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मनरेगा व्यवस्था में गुणवत्ता, पारदर्शिता और दोगुनी जवाबदेही लायी जाये

मनरेगा सिर्फ एक मशीनरी लैंग्वेज बन गया

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Deb Malia

मनरेगा की शिकायत निवारण व्यवस्था कानून तो बहुत ही शक्तिशाली है. लेकिन धरातल पर कभी पहुंच ही नहीं पाई. स्थानीय अधिकारी तथा ठेकेदार, मजदूरों और गरीबों के लिए इतने अपरिहार्य बन चुके थे की लाख शोषित होने के बावजूद ग्रामीण मजबूरी में या डर से शिकायत करने के लिए राजी नहीं थे. ग्रामीणों के लिए सरकारी लाभ न मिलने पर शिकायत करने की रीति कभी रही ही नहीं थी. हां, ग्रामीणों की शिकायत और जवाबदेही मांगने की अपनी मौखिक प्रक्रिया जरूर थी और ग्रामीण कई बार किसी भी शिकायत निवारण प्रणाली से ज्यादा कारगर भी साबित होते थे. लेकिन वो तब, जब जवाब आने की उम्मीद थी. केंद्र सरकार की डिजिटल गवर्नेंस की केंद्रीकृत व्यवस्था ने सभी स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तो खत्म कर दिया पर सारे स्थानीय समस्याएं पैदा करने वाले लोग वहीं के वहीं रह गये थे.

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पोस्ट ऑफिसों में लम्बी लाइन लगने की प्रक्रिया चालू

मजदूरों की बैंक या पोस्ट ऑफिस के खाते में मजदूरी भेजने के निर्णय से मजदूरों को फायदा जरूर हुआ था. अपनी पूरी मजदूरी उनके खाता में पहुंच जाती थी. लेकिन वहीं एक नयी परेशानी यह शुरू हुई कि बैंक और पोस्ट ऑफिसों में लम्बी लाईन लगने की प्रक्रिया चालु हो गयी थी. मजदूरी की निकासी करने के लिए मजदूरों को कभी-कभी 2-3 दिन भी बैंक या पोस्ट ऑफिस जाने पड़ते थे. मजदूरों को यह भी कहते सुना गया है कि हाथ में मजदूरी मिलना ही बेहतर था. भले ही उसमें कुछ पैसे काट के दिये जाए. क्योंकि बार-बार बैंक या पोस्ट ऑफिस आने में खर्चे भी काफी होने लगे थे. पोस्ट ऑफिस के पेमेंट में भारी गड़बड़ी चालु थी. क्योंकि पोस्ट ऑफिस से कोई भी किसी भी व्यक्ति की मजदूरी की निकासी कर सकता था और बिचौलियों का दबदबा और ज्यादा बढ़ चुका था. यह तो मनरेगा के डिजिटल हो जाने के पहले की बात है.

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व्यवस्था में गुणवत्ता, पारदर्शिता और दोगनी जवाबदेही लायी जाए

मनरेगा के क्रियान्वयन को दो युगों में बांट के देखना चाहिए. एक प्री-डिजिटल और दूसरा पोस्ट–डिजिटल.
प्री-डिजिटल युग में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर था और स्थानीय प्रशासन, प्रभावशाली और ठेकेदारों का गुट पूरी तरह गरीब मजदूरों का शोषण कर रहा था, हालांकि मनरेगा का नियंत्रण तब भी स्थानीय लोगों के हाथ में था और मजदूर चाहे तो अपने हक को मांगने के लिए स्थानीय प्रशासन तथा अधिकारियों को जवाबदेह ठहरा सकते थे.

मनरेगा के स्थानीय भ्रष्टाचार को समझते हुए तकनीक की सही और विकेंद्रित उपयोग से व्यवस्था में गुणवत्ता, पारदर्शिता और दोगनी जवाबदेही लायी जाए. केंद्र सरकार ने सामाजिक और स्थानीय समस्याएं तथा उसके जटिल आपसी संबंधों को एक तकनीकी समाधान देने की कोशिश की, जिसने मनरेगा को अस्पताल के जेनरल वार्ड से सीधा आईसीयू में भर्ती कर दिया.

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मनरेगा सिर्फ एक मशीनरी लैंग्वेज बन गया

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अभी राज्य और देश भर में मनरेगा सिर्फ एक तकनीकी भाषा बनकर रह गयी है. जिनको समझने वाले चंद लोग ही है और वो अब मनरेगा के सम्पूर्ण नियंत्रक बन चुके है. प्रखंड से लेकर दिल्ली तक आज मनरेगा सिर्फ और सिर्फ एक मशीनरी लैंग्वेज बन चुकी है. जिसकी भाषा या तो सरकारी पदाधिकारी को समझ आती है. नहीं तो शहर में पढ़े-लिखे सामाजिक कार्यकर्ताओं को और दोनों एक-दूसरे से खूब झूझते भी रहते है. लेकिन सच बात तो यही है कि ग्रामीण मजदूरों को न तो मनरेगा का MIS समझ आता है और न उनको MIS से कोई मतलब होना चाहिए. केंद्रीकृत और आधार से जुड़ी हुई DBT भुगतान प्रणाली से देरी से भुगतान की समस्याएं घटी तो नहीं. लेकिन नयी-नयी समस्याएं पैदा हो रही है. रिजेक्टेड पेमेंट की बढ़ती हुई समस्याएं हो, चाहे किसी के आधार से किसी दूसरे का बैंक खाता लिंक हो जाने की समस्या हो. मजदूरों के पास इन कठिन परेशानियों को समझने का न वक्त है और न जरुरत. सबसे मज़ेदार बात यह है कि प्रशासन को भी इनमें से कई समस्याएं समझ नहीं आती और ज्यादातर समस्याएं ऐसी हैं जिसका समाधान प्रखंड प्रशासन के हाथों में है ही नहीं.

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स्थानीय जवाबदेही को खत्म कर देना घातक

FTO के बाद होने वाली देरी का समाधान करने का कोई पॉवर भी इनके हाथ में नहीं है. FTO से लेकर मजदूरों के खाते में मजदूरी जमा होने तक की देरी को आज के दिन में MIS में देरी के हिसाब से दर्शाया भी नहीं जाता है. इस देरी की गणना भी Delayed Compensation में नहीं होती है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट का इस विषय में आदेश आ चुका है और MIS में इस देरी को दर्शाते हुए, इस देरी के जिम्मेवार व्यक्ति से जुर्माना लिए जाने की बात भी की गयी है. हालांकि अभी तक ऐसा कोई परिवर्तन नज़र नहीं आता है. MIS ने स्थानीय जवाबदेही को इस कदर खत्म कर दिया है कि अब मजदूर अपनी मजदूरी मांगने के लिए पंचायत या प्रखंड जाते हैं तो क्षेत्रीय पदाधिकारी उन्हें या तो MIS के भाषा में समझा देते है या फिर केंद्र सरकार से पैसे नहीं आये हैं, ये कहकर वापस भेज देते हैं.

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पिछले साल तीन बार केंद्र सरकार से करीब एक से दो महीने तक झारखंड राज्य को राशि उपलब्ध नहीं करवाई गयी. जिसका जिम्मेवार कोई भी हो, मजदूर तो नहीं. जिन्होंने ने काम तो किया पर पंद्रह दिनों में मजदूरी या देरी भुगतान का मुआवजा दोनों में से कुछ भी नहीं मिला. योजनाओं को एकाएक बिना किसी के मंजूरी के बंद करने से लेकर भुगतान करने तक की सारी पॉवर केंद्र सरकार के पास है. पंचायत और प्रखंड महज दर्शक बने बैठे हुए है.

(यह लेखक के निजी विचार है .)

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