
Faisal Anurag
पक्ष और विपक्ष दोनों कह रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र की प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है. दोनों ही पक्षों ने राज्यसभा में कृषि विधेयक से उपजे विवाद को लोकतंत्र का काला दिन बताया है. यदि दोनों पक्षों की बातों में एक ही सच्चाई उजागर हो रही है तो कहा जाना चाहिए कि संकट बेहद खतरनाक रूप धारण कर चुका है. इस तथ्य की समीक्षा की जानी चाहिए कि आखिर लोकतंत्र को वास्तविक खतरा किन कारणों से पहुंच रहा है. संसद में विपक्ष की अनुपस्थिति में बिना यथोचित चर्चा के यदि सात विधेयक पास कर दिए गए हैं तो यह सामान्य हालात नहीं ही हैं.
संसद के दोनों सदनों में जो गतिरोध है उसे दूर करने का प्रयास भी नहीं दिख रहा है. सरकारी पक्ष डैमेज कंट्रोल का प्रयास करता नजर आ रहा है. खास कर कृषि विधेयक के बाद उपजे हालात में. किसानों की नारजगी दूर करने के प्रयास तो किए जा रहे हैं लेकिन किसानों की बातें अनसुनी भी की जा रही हैं. अनेक राज्यों में किसानों का गुस्सा चरम पर है. यदि संसद के सत्र के दौरान भी देश के विभिन्न हिस्सों में हो रही घटनाओं पर चर्चा नहीं हो रही है तो इसकी गंभीरता को समझना चाहिए. संसद के गतिरोध को तोड़ने का कोई भी मैकेनिज्म नहीं अपनाया जाना गंभीर बात है.
इसे भी पढ़ेंः राशन डीलर ने की महिला से मारपीट, मंत्री के निर्देश पर लाइसेंस रद्द
भारत के संसद में गतिरोध के अनेक अवसर आए हैं. डा मनामोहन सिंह के कार्यकाल में ही लंबा गतिरोध बना. लेकिन गतिरोध को तोड़ने के राजनीतिक प्रसास भी होते रहे. लोकसभा के पिछले ही सत्र में विपक्ष के अनेक सांसदों का निलबंन हुआ था. राज्यसभा के आठ सदस्यों के निलबंन के बाद का गतिरोध सामान्य नहीं है.
जिस तरह उपसभापति की भूमिका को ले कर हालात पैदा हुए हैं उसमें यह देखा जा रहा है कि सत्तापक्ष बचाव ही नहीं आक्रामक मुद्रा में भी है. केंद्र सरकार भी इस सत्र में अधिक से अधिक विधेयकों को पास करा लेना चाह रही है. ऐसे हालात में विपक्ष की आक्रामक भूमिका से सरकार परेशान नजर आ रही है. जिन विधयेकों को पारित कराया जा रहा है उसका दूरगामी असर पड़ने वाला है.
इसे भी पढ़ेंः हरियाणा में कृषि बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे
हालांकि विपक्ष के सदस्यों की संख्या लोकसभा में बेहद कम है. लेकिन राज्यसभा में वे प्रभावी हैं. सरकार विपक्ष से सहमति बनाने के बजाय आक्रामक अंदाज में विधेयकों को हर हाल में पारित करना चाहती है. इसमें विधायी पक्रियाओं की उपेक्षा भी होने की बात कही जा रही है. विपक्ष का आरोप है कि विधायी पक्रियाओं में विपक्ष की आवाज को नजरअंदाज किया जा रहा है. संसदीय प्रणाली में असहमति को कम करने का प्रयास महत्वपूर्ण माना जाता है. संसदीय इतिहास में यह एक ऐसा दौर है जहां विपक्ष को बेबस बना दिया गया है. लोकतंत्र की मजबूती के लिए सशक्त विपक्ष अनिवार्य है.
लोकतंत्र का काला दिन तो लॉकडाउन के दौरान भी आया जब श्रमिक पलायन कर रहे थे. और तपती धूप में पैदल बाल-बच्चों के साथ चल रहे थे. विभाजन के बाद के इस सबसे बड़े पलायन में रेल पटिरियों और सड़कों पर सैकड़ों मजूदरों की मुत्यु हुई. इस बड़ी त्रासदी ने बताया कि लोकतंत्र में देश के मेहनतकश वर्ग के लोगों के लिए जो भी कानूनी प्रावधान हैं, उसकी किस तरह अवज्ञा हो रही है. इन मौतों से लोकतंत्र के प्रहरी परेशान और संवेदनशील होते नहीं दिखे.
इसे भी पढ़ेंः शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने मैट्रिक और इंटर टॉपर्स को दी ऑल्टो कार
भारत में मानवाधिकार के गंभीर सवाल उठे हैं. और असहमत समूहों का दमन किया गया है, वह भी लोकतंत्र पर सवाल है. सिर्फ दिल्ली दंगों की चार्ज शीट में उल्लेखित नाम ही बाताते हैं कि सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों का क्या हश्र हो रहा है. यह तो मामूली उदाहरण भर है. आर्थिक नीतियों से उपज रही असमानता भी बहुत कुछ कह रही है. एक स्वस्थ लोकतंत्र नागरिकों के असहमत स्वर की हिफाजत करता है. मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का संदर्भ भी इसी से जुड़ा है. राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि यदि सड़कें सुनी हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जायेगी. उनके इस कथन के संदर्भ को गहराई से समझने का यह सही समय है.
इसे भी पढ़ेंः IPL : शारजाह में धौनी ने मारा ऐसा छक्का, स्टेडियम पार कर सड़क पर जा गिरी गेंद




