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आपराधिक मानहानि या सच को दबाने का साधन!

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क्या आपराधिक मानहानि के मामले सच को दबाने के साधन के रूप में प्रयोग किये जा रहे हैं. इस पर बहस जारी है. इन दिनों #ME Too अभियान में कई बड़े चेहरों पर सवाल उठने के बाद यह प्रावधान एक बार फिर से सुर्खियों में है. बहस इस बात पर भी हो रही है कि क्या इस आपराधिक मानहानि को कानूनन अपराध के दायरे से बाहर किया जाये.

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ताजा प्रकरण केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर और फिल्म अभिनेता आलोक नाथ से जुड़ा है, जो #ME Too अभियान में फंसे हैं. दोनों ने उनके खिलाफ अवाज उठानेवाली महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया है. एमजे अकबर के खिलाफ कई महिलाओं ने उत्पीड़न की आवाज उठायी है, पर उन्होंने सिर्फ एक ही पत्रकार प्रिया रमानी पर आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया है. उसी प्रकार आलोक नाथ ने भी विन्ता नंदा पर आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया है.

क्या है आपराधिक मानहानि

यहां यह समझना जरूरी है कि आपराधिक मानहानि और मानहानि के मामले में फर्क क्या है. भारतीय कानून के अनुसार मानहानि आपराधिक और सिविल दोनों ही प्रकार की हो सकती है. दोनों में बुनियादी फर्क उसके द्वारा मांगी जानेवाली राहत का है. सिविल मानहानि के मामले में दोष सिद्ध होने पर दोषी को उसकी वजह से हुए नुकसान का हर्जाना भरना पड़ता है. वहीं आपराधिक मानहानि में दोषी को सजा देने की मांग की जा सकती है, जिससे दूसरों को भी सबक मिल सके. अपराधिक मानहानि भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) के तहत अपराध है. वहीं सिविल मानहानि टार्ट लॉ (कॉमन लॉ) के तहत आता है. मानहिन को अपराध घोषित करनेवाली भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और इसके लिए सजा का प्रावधान करनेवाली धारा 500, ब्रिटिशकालीन उपबंध हैं. धारा 500 के तहत आपराधिक मानहानि के दोषी को दो साल तक की जेल और हर्जाना या दोनों की सजा हो सकती है. हालांकि मुकदमे के दौरान यदि दोनों पक्ष चाहें तो सुलह कर सर सकते हैं और मामला वापस लिया जा सकता है.

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सभी तबका है पीड़ित

आपराधिक मानहानि के दंश से भारत में समाज का लगभग हर तबका पीड़ित है. नेताओं और सरकारों पर तीखे तंज कसनेवाले सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर खुद सियासतदान और मीडिया तक, इस व्यवस्था को बदलने की पुरजोर मांग कर रहे हैं. इन दिनों सोशल मीडिया के उभार के बाद मानहानि के मामलों में खासी बढ़ोतरी देखने को मिली है. विचार और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मानहानि को दंड संहिता से बाहर करने की कवायद तेज हो गई है. दबी जुबान से ही सही, सरकारें खुद भी मानती हैं कि मानहानि को अपराध से मुक्त करना अब समय की मांग है. यही वजह है कि खुद सत्ता में रही कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, सत्तारुढ़ भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मानहानि को आईपीसी से बाहर करने की सुप्रीम कोर्ट से मांग की है.

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