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#CoronaEffect: दिलशाद ने कागज पर लिखा- “मैं किसी का भी दुश्मन नहीं हूं”, फिर फांसी लगाकर दे दी जान

NewsWing Desk

“मैं किसी का भी दुश्मन नहीं हूं”. पॉकेट डायरी के एक पन्ने पर उसने बस इतना ही लिखा. फिर पहले अपनी कलाई काटी और फिर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उसका नाम मो दिलशाद था. उसकी उम्र 37 साल थी. वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला के सरहदी गांव का रहने वाला था.

दिलशाद की मौत दिल दहलाने वाली है. दिल और दिमाग को झकझोरने वाली है.  “मैं किसी का भी दुश्मन नहीं हूं” लिख कर वह क्या बताना चाहता था. यह कि उसका बहिष्कार ना करो. वह कोरोना से संक्रमित नहीं है. उस पर ताने मत मारो.

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सवाल उठता है, क्या दिलशाद की मौत से किसी को फर्क पड़ेगा. क्यों जात, धर्म, सांप्रदाय की वजह से किसी को प्रताड़ित करने वाले लोग कभी दिलशाद जैसों की पीड़ा को समझ पायेंगे.  

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सुशील मानव अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं- मृतक दिलशाद की मां उषा कहती हैं: “वह क्वारंटाइन से लौटने के बाद लगातार रोता रहा. मैंने उसे कभी रोते नहीं देखा था. वह कहता रहा कि उसके खिलाफ एक साजिश है और उसे झूठा फंसाया गया है. वह पूरे दिन दूसरे कमरे में पड़ा रहा. मैं उसके पास गयी और उससे पूछा कि क्या वह ठीक है, लेकिन उसने मुझे कुछ नहीं बताया.”

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के डीजीपी सीता राम मरडी ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि ऊना में एक युवक पर लोगों ने कोरोना पोजिटिव होने का शक जताया था. उसे क्वारंटाइन किया गया था. बाद में उसकी टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आयी. जब वह गांव लौटा तो उसकी सोशल बॉयकॉटिंग हुई और इस वजह से उसने आत्महत्या कर ली. खबर के अनुसार डीजीपी ने कहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब सोशल डिसक्रिमिनेशन नहीं है. उन्होंने अपील की है कि समाज के लोग किसी के भी साथ ऐसा व्यवहार ना करें.

अमर उजाला की खबर के मुताबिक गांव के कुछ लोगों ने मो दिलशाद पर आरोप लगाया था कि उसने दो जमातियों को शरण दिया था. गांव वालों की शिकायत पर उसकी कोरोना जांच की गयी. रिपोर्ट निगेटिव आयी थी. जिन दो लोगों को घर पर रखने का आरोप गांव वालों ने लगाया था, उन दोनों की जांच रिपोर्ट भी निगेटिव ही आयी थी. खबर के मुताबिक क्वारंटाइन पीरियड खत्म होने के बाद जब वह गांव लौटा तब भी गांव के लोग उस पर ताने मारते थे. इससे वह विचलित था.

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दिलशाद की मां उषा के मुताबिक – बांगड़ के ग्रामीणों ने दिलशाद पर शक करना शुरू कर दिया था. उन्होंने सोचा कि वह COVID-19 के संपर्क में रहा है और गांव में दूसरों को संक्रमित करेगा.

गांव वालों का ऐसा कहना था कि उन्होंने दिलशाद को दो अन्य मुसलमानों जो कि दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात से थे, को मार्च के आखिर में गांव में ही स्कूटर पर लिफ्ट देते देखा था.

फिर गांव वालों ने पुलिस को बार-बार फोन किया और बताया कि उसकी हरकतें संदिग्ध हैं. दिलशाद, हालांकि लगातार गांववालों के ताने से परेशान था, उसने ग्रामीणों की इच्छा के अनुसार खुद को अस्पताल में भर्ती कराया.

तीन दिनों के बाद उसकी कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आयी. बावजूद इसके दिलशाद गांव वालों की हरकतों से इतना परेशान हो गया था कि उसने अगले दिन खुदखुशी कर ली और अपना जीवन समाप्त कर लिया. 

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