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हरिवंश जी का ‘आहत’ होना!

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Srinivas

हरिवंश जी ने यदि गत बीस सितंबर को राज्यसभा में अपने साथ हुए कथित दुर्व्यवहार से ‘आहत’ होकर उपवास की घोषणा न की होती और राष्ट्रपति के नाम लिखे अपने लम्बे चौड़े पत्र में अपने आदर्शों और प्रेरक विभूतियों में गांधी, जेपी, लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और महात्मा बुद्ध का उल्लेख न किया होता, तो मैं इस मुद्दे पर कुछ लिखने से शायद परहेज कर जाता. दुविधा उनके साथ लंबे समय तक काम किये होने के कारण बन गये सहज व आत्मीय रिश्ते की वजह से थी. उनके उपवास की खबर देख कर पहले तो लगा कि शायद उनको अपने किये पर भी कुछ अफ़सोस हुआ होगा; या कम से कम इस बात के लिए कि एक महत्वपूर्ण अवसर पर वे सदन का संचालन कुशलता से नहीं कर सके. लेकिन नहीं, वे तो विपक्षी सांसदों के अमर्यादित आचरण से ‘मर्माहत’ हो गये! बेशक उन सदस्यों  के आचरण की कोई प्रसंशा नहीं कर सकता, कर भी नहीं रहा है. लेकिन आपने क्या किया? देशहित के महत्वपूर्ण विधेयकों पर मत विभाजन की मांग के बावजूद ‘ध्वनिमत’ से बिल पास करवाने की सरकार की मंशा और उसमें आसन के अमर्यादित पक्षपातपूर्ण आचरण को भी कैसे उचित ठहराया जा सकता है?

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दो पल के लिए भी आंख मूंद कर उन महापुरुषों को याद करते हुए पूछते कि ऐसे अवसर पर वे क्या करते, तो शायद उन्हें एहसास हो जाता कि उनसे कहां चूक हो गयी. लेकिन ऐसे आत्म मूल्यांकन की उनको जरूरत कहां है अब.

आगे कुछ कहने से पहले यह कहना जरूरी लग रहा है कि यह महज संतुलन साधने के लिहाज से पत्रकार और संपादक के रूप में उनकी क्षमता व उपलब्धियों के बखान का अवसर नहीं है. वह सब सर्वविदित है. फिर भी एक बात का उल्लेख जरूर करूंगा कि उन्होंने एक ‘कांग्रेसी’ अखबार का चरित्र बदल दिया; और जब देश में संकीर्ण और आक्रामक हिंदुत्व अपने फन फैला रहा था, तब उन्होंने इस अखबार को उस उन्माद में बहने से बचा रखा था, इसे एक ‘झारखंडी’ पहचान दी और देश की साझा संस्कृति का मंच/जरिया बनाये रखा.

मेरा उनसे निजी रिश्ता भी कभी कटु या असहज नहीं रहा, स्पष्ट वैचारिक मतभेदों के बावजूद. और इसका क्रेडिट उनको भी जाता है कि वे मुझ जैसे बेबाक और उनके हिसाब से ‘बेअदब’ मातहत का भी लिहाज करते रहे,  इसलिए यह मेरे लिए कोई हिसाब चुकाने का अवसर भी नहीं है. पर धीरे धीरे सब कुछ बदलता गया.

इसलिए आज हरिवंश जी का ‘दूसरा चेहरा’ दिखाने का मौका है. जिस तरह उन्होंने ‘रविवार’ में रहते हुए अपने समय के ‘बाहुबली’ नेता सूरजदेव सिंह (अब दिवंगत) का ‘दूसरा चेहरा’ दिखाया था. यानी ‘समाजसेवी’ सूरजदेव, ‘कोमल हृदय’ सूरजदेव. एक पत्रकार कैसे अपनी कलम के जोर पर काले को सफेद साबित कर सकता है, वह कवर स्टोरी इस बात की शानदार मिसाल थी/है.

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जब उन्होंने बिहार में लालू-राबड़ी के ‘जंगल राज’ के खिलाफ छिड़े महाभारत में ‘प्रभात खबर’ को जदयू/एनडीए का ‘पांचजन्य’ बना दिया, वह भी एक सम्मानित पत्रकार की बाजीगरी का आलीशान नमूना था.

लेकिन अभी इससे बड़ा कमाल होना शेष था. 2014 के पहले वे बाकायदा जदयू में शामिल होकर राज्यसभा के सदस्य बन चुके थे. ’14 के संसदीय चुनाव में पराजय के बाद जब ’15 के विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार ने ‘जंगल राज’ के प्रणेता लालू प्रसाद के साथ मिल कर चुनाव लड़ा, जीत कर सरकार भी बना ली, तब यह जिज्ञासा स्वाभाविक थी कि जदयू प्रवक्ता के रूप में हरिवंश जी उस बेमेल व अवसरवादी गंठजोड़ को डिफेंड करेंगे या उससे दूर हो जायेंगे. मगर नहीं! वे टीवी डिबेट में ‘सांप्रदायिकता’ को सबसे बड़ी समस्या और उस गंठजोड़ को जरूरी बताते हुए भाजपा के खिलाफ तर्क देते नजर आये! हालांकि तब वे एकदम हास्यास्पद और ‘बेचारे’ दिखते थे. फिर जब राज्यसभा के उप सभापति बन गये, तब तो वह रास्ता यहां पहुंचना ही था.

वैसे भी मुझे उनके इस अंदाज से कोई अचरज नहीं हुआ. इसलिए कि जेपी के गांव ‘सिताब दियारा’ का और चंद्रशेखर के नजदीकी होने के कारण उनके ‘समाजवादी’ होने का जो मुगालता शुरू में हुआ था, वह तो दो-तीन साल में ही टूट चुका था. इसलिए उन्होंने अध्यक्ष के रूप में पक्षपात किया या सरकार की बदनीयती में उसका साथ दिया, यह मेरे लिए कोई अनहोनी बात नहीं थी. देश की सर्वोच्च जन प्रतिनिधि सभा (संसद) के उच्च सदन के उप-सभापति के आसन पर बेईमानी का आरोप लगा, यह भी नयी बात नहीं थी! लेकिन तब उस आसन पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा था, जिसके साथ हमने कभी काम किया था, जिसका हम सम्मान करते रहे हैं और जो मेरी बिरादरी (पत्रकार) का एक प्रतिष्ठित नाम रहा है, यह जरूर खल गया.

ये जातिवादी हैं या नहीं, नहीं कह सकता, लेकिन ये सामाजिक न्याय या आरक्षण के घोर विरोधी हैं, पूंजीवाद व निजीकरण के पक्षधर हैं, इसमें कोई संदेह नहीं. ऐसा आदमी खुद को समाजवादी और जेपी, डॉ लोहिया और कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श बताये, तो क्या कहा जाये! हां, एक और घोषित समाजवादी नीतीश जी के साथ रहने की यह शर्त हो सकती है, इतना समझा जा सकता है.

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और गोडसेवादियों के सान्निध्य और उनकी कृपापूर्ण छत्रछाया में रहते हुए भी गांधी का नाम! लेकिन जब मोदी ऐसा कर सकते हैं, तो हरिवंश क्यों नहीं?

हां, जेपी पर इनके कॉपीराइट को चुनौती नहीं दी जा सकती. सिताब दियारा के जो ठहरे.

लेकिन बुद्ध! कम से कम इस महामानव को तो बख्श देते.

वैसे हरिवंश जी के अनेक सराहनीय कार्यों में से एक यह भी है कि उन्होंने रांची में स्तरीय व्याख्यानमाला का आयोजन कर रांची वासियों देश के चुनिंदा पत्रकारों व विद्वानों को सुनने का मौका दिया. वे कुछ प्रतिष्ठित संपादकों को दफ्तर बुला कर उनके साथ अपने सहयोगियों की मुलाकात व चर्चा का भी आयोजन करते थे. इसी क्रम में भोपाल से आये संभवतः नयी दुनिया के संपादक (नाम याद नहीं) की कही एक बात मुझे हमेशा याद रहती है. यह कि पत्रकार और संपादक को सत्ता से संभव दूरी बना कर रखनी चाहिए. मगर मैंने देखा यह कि सत्ता से संभव निकटता बनाने का प्रयास होता रहा. और अब तो…

अंत में प्रभात खबर की एक घटना, जिससे पता चलता है कि दूसरों के मान-सम्मान का इनके लिए कितना महत्व रहा है. संस्थान के बहुतेरे सहकर्मियों को जो झेलना पड़ा, इसके सामने तो वह कुछ नहीं है.

संभवतः वर्ष ’98 या ’99 का वाकया है. पेस्टिंग विभाग (जो बाद के दिनों में गैरजरूरी हो गया) के कर्मचारी अपनी कुछ मांगों को लेकर संस्थान के गेट पर धरना दे रहे थे. पहले तो धीरे-धीरे उनमे से कुछ को धमकी व प्रलोभन देकर तोड़ लिया गया. तीन-चार दिनों के बाद प्रबंधन (व्यवहार में जिसका मतलब हरिवंश ही होते थे) के बुलावे पर एक स्थानीय ‘बाहुबली’ नेता गुंडों के झुंड के साथ आया, शांतिपूर्ण धरना दे रहे लोगों पर हमला कर दिया. उनका टेंट उखाड़ दिया, चौकी तोड़ दी. सभी जान बचा कर भागे. कमाल यह कि उल्टे धरना दे रहे लोगों पर ही मुक़दमे कर दिये गये! बाद में कुछ ने सरेंडर किया, कुछ महीनों थाने के चक्कर काटते रहे.

(बेशक उस घटना के मूकदर्शक बने रहने के लिए संस्थान के हम जैसे तमाम कर्मचारी उस ‘पाप’ के भागीदार’ थे.)

और आप विपक्षी सांसदों के ‘दुर्व्यवहार’ से ‘आहत’ हो गये!

पुनश्च : पत्रकारिता के क्षेत्र में हरिवंश जी का एक बड़ा योगदान यह रहा है कि उनके संपादकत्व और संरक्षण में प्रभात खबर ने सक्षम युवा पत्रकारों की नर्सरी का काम किया. आज रांची के अन्य अखबारों के अलावा विभिन्न शहरों में उनके सान्निध्य में तैयार हुए बहुतेरे पत्रकार स्थापित हैं.

मगर… मगर अफसोस कि उनमें से एक भी अब तक उनके किये के; या उनके उपवास के बचाव में आगे नहीं आया है!

ऐसे ही एक पत्रकार मित्र की यह टिप्पणी मुझे उल्लेखनीय और सांकेतिक लगी-

प्रतिमा विसर्जन की बेला आयी!

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)

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