
Khunti: धनुष पर तीर चढ़ाकर अमर हस्सा पुर्ती जब निशाना साधाता है, तो उसे उसका टारगेट पैरा तीरंदाजी ओलम्पिक नजर आता है. यह बातें खुद अमर कहता है. उसका एक पैर नहीं है. गरीबी और बेबसी के बीच वर्ष 2015 में उसे कैंसर हो गया था, जिसके बाद चिकित्सकों को इलाज के क्रम में उसका एक पैर काटकर अलग कर देना पड़ा था. तब अमर छोटा था और सरवादा के आरसी मिशन स्कूल में पढ़ता था. एक पैर कटने के बाद अमर ने पढ़ाई जारी रखी. तमाम चुनौतियों से लड़कर अमर ने इंटर की पढ़ाई पूरी कर ली. उसके परिवार के पास उसे आगे पढ़ाने को पैसे नहीं हैं. उसके मां-बाप का अपना घर भी नहीं है. वे अपने दामाद के सुरूंदा स्थित घर में रहते हैं. नौ वर्षों के लंबे और कड़े संघर्ष के बाद अमर पूरी तरह टूट चुका था. आत्महत्या जैसे विचार उसके मन में आने लगे थे.

एक दिन सुबह के छह बजे अमर की मां पत्रकार अजय शर्मा के घर पहुंची. उसने सारी बातें बताई. अजय शर्मा चंद घंटों बाद अमर हस्सा पुर्ती के घर पहुंचे और उससे मिले. टुट चुके अमर का हौसला बढ़ाया. हिम्मत देने के साथ उसके संघर्ष में साथ देने का भरोसा दिया. कोशिशें जारी रही. तब एक के बाद एक रास्ता खुलता चला गया.
बीए में हुए एडमिशन, तीरंदाजी सीखने लगा अमर
बिरसा कॉलेज की प्राचार्या जी किड़ो और शिक्षक राजकुमार गुप्ता ने अपने पैसे खर्च कर अमर हस्सा पुर्ती का नामांकन बीए में करा दिया. अमर ने मुंडारी ऑनर्स ली है. अमर के संबंध में जानकारी मिलते ही तीरंदाजी के कोच अशिश कुमार अजय शर्मा को साथ लेकर अमर के घर पहुंचे. कोच ने अमर का फिजिकल टेस्ट लेकर उसे क्वालिफाई किया. अब कोच आशिश की देखरेख में अमर तीरंदाजी का अभ्यास कर रहा है. हर तीर वह बड़ी कुशलता के साथ चलाता है. अमर आम तीरंदाजों की तरह हर व्यायाम करता है.
विलक्षण प्रतिभा का धनी है अमर: कोच
अमर के जज्बे और कौशल को देख उसके कोच आशिश कुमार काफी प्रभावित हैं. आशिश कहते हैं कि अमर हस्सा पुर्ती में विलक्षण प्रतिभा है, ऐसा किसी-किसी खिलाड़ियों में पाया जाता है. अमर को सहयोग व प्रशिक्षण मिलता रहा, तो एक दिन अमर उन बुलंदियों को छू लेगा, जिससे खूंटी समेत देश भी गौरवान्वित हो उठेगा.
अमर के मां-बाप मुल रूप से मुरहू प्रखंड के केवड़ा पंचायत अंतर्गत ईट्टी गांव के निवासी हैं. ये गरीब हैं, इनके पास रहने को अपना घर नहीं है. अमर की मां भेलेन्टीना ओड़ेया कहती हैं कि उनके पति थोमस हस्सा पुर्ती दस वर्षों से ज्यादा समय से शारीरिक रूप से लाचार हैं. पति की बीमारी और शरीरिक लाचारी के बाद धीरे-धीरे गरीबी बढ़ने लगी. गांव का पुराना मिट्टी का घर धंस गया. तब वे कुछ वर्षों तक एक रिश्तेदार के घर बुरूमा में रहे. अब वे अपने दामाद के घर में सपरिवार रह रहे हैं. अगर सरकार एक आवास दे देती, तो पूरा परिवार सम्मान पूर्वक जीवन जी पाता.
अमर को छात्रावास में बेड की जरूरत
अमर हस्सा पुर्ती के तीरंदाजी अभ्यास में बाधा पहुंच रही है. कारण है कि वह हर दिन 50 रुपए किराया देकर सुरूंदा से खूंटी आने में सक्षम नहीं है. अमर और उसके परिवार वाले कहते हैं कि अगर बिरसा कॉलेज आदिवासी छात्रावास में अमर को एक बेड मिल जाता, तो वह वहां रहकर तीरंदाजी का नियमित अभ्यास कर पाता.




