या फिर रोजगार सेवक या बैंक से जवाब मांगते थे. कई ऐसे उदहारण है जहां मजदूरों ने अपने हक की मजदूरी आन्दोलन के माध्यम से हासिल की है, ऐसा इसलिए संभव था क्योंकि चाहे मनरेगा कैसे भी चलायी जा रही थी. मजदूरी भुगतान की प्रक्रिया में स्थानीय प्रशासन की भूमिका तो थी. जो कि कुछ सालो में खत्म कर दी गयी और EFMS के माध्यम से केंद्रीकृत प्रक्रिया से मजदूरी भेजने का निर्णय लिया गया.

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झारखंड में मनरेगा योजना की प्लानिंग हमेशा से ही ऐसी रही है. जिसमें ग्रामीणों को अपनी योजनाओं को पारित करवाने के लिए क्षेत्रीय पदाधिकारी या ठेकेदारों को पैसे देने पड़ते हैं. हालांकि मनरेगा कानून में योजना चयन में ग्राम सभा की भूमिका तथा शक्ति साफ है. मनरेगा को कानून से ज्यादा योजना बनाकर रखने में सरकारी तंत्र और उनसे जुड़े ठेकेदार और बिचौलियों का फायदा था. इसीलिए ग्राम सभा महज ग्रामीण, प्रशासन के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया.

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गरीब परिवार अपने पैसे लगाकर योजनाएं लेने की हालात में नहीं

शुरुआत से झारखंड में कुआं, बड़े तालाब और मिट्टी-मुरम सड़कें, यह तीन बड़ी योजनाएं ही लिए जाते थे. जिसमें एक समय तक बड़े पैमाने में मजदूरों की संख्या कार्यस्थल में दिखती भी थी, लेकिन योजनाओं के चयन की तरह क्रियान्वयन की प्रक्रिया भी उतना ही ढीली-ढाली रही. ज़्यादातर योजनाओं को भौतिक रूप से अपूर्ण हालत में ही बंद कर दिया जाता रहा. इन परिसम्पत्तियों की गुणवत्ता के विषय में भी जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा है. कुआं एक ऐसी योजना थी जो कि बड़े मात्रा में पूर्ण हुई हालांकि मजबूरी में कुआं मालिकों ने अपनी राशि लगाकर भी कुएं का काम पूरा किया. योजनाओं का चयन और क्रियान्वयन प्रक्रिया ऐसी थी कि गरीब परिवार अपना पैसे लगाकर योजनाएं लेने की हालात में नहीं थे. गरीब परिवार योजनाओं में कम पैसों में मजदूरी करते थे और यहां तक कि किसी और के जॉब कार्ड में भी काम करते थे. जिसके कारण उनको पूरी राशि उपलब्ध नहीं हो पाती थी.

(यह लेखक के निजी विचार है .)

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