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#Dumka: दो बार हार चुके सुनील सोरेन पर बीजेपी जतायेगी भरोसा या लुईस मरांडी होंगी नया चेहरा!

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Akshay Kumar jha

Ranchi: फरवरी का महीना ज्यों-ज्यों बीत रहा है. गर्मी के साथ-साथ यह चर्चा भी परवान चढ़ रही है कि लोकसभा चुनाव में कौन कहां से उम्मीदवार होगा. बीजेपी ही नहीं हर पार्टी में लॉबिंग शुरू चुकी है. झारखंड में अगर दुमका लोकसभा की बात करें तो यह सीट किसी भी पार्टी के लिए जीतना एक सम्मान की बात होती है. क्योंकि संथाल का ये भूभाग आदिवासियों के लिए जाना जाता है और झारखंड की पहचान ही आदिवासी राज्य के रूप में है. दूसरी सबसे बड़ी बात कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन दुमका से 1980 से ही लगातार आठ बार सांसद रह चुके हैं. कहा जाये तो सोरेन परिवार की पहचान को भी दुमका से जोड़ कर देखा जाता है. शिबू सोरेन 1980 से अबतक सिर्फ तीन बार ही दुमका से चुनाव हारे हैं. एक बार 1984 में कांग्रेस के टिकट से लड़ रहे पृथ्वी चंद किसकू और दो बार बीजेपी की तरफ से लड़ रहे बाबूलाल मरांडी से.

2019 में बदल सकता है समीकरण

दुमका लोकसभा में पिछले तीन बार से बीजेपी दूसरे नंबर पर रही है. दो बार लगातार 2009 और 2014 में सुनील सोरने ने शिबू सोरेन से मात खायी है. 2009 में जहां सुनील सोरेन को 18,812 वोट से हार का सामना करना पड़ा. वहीं मोदी लहर यानी 2014 में हार का अंतर बढ़ कर 39,030 हो गया. दो बार मिली हार और हार के अंतर का बढ़ता जाना सुनील सोरेन के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है. ऐसे में बीजेपी एक ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है, जो ट्राइबल तो हो ही साथ ही दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मात देने की माद्दा रखता हो. 2014 के विधानसभा चुनाव में दुमका सीट से चुनाव लड़ रहे हेमंत सोरेन को 5,262 वोटों से ही सही, लेकिन हरा कर लुईस मरांडी ने सोरेन परिवार को परास्त करने की परंपरा की नींव रखी है. ऐसे में बीजेपी दुमका सीट के लिए नामों की सूची तैयार करने वक्त लुईस मरांडी के नाम पर गंभीरता से विचार करेगी. पुख्ता सूत्रों के खबर के मुताबिक लुईस मरांडी लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रही हैं. टिकट लेने के लिए भी प्रयास जोरों पर है.

कभी चुनाव नहीं जीतनेवाले रमेश हांसदा भी लगा रहे दांव

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अपनी सीट नहीं बचा पाये प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ

जेएमएम छोड़ बीजेपी में आये रमेश हांसदा जिसे पार्टी की तरफ से संथाल परगना का सह प्रभारी बना कर दुमका भेजा गया है, वो भी दुमका से लोकसभा चुनाव में उतरने की बात को गंभीरता से ले रहे हैं. जबकि रमेश हांसदा संथाल से नहीं बल्कि पूर्वी सिंहभूम से आते हैं. अपने पूरे राजनीतिक सफर में अबतक रमेश हांसदा एक बार भी चुनाव नहीं जीत सके हैं. 2010 के जिला परिषद चुनाव के दौरान एक गैरराजनीतिक शख्सियत तपन कुमार मजुमदार ने इन्हें पटखनी दी थी. हार का अंतर जबरदस्त था. 2010 के बाद इन्होंने दो बार अपनी पत्नी साकरो हांसदा को मुखिया का चुनाव लड़ाया. क्षेत्र में खुद घूम कर कैंपेनिंग की. लेकिन जमानत तक नहीं बची. इतना ही नहीं इनके भाई दशरथ हांसदा भी जिला परिषद चुनाव में हाथ आजमा चुके हैं. लेकिन उन्हें भी अपने बड़े भाई और भाभी की तरह हार का सामना करना पड़ा. जेएमएम ने इन्हें एक बार पूर्वी सिंहभूम से पार्टी अध्यक्ष बनने का मौका तो दिया. लेकिन पोटका से विधानसभा टिकट लेने की चाहत की वजह से इन्हें चंपई सोरेन से भिड़ना पड़ा. नतीजा हुआ की रमेश हांसदा को पार्टी ही छोड़नी पड़ी. राजनीति से ज्यादा संथाली लोकल फिल्मों में इनकी भूमिका सराही जाती है.

दुमका लोकसभा सीट का समीकरण

दुमका लोकसभा में अंदर छह विधानसभा की सीटें आती हैं. दुमका, जामताड़ा, सारठ, जामा, शिकारीपाड़ा और नाला. दुमका और सारठ को छोड़ बाकी सभी चार विधानसभा विपक्ष के कब्जे में है. इस लिहाज से महागठबंधन का उम्मीदवार निश्चित तौर से दुमका लोकसभा में बीजेपी से ज्यादा मजबूत होगा. ऊपर से जब शिबू सोरेन जैसी शख्सियत उम्मीदवार हों तो किसी दूसरे की जीत ज्यादा कठिन हो जाती है. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि 2014 के विधानसभा चुनाव में नाला, जामताड़ा और जामा में बीजेपी के प्रत्याशी मामूली अंतर से दूसरे नंबर पर थे. खबरों की माने तो नाला में लुईस मरांडी विधानसभा जीत के बाद से ही कैंपेनिंग कर रही हैं और शिकारीपाड़ा में ट्राइबल फेस होने का फायदा लुईस को मिलेगा और दुमका इनके कब्जे में पहले से ही है. सबकी निगाहें अब चुनाव आयोग की घोषणा पर टिकी है. घोषणा होते ही पिक्चर क्लियर होना शुरू हो जाएगा.

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