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झारखंड की राजनीति में ‘हॉट केक’ बनते कुड़मी

Amit Jha

Ranchi:  एक बार फिर राज्य में कुड़मी समाज राजनीति के केंद्र में है. गाबे-बेगाहे सबों की नजर इस वर्ग का भरोसा हासिल करने की दिख रही है. रांची के पूर्व सांसद रामटहल चौधरी ने मंगलवार को झारखंड के जदयू प्रभारी और बिहार के मंत्री डॉ अशोक चौधरी से भेंट की थी. इस मुलाकात के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं. एक तो संभावना यह कि वे आने वाले समय में जदयू के पाले में दिखें. दूसरा कि बिहार की तरह झारखंड में भी कुर्मी वोटों पर पार्टी की नजर है. ऐसे में रामटहल जैसे पूराने नेता को अपने साथ जोड़कर पार्टी एक तीर से कई शिकार करने की तैयारी में लगी दिख रही है. उधर, जमशेदपुर सांसद विद्युत वरण महतो या फिर आजसू पार्टी के सांसद सीपी चौधरी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की संभावनाओं के पीछे भी यही माना जा रहा है कि भाजपा की भी करीबी नजर कुर्मी वोटरों पर है.

कुड़मी वोटरों पर निगाह

डॉ अशोक चौधरी मानते हैं कि झारखंड के जनजाति समाज में कुड़मियों को भी शामिल किया जाना चाहिये. उनकी संस्कृति, विरासत एसटी समाज वाली ही है. ऐसे में केंद्र को भी इस मामले में सहयोग करना होगा. अगर आदिवासी समाज इस पर आपत्ति करता है तो यह नाजायज है. उनकी हकमारी नहीं होगी. अगर केंद्र एक बार इस पर तैयार हो जाए तो आरक्षण का प्रतिशत केंद्र और राज्य सरकार से बढ़ाने के लिए प्रयास होगा. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद खीरू महतो के मुताबिक उन्होंने सदन में भी केंद्र से मांग की है कि कुड़मियों को एसटी का दर्जा दें.

गौरतलब है कि बिहार की राजनीति में कुड़मी समाज भले आबादी में कम हो, पर राजनीति में उनकी अहम ताकत है. सीएम नीतीश कुमार लंबे समय से कुड़मी राजनीति का सिरमौर बने हुए हैं. माना जा रहा है कि खीरू महतो को राज्यसभा भेजने और झारखंड की बागडोर थमाने के पीछे भी नजर कुड़मी वोटरों पर नीतीश की है. रामटहल चौधरी को साथ लाकर दूसरा पिलर तैयार करने की तैयारी है.

भाजपा, आजसू पार्टी, झामुमो, कांग्रेस भी झारखंड में कुड़मी समाज के लिए लुभावनी राजनीति करते दिखते हैं. भाजपा के लिए राज्य में शहरी वोटरों के अलावा कुड़मी वोटर बेहद अहम रहे हैं. यही कारण भी है कि मोदी मंत्रिमंडल में संभावित विस्तार के लिए पार्टी एक कुड़मी नेता को जगह देने की राह तलाश रही है. उसकी सहयोगी रही आजसू पार्टी के लिए तो महतो, कुड़मी वोटर ही सबसे बड़े आधार रहे हैं. ऐसे में उसके नेता भी जनजाति वर्ग में कुड़मी समाज को शामिल करने को जोर आजमाइश दिखाते रहते हैं. सांसद सीपी चौधरी दिल्ली तक में इसके लिए आवाज उठा चुके हैं.

झामुमो के लिए महतो, कुड़मी, मुस्लिम वोट बैंक बड़ा कारगर रहा है. चाहे सरकार में रहें या विपक्ष में, इस वर्ग के नेताओं को महत्वपूर्ण पद देकर इन वर्गों का भरोसा साधते रहे हैं. अभी की सरकार में जगरनाथ महतो, हफीजुल हसन अंसारी जैसे मंत्री इसी की बानगी हैं. कुड़मियों को ट्राइबल का दर्जा देने के मसले पर पार्टी प्रमुख और सांसद शिबू सोरेन सहमति जता चुके हैं. कुड़मी-महतो को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने का समर्थन करते कह चुके हैं कि वे संथालों की उपजाति हैं. एक ही गोत्र से बाहर आए हैं.

आबादी 25 फीसदी, असर 30 सीटों पर

राजनीतिक गलियारे में माना जाता है कि राज्य की कुल आबादी का करीब 25 फीसदी कुड़मी-महतो समाज की है. राज्य के 14 लोकसभा सीटों में से कम से कम 6 सीटों पर कुड़मी वोटर निर्णायक रोल में रहते हैं. खासकर छोटानागपुर क्षेत्र में वे असरदार हैं. राजनीतिक रूप से शक्तिशाली और आर्थिक रूप से संपन्न माने जाने वाले कुड़मी-महतो जाति के समर्थन से ही रांची, हजारीबाग, खूंटी, धनबाद, गिरिडीह, जमशेदपुर जैसी सीटों पर किसी के लिए रिजल्ट तय होता है. केवल लोकसभा ही नहीं, राज्य की 30 विधानसभा सीटों पर भी कुड़मी वोटर जबर्दस्त ताकत रखते हैं.

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