Opinion

52 लाख को रोजगार दे ही दिया, तो भाजपा को ऐसे ही मिलेंगी 14 लोस सीटें, तो माफी क्यों मांग रहे…

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Faisal Anurag

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखंड के लोगों से कहा है कि यदि उनसे कोई गलती हुई है तो वे उन्हें माफ करें. लोकसभा चुनाव के पहले और कोलेबिरा चुनाव में हार के बाद मुख्यमंत्री के इस बयान के राजनीतिक मायने हैं. एक ओर रघुवर दास ने अपनी सरकार की चार साल की उपलब्धियों को जोर-शोर से प्रसारित-प्रचारित किया है फिर वे किस बात के लिए माफी मांग रहे हैं. यदि उनके विकास संबंधी दावे सही हैं तो इसका राजनीतिक आत्मविश्वास भी दिखना चाहिए. पूरे देश सहित झारखंड में भी भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक आत्मविश्वास 2014 की तरह नहीं दिख रहा है. रघुवर दास और उनकी सरकार का दावा है कि रोजगार और स्वरोजगार मुहैया कराने के क्षेत्र में उनकी सरकार ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है. दावे के अनुसार सरकार ने 35 लाख लोगों को रोजगार या स्वरोजगार मुहैया कराया है और 17 लाख महिलाओं को महिलामंडल से जोड़ कर उन्हें स्वरोजगार दिया है. इस तरह सरकार का दावा है कि उसने 52 लाख लोगों को बेरोजगारी के दायर से बाहर करने में कामयाबी पायी है. सरकार के इस दावे के बाद भी वह राजनीतिक तौर पर विश्वस्त नहीं दिख रही है. इस दावे की हकीकत को यदि दरकिनार कर दिया जाए तो रघुवर दास और उनकी पार्टी को पूरे आत्मविश्वास के साथ राजनीतिक तौर पर इस भरोसे में दिखना चाहिए कि इसका बड़ा लाभ उन्हें किसी भी चुनाव में मिलेगा.

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कोलेबिरा के उपचुनाव में देखा गया कि 2014 की तुलना में भाजपा के वोट में कमी आयी है और राज्य में हुए उपचुनावों में एक को छोड़ कर सबमें उसे हार का सामना करना पड़ा है. यदि 52 लाख लोगों को सरकार ने रोजगार दिया है तो उसे इस बात का भरोसा होना चाहिए कि प्रति परिवार दो वोट निश्चित तौर पर गांरटी के साथ मिलेंगे. 52 लाख लोगों का मतलब है कि राज्य के एक करोड चार लाख मतदाता भाजपा के लिए निश्चित ही वोट करेंगे. राज्य में 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 2.08 करोड़ वोटर हैं जिनमें 1 करोड़ 48 लाख 73 हजार 41 मतदाताओं ने अपने मत प्रतिशत का इस्तेमाल किया था. 2019 में इसमें कुछ नए मतदाता भी जुड़ेंगे. क्या भारतीय जनता पार्टी और विशेष कर मुख्यमंत्री को इस बात का भरोसा है कि वह 2014 से बेहतर चुनाव परिणाम देने की स्थिति में है और नए पुराने मतदाताओं का रुझान उसकी तरफ है. भाजपा को भी आंतरिक तौर पर इसका भरोसा नहीं है. रोजगार संबंधी दावे की असलियत पर यहां चर्चा नहीं की जा रही है. राज्य सरकार के दावे के अनकूल ही वोट रुझान के बारे में यहां उल्लेख किया जा रहा है.

राजनीति यदि विकास के सवाल को केंद्र में रख कर हो तो लोकतंत्र के लिए इससे अच्छी बात कुछ नहीं हो सकती है. लेकिन भाजपा की चुनावी तैयारी को देखते हुए कहा जा  सकता है कि भाजपा, आरएसएस और उसके अनुषंगी संगठन जिन सवालों को प्रमुखता से उठा रहे हैं, उनमें विकास संबंधी उपलब्धियों पर भरोसा नहीं दिखाया जा रहा है. झारखंड में भी देखा जा रहा है कि सामाजिक-धार्मिक धुवीकरण की प्रक्रिया तेज की जा रही है और विकास के कार्यों पर भरोसा का अभाव इस प्रवृत्ति में साफ दिख रहा है. राज्य की वर्तमान सरकार ने तीन अरब रुपये अपने प्रचार के कार्यों में खर्च किया है जो अब तक झारखंड की किसी भी सरकार का रिकार्ड है. यदि विकास के कार्य किये गये हैं तो उसका प्रचार जरूर किया जाना चाहिए लेकिन प्रचार प्रसार पर जोर का निहितार्थ यह होता है कि जमीनी हकीकत पर भरोसा का नहीं होना. झारखंड में विकास को ब्रांड बनाने पर पूरा जोर है लेकिन इसे चुनावी कामयाबी का मंत्र नहीं माना जा रहा है यह राजनीतिक तथ्य बार बार उभर कर सामने आ रहा है.

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