
Jamshedpur : पूर्वी सिंहभूम जिले में विश्व बैंक के सहयोग से शुरू की गयी बागबेड़ा ग्रामीण जलापूर्ति योजना सात साल बाद भी धरातल पर नहीं उतर सकी है. इस योजना से बागबेड़ा, परसुडीह, घाघीडीह और किताडीह की 19 पंचायतों में रहनेवाली दो लाख की आबादी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाना था. योजना के क्रियान्वयन के नाम पर करोड़ों का वारा-न्यारा हो गया. पानी का कनेक्शन देने के लिए क्षेत्र में सामान्य वर्ग के लोगों से प्रति कनेक्शन 450 रुपये तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लोगों के से 225 रुपये वसूले भी गये, जिनका कहीं कोई हिसाब नहीं है. अब इलाके के लोग फिर से आरपार के आंदोलन के मूड में हैं.
गुरुवार को बागबेड़ा महानगर विकास समिति और संपूर्ण घाघीडीह विकास समिति के बैनर तले सैकड़ों ग्रामीण और बस्तीवासी पूर्वी सिंहभूम जिला मुख्यालय पहुंचे. यहां उपायुक्त की अनुपस्थिति में जिले के एडीएम नंदकिशोर लाल को बागबेड़ा जलापूर्ति योजना को अविलंब पूरा करने और क्षेत्र के लोगों को पेयजल को लेकर हो रही समस्याओं से निजात दिलाने की मांग की. लोगों ने टाटा स्टील पर मौलिक सुविधा के अंतर्गत पेयजल उपलब्ध कराने अथवा जुगसलाई नगर परिषद के अंतर्गत बागबेड़ा, घाघीडीह, कीताडीह तथा गोविंदपुर को शामिल करने की मांग की. उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो समिति द्वारा झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की जायेगी.
योजना में हुई है गड़बड़ी, दोषियों पर कार्रवाई हो
जलापूर्ति योजना के लिए प्रारंभ से आंदोलन कर रहे बागबेड़ा महानगर विकास समिति के अध्यक्ष सुबोध झा ने योजना में भारी अनियमितता का आरोप लगाते हुए दोषी पदाधिकारियों को चिन्हित कर दंडित करने की मांग उठायी. उन्होंने कहा कि साजिश के तहत परियोजना को ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है. उन्होंने मांग की कि बागबेड़ा ग्रामीण जलापूर्ति योजना के बंद पड़े काम को अविलंब चालू किया जाये एवं घटिया निर्माण की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाये.
योजना का शिलान्यास 2012 के बदले 2015 में हुआ
वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पानी के लिए आंदोलन कर रही जनता को आश्वासन दिया कि जलापूर्ति योजना को धरातल पर उतारा जायेगा. 27 दिसंबर 2012 को शिलान्यास का दिन भी तय हुआ, लेकिन किसी कारणवश शिलान्यास टल गया. अगले तीन वर्षों तक यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. 2014 में जब रघुवर दास की सरकार आयी, तो फिर से आंदोलन शुरू हुआ. तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास 018 अप्रैल 2015 को बागबेड़ा के सिद्धू-कान्हूस मैदान में इस योजना का शिलान्यास किया. उन्होंने घोषणा की कि तीन साल के अंदर योजना का काम पूरा हो जायेगा और वर्ष 2018 से हर घर में पानी उपलब्ध हो जाएगा. लेकिन उनके मुख्यमंत्री रहते योजना पूरी नहीं हो सकी. 2019 में राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ. हेमंत सोरेन दोबारा मुख्यमंत्री बने, लेकिन सात वर्षों बाद भी योजना पूरी नहीं हो सकी है,. 19 पंचायतों की जनता आज भी पानी के लिए मोहताज है.
2005 से अब तक 399 बार हो चुका है आंदोलन
बता दें कि बागबेड़ा जलापूर्ति योजना को लेकर सुबोध झा की अगुवाई में 2005 से क्रमबद्ध एवं संपूर्ण घाघीडीह विकास समिति के संयुक्त तत्वधान में अध्यक्ष छोटराय मुर्मू, कृष्णा चंद पात्रो, रितु सिंह तथा प्रभा हांसदा के नेतृत्व में 399 बार धरना प्रदर्शन, उपायुक्त कार्यालय का घेराव, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग का घेराव-प्रदर्शन व भूख हड़ताल, 6 बार विधानसभा का घेराव, दो बार राजभवन का घेराव एवं एक बार जमशेदपुर से रांची तक पदयात्रा कर सैकड़ों लोगों के साथ विधानसभा का घेराव किया जा चुका है.
छोटा गोविंदपुर ग्रामीण जलापूर्ति योजना हो गयी है शुरू
छोटा गोविंदपुर ग्रामीण जलापूर्ति योजना और बागबेड़ा ग्रामीण जलापूर्ति योजना, दोनों का शिलान्यास एक ही वर्ष में हुआ. छोटा गोविंदपुर ग्रामीण जलापूर्ति योजना शुरू हो गयी है. वहां की 27 पंचायतों के 127 गांवों के लगभग 26 हजार घरों में जलापूर्ति हो रही है, जबकि बागबेड़ा ग्रामीण जलापूर्ति योजना (निर्मल जल परियोजना) अभी भी खटाई में है.
योजना में कई बार विवाद एवं गतिरोध उत्पन्न हुआ
बागबेड़ा ग्रामीण जलापूर्ति योजना को लेकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति बहुल क्षेत्रों में कई बार विवाद एवं गतिरोध पैदा किया गया. वर्ल्ड बैंक की टीम को जन सुनवाई भी करनी पड़ी. बागबेड़ा से सटे सोमायझोपड़ी में जलमीनार एवं वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के स्थल को लेकर कई बार विधि व्यवस्था की समस्या खड़ी हुई. फिल्टर प्लांट में बाउंड्री वॉल कई बार टूटी. बागबेड़ा के बड़ौदा घाट पर योजना के अंतर्गत पाइप लाइन लाने के लिए नदी में बनाये गये पिलरों में से दो पिलर हाल की बाढ़ में बह गये. पाइप लाइन बिछाने के लिए कई जगह सड़कों को खोद कर छोड़ दिया गया.
21 हजार घरों से लिया गया पैसा
सुबोध झा कहते हैं कि जलापूर्ति योजना की लागत 237 करोड़ है. इसे वर्ल्ड बैंक, केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं आम जनता के सहयोग से पूरा किया जाना है. इस योजना में 50 प्रतिशत की भागीदारी वर्ल्ड बैंक की है. केंद्र सरकार का हिस्सा 33 प्रतिशत, राज्य सरकार का 16 प्रतिशत एवं आम जनता की भागीदारी 01 प्रतिशत की है. सामान्य वर्ग के लोगों से 450 रुपये तथा अनसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों से 225 रुपये लिये गये. इस तरह 19 पंचायतों के 113 गांवों के 21000 घरों से योजना के तहत पैसे लिये गये, लेकिन इसका कोई हिसाब-किताब नहीं रखा गया. सुबोध झा ने बताया कि अब जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है. इसलिए वह अपने पैसों का हिसाब मांग रही है.
प्रदर्शन में ये लोग हुए शामिल
गुरुवार के प्रदर्शन में सुबोध झा, छोटराय मुर्मू, कृष्णचंद्र पात्रो, प्रभा हांसदा, रितू सिंह, सपन कुमार दास, श्याम सुंदर दास, विनय सिंह, रामेश्वर, सोनम देवी, नवीन कुमार सिन्हा, सोनी देबी, सुनीता देवी, संजय ठाकुर, पुराण चंद्र सहित अन्य शामिल थे.




