
Ranchi : करोड़ों खर्च के बाद भी झारखंड में बाघों की संख्या एक पहेली बन गयी है. वन विभाग के आला अफसरों को भी पता नहीं है कि प्रदेश में कितने बाघ हैं. सही आंकड़ा नहीं होने के कारण आज तक बाघों की संख्या पहेली ही बनी हुई है. जबकि 15 सालों में लगभग 60 से 70 करोड़ रुपये टाइगर प्रोजेक्ट में खर्च हो गये हैं. पलामू के बेतला राष्ट्रीय उद्यान में वर्ष 1974 में पलामू व्याघ्र अभ्यारण्य की शुरुआत की गयी थी. सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2005 में पलामू अभ्यारण्य में कुल 38 बाघ थे, और 2006 में यहां 17 बाघ रह गये थे. बाघों की संख्या यहां दिन प्रतिदिन कम होती गयी. वर्ष 2008 और 2010 में यहां 6 बाघ बचे, जबकि 2014 में यहां मात्र 3 बाघ थे. 2018 में यह संख्या शून्य हो गयी थी.
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झारखंड में टाइगर फाउंडेशन कारगर नहीं
राज्य में टाइगर फाउंडेशन का भी गठन किया जा चुका है. यह एक ऑटोनॉमस बॉडी है. इसमें दो इकाइयां गवर्निंग बॉडी और कार्यकारिणी समिति है. गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष विभाग के मंत्री होते हैं. फिलहाल मुख्यमंत्री के अधीन वन विभाग है. इस हिसाब से मुख्यमंत्री गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष भी हैं. जबकि कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष पीसीसीएफ वन्य प्राणी हैं. इसके बावजूद यह कारगर नहीं हो पाया है.
2018 से 2019 तक पांच बाघ का दावा
वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की ताजा रिपोर्ट में कहा गया कि अप्रैल 2018 से लेकर अक्तूबर 2018 के बीच पीटीआर में पांच बाघों के होने की संभावना है. फिर जुलाई 2019 में बाघों से संबंधित 10 पैरों के निशान पीटीआर में मिलने का दावा किया गया. इसके बाद से अब तक सस्पेंस बरकरार है.
2020 से 2021 में फिर पांच बाघ होने का दावा
फिर 2021 में वन विभाग ने दावा किया पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 5 होने का अनुमान है. लेकिन नक्सलियों के डर से टीम यहां आने से डर रही है. ऐसे में कैसे बाघों की सही संख्या का अनुमान नहीं लग पायेगा. फिर दावा किया कि नक्सलियों के खौफ के बावजूद पलामू टाइगर रिजर्व देश के 10 टाइगर रिजर्व में टॉप पर है.
वन विभाग ने बतायी परेशानी
वन विभाग ने तर्क दिया है कि टाइगर रिजर्व एरिया में पुलिस पिकेट बना दिये गये हैं. नियमत: कोर एरिया में पुलिस पिकेट नहीं होना चाहिए. वर्तमान में बेतला, कुटकू, बरवाडीह, गारू, बारसेन, महुआटांड़ सहित अन्य इलाकों में एक दर्जन से अधिक पुलिस पिकेट हैं. नक्सलियों के खिलाफ गोलीबारी से जानवरों पर विपरीत असर पड़ता है. इस कारण जंगली जानवर पड़ोस के जंगलों की ओर रुख करते हैं.
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नक्सलियों का अड़ंगा भी
झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की सही संख्या का अनुमान लगाने में नक्सली अड़ंगा डाल रहे हैं. दरअसल, पलामू टाइगर रिजर्व में जब भी वन विभाग की टीम सीसीटीवी लगाने पहुंचती है, तो उन्हें नक्सली बंधक बना लेते हैं. स्थिति ये है कि टाइगर रिजर्व में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की टीम आने से ही डर रही है. देश में कितने बाघ हैं, इसका सही अनुमान लगाने के लिए हर 4 साल में एक बार टाइगर रिजर्व में बाघों की गिनती की जाती है. लेकिन पलामू में अब तक नक्सलियों के डर से बाघों की गिनती का अनुमान लगाने की कवायद भी सही तरीके से शुरू नहीं हो सकी.
नक्सली बना चुके हैं बंधक
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की एक टीम पलामू टाइगर रिजर्व आयी थी, लेकिन नक्सलियों ने उन्हें घंटों बंधक बना लिया था. काफी मशक्कत के बाद उन्हें नक्सलियों के चंगुल से छुड़ाया जा सका था.
क्या है वन मंत्रालय का निर्देश
वन मंत्रालय के निर्देशानुसार शेर, बाघ और हाथियों के लिए राज्यों में सुरक्षित क्षेत्र का विकास किया जाना है. जानवरों के शिकार और उसके व्यावसायिक शोषण के खिलाफ उच्चस्तरीय विधिक सुरक्षा उपलब्ध करायी गयी है. दोषियों के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधान किये गये हैं. अभियोजन चलाने के लिये सीबीआइ को पर्याप्त शक्ति भी दी गयी है.
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साल- बाघों की संख्या
1992- 50
1993- 44
1994- 49
1995- 50
1996- 40
1997- 44
1999- 37
2000- 37
2002- 38
2003- 36
2005- 17
2007- 15
2009- 17
2011- 07
2011-12- सिर्फ गिनती, स्पष्ट आंकड़ा नहीं.
2013- स्पष्ट आंकड़ा नहीं.
2016-17- 03
2018- स्पष्ट आंकड़ा नहीं
2019 – स्पष्ट आंकड़ा नहीं, विभाग का दावा पांच बाघ
2020 से 2021- सही आंकड़ा नहीं, विभाग का दावा पांच बाघ




