Opinion

बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय: सत्ता का “गुलाम” बनते नौकरशाह

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“थाना में बैठे ऑन ड्यूटी,

बजाए हाय पांडेजी सीटी!”

Vishnu Rajgarhia

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किसी सभ्य समाज के लिए यह चिंता की बात होगी कि थाने में ड्यूटी पर तैनात पांडेजी ‘सीटी’ बजा रहे हैं. लेकिन यह बिहार जैसा कोई राज्य हो, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसपर लहालोट हो सकते हैं. मीडिया इसपर सवाल नहीं करेगा, गॉशिप लिखेगा. समाज भी चिंतित नहीं होगा, आनंद लेगा.

यह एक मास हिस्टीरिया का दौर है. सत्ता ने लोकतंत्र को मजाक बना लिया है. इसके लिए सत्ता ने कुछ नौकरशाहों को रखैल बना लिया है. अब किसी मर्यादा की उम्मीद मत करना.

बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय ने चुनाव लड़ने के लिए VRS मांगा. सरकार ने तत्काल स्वीकृति दी. आदेश में लिखा है कि कम-से-कम तीन माह पूर्व आवेदन देने का नियम है. लेकिन इसे “क्षांत” करते हुए तत्काल स्वीकृति दी जाती है.

किसी युवा पुलिस अफसर या सामान्य आरक्षी को अपनी प्रोन्नति परीक्षा या बेहतर विकल्प के लिए किसी मामूली स्वीकृति की जरूरत पड़ती है, तो यही गृह विभाग महीनों उस फाइल की जलेबी बनाता है. विधि विभाग का मंतव्य तक मांग लिया जाता है. लेकिन डीजीपी साहब अगर ऑन ड्यूटी सीटी बजाने में महारत रखते हों, तो उनके लिए सारे नियम “क्षांत” हो जाते हैं.

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यह मेहरबानी क्यों? इसलिए कि इन्हीं डीजीपी ने सुशांत को न्याय दिलाने के नाम पर तमाशा करके बिहार की जगहंसाई कराई? क्या सुशांत की हत्या और 17 करोड़ की हेराफेरी जैसे आरोपों पर अब मुंह खोलेंगे पांडेय जी? एक नागरिक रिया चक्रवर्ती को औकात बताने की बात करके सामंती उन्माद पैदा करने के एवज में उन्हें तीन माह की यह छूट मिली?

क्या मुम्बई के मामले की बिहार में एफआइआर दर्ज करके जांच टीम भेजने की नाटकीय कार्रवाई को अब भी जायज ठहराया जाएगा? अगर हां, तो अन्य राज्यों में बिहारियों को न्याय दिलाने के अन्य मामलों का क्या होगा?

अखिल भारतीय सेवाओं IAS, IPS की बड़ी इज्जत रही है. लेकिन सत्ता की रखैल बने कुछ सिविल सर्वेंट्स ने इन सेवाओं की इज्जत भी धूल में मिला दी है. क्या इनके एसोसिएशन खुलकर सामने आएंगे? अथवा इन अवसरवादी प्रवृत्तियों को ही अब सिविल सर्विसेज का सामान्य नियम समझ लिया जाएगा?

इन्हीं डीजीपी साहब ने पहले भी चुनाव लड़ने के लिए VRS स्वीकृत कराया था. लेकिन टिकट नहीं मिली, तो आवेदन वापस मांग लिया. तर्क यह दिया गया कि आवेदन देते वक्त उनकी “मानसिक स्थिति” ठीक नहीं थी.

उनका VRS रद्द करके वापस सेवा मिलना भी कम बड़ा चमत्कार नहीं था. यह उन युवा आइएएस आइपीएस के लिए एक सीख थी, कि सत्ता की रखैली करो, तो सारे नियम कानून तोड़े जा सकते हैं. अगर किसी ईमानदार अफसर का मामला हो, जो सत्ता को पसंद नहीं, तो उसका हाल गुजरात के संजीव भट्ट जैसा कर दिया जाएगा.

पांडे जी ने ऑनड्यूटी सीटी बजाते हुए सुशांत प्रकरण का बिहार चुनावों के लिए दुरुपयोग करते हुए सिविल सर्विसेज के नाम पर काला धब्बा लगाया. बिहार डीजीपी जैसे बड़े पद की वर्दी को दागदार किया. उस दौरान जब राजनीतिक मंशा पर सवाल उठे तो डीजीपी साहब ने भड़ककर इसे गलत भी कहा.

लेकिन अंततः यह तो साबित हुआ कि एक राज्य में पुलिस प्रशासन की सर्वोच्च कुर्सी का ही जब कोई रूआब न रह जाएगा, तो बिहार पुलिस से भला कौन अपराधी डरेगा?

रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनिया.

इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों!

 

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