
जयंती पर विशेष
Naveen sharma
Ranchi : मृणाल सेन उन चुनिंदा फिल्म निर्देशकों में शुमार हैं जिन्होंने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे के साथ मृणाल सेन ही थे जिन्होंने भारत में ऐसी फिल्मों का दौर शुरू किया जिनमें कहानियां बिलकुल यथार्थपरक होती थीं, उनमें कोई मनोरंजन की बाध्यता वाली मिलावट नहीं होती थी. लेकिन इसके बावजूद उनकी फिल्में बांधकर रखने वाली होती थीं.
मृणाल का जन्म फरीदपुर(वर्तमान बांग्लादेश)में 14 मई 1923 को हुआ था. स्कूल की पढ़ाई वहीं से की. फिर कलकत्ता के जाने-माने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से फिजिक्स की पढ़ाई की. आगे की शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की. छात्र जीवन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक शाखा से जुड़े लेकिन कभी सदस्य नहीं बने. बाद में एक फिल्मकार के तौर पर भी वे किसी विचारधारा से नहीं बंधे, हमेशा एक कलाकार के तौर पर मानवीय दृष्टिकोण से सोचते रहे.
वे जबरदस्त पढ़ाकू थे कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी इसकी सबसे मुख्य गवाह है. कोलंबिया मूल के ख्यात नॉवेलिस्ट, लेखक, पत्रकार गेब्रिएल गार्सिया मार्क़ेज उनके दोस्त थे.
नील आकाशेर नीचे’ फिल्म जो बैन हुई
मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’ (1958) आजाद भारत की पहली फिल्म थी जिसे बैन कर दिया गया था.
ये महादेवी वर्मा की कहानी चीनी भाई पर आधारित थी:
ये ब्रिटिश राज के आखिरी दिनों की कहानी थी. 1930 के बाद के कलकत्ता की. यहां एक गरीब चाइनीज़ फेरीवाला वांग लू रहता है जो कलकत्ता की गलियों में चाइना सिल्क बेचता है. मजबूर पृष्ठभूमि से आया होता है. जब उसके देश चीन पर ताकतवर, साम्राज्यवादी जापान ने हमला बोला होता है. कहानी की अन्य प्रमुख पात्र है बसंती जो एक बैरिस्टर की बीवी है और वांग सहानुभूति नुभूति रखती है.
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फिल्म रिलीज हुई तो लोगों को बहुत पसंद आई. यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी फिल्म को सराहा था. फिर कुछ दिनों बाद जब भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ने लगा तो फिल्म पर रोक लगा दी गई. फिल्म में भारत की अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई और 1930 के दौर में चीनी लोगों की साम्राज्यवादी जापान के अतिक्रमण की लड़ाई को एक ही दिखाने की कोशिश थी.
मृणाल ने बरसों बाद भी माना था कि फिल्म की इस टिप्पणी से वे इत्तेफाक रखते हैं कि किसी देश की आजादी की लड़ाई और एक प्रगतिवादी विश्व की फासीवाद के खिलाफ लड़ाई अलग-अलग नहीं होती. लेकिन 1962 में चीन-भारत तनाव के दौरान कोई ये संदर्भ समझा नहीं. बाद में संसद में कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद हीरेन मुखर्जी ने इसे लेकर टिप्पणी की. नेहरू और रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन वहीं थे. इन्होंने बाद में फिल्म पर से बैन हटवाया. ये बैन दो महीने चला था.
मृगया में मिथुन और मृणाल दोनों को नेशनल अवार्ड
मिथुन चक्रवर्ती ने 1976 में मृगया फिल्म से अपना डेब्यू किया था. इसके लिए उन्होंने बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीता था. इसे मृणाल दा ने ही बनाया था. उन्हें भी सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशक का नेशनल अवॉर्ड प्राप्त हुआ था.
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बैशे श्रावणा कठोर फिल्म
बैशे श्रावणा (विवाह का दिन) 1960 में प्रदर्शित हुई और बहुत कठोर फिल्म थी. विश्व युद्ध-2 से पहले की कहानी. बंगाल के एक गांव में रहता है प्रियनाथ. पहले गांव में उसका परिवार समृद्ध था. अभी नहीं है. बूढ़ी मां को खुश करने के लिए वो एक कम उम्र की लड़की से शादी कर लेता है. खुद रेल में सामान बेचने का काम करता है. फिर कष्ट टूट पड़ते हैं. विश्व युद्ध के कारण लोग गांव से पलायन कर रहे होते हैं लेकिन वो और पत्नी वहीं रुकते हैं. भूख इन दोनों के रिश्ते की परीक्षा लेने लगती है. इस फिल्म को लेकर मृणाल दा ने कहा था:वो एक क्रूर वक्त था और मैं एक क्रूर फिल्म बनाना चाहता था.
फिल्म फेस्टिवल में रहती थी इनकी धूम
दुनिया में जितने टॉप फिल्म फेस्टिवल होते हैं. केन (फ्रांस), वेनिस, बर्लिन, शिकागो, मॉस्को, मोंट्रियल, कार्लोवी, कायरो सब में उनकी फिल्मों को चुना जाता रहा है. उन्हे ढेरों . अवॉर्ड मिलते रहे हैं.
भुवन शोम (1969) सबसे क्लासिक फिल्म
भुवन शोम (1969) उनकी सबसे आइकॉनिक फिल्मों में से एक है.. सुहासिनी मुलै इस फिल्म में उत्पल दत्त के साथ लीड रोल में थीं. इस फिल्म में उनका नाम गौरी था भुवन शोम’ में गहरे निहितार्थों वाला व्यंग्य और अनूठा मनोरंजन दोनों का तालमेल था.
फिल्म में उत्पल दत्त एक अधेड़ रेलवे अफसर की भूमिका में हैं..वो गुजरात के एक गांव शिकार करने की छुटि्टयां लेकर पहुंचता है.
यहां उसे गौरी नाम की गांव की लड़की मिलती है.
उसकी खुश रहने की फिलॉसफी भी है. इस लहर जैसी यात्रा के बाद भुवन शोम को जीवन में नई दिशा मिलती है.
2002 में 80 की उम्र में भी उन्होंने आमार भुवन नाम की एक फिल्म बनाई. वो भी फिल्ममेकिंग के प्रयोगों के साथ.मृणाल सेन द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म जेनेसिस (1986) भी है जिसमें ओम पुरी, शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह ने अभिनय किया था.
फिल्म स्कूलों में इनकी फिल्में पढ़ाई जाती हैं
भारत और दुनिया के शीर्ष फिल्म स्कूलों में मृणाल दा की फिल्में पढ़ाई जाती हैं. फिल्म स्टूडेंट्स के अलावा विश्व सिनेमा में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी भुवम शोम, मृगया, अकालेर संधाने, खंडहर, खारिज, अकाश कुसुम, कोरस, जेनेसिस, एक दिन अचानक जैसी फिल्में विशेष स्थान रखती हैं.
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उन्होंने अपने वक्त की अमानवीय स्थितियों को दर्शकों के सामने रखा.. उनकी फिल्मों में गरीबी, साम्राज्यवाद, अकाल, वर्गभेद, सामाजिक अन्याय, सूखा, गैर-बराबरी जैसे विषयों को देखा गया लेकर मृणाल सेन ने कहा था:
” मैं अपने ख़ुद के वक्त को समझने की कोशिश करता हूं और उसे सामने रखने की कोशिश करता हूं.”
मृणाल दा पर एक अच्छी डॉक्यूमेंट्री है जिसे यहां देख सकते हैं.
दिसंबर 2018 को अपने जीवनकाल में मृणाल सेन ने कुल 28 फिल्मों का निर्देशन किया.
सोवियत संघ का सर्वोच्च पुरस्कार मिला
उन्होंने 20 के करीब नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते थे. विश्व सिनेमा में योगदान के लिए सोवियत संघ ने उन्हें 1979 में नेहरू-सोवियत लैंड अवॉर्ड से सम्मानित किया था. यही नहीं, उन्हें साल 2000 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने अपने मुल्क का ऊंचा सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ मृणाल सेन को पहनाया. ये सम्मान पाने वाले वे अकेले इंडियन फिल्ममेकर हैं.
वे पद्म भूषण जैसे तीसरे सबसे ऊंचे नागरिक सम्मान से नवाजे जा चुके हैं.उन्हें 2005 में भारत सरकार ने दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड प्रदान किया गया जो भारत में फिल्मों का सबसे ऊंचा सम्मान है.
. 30 दिसंबर 2018 को इस बेमिसाल कलाकार का निधन हो गया. मृणाल सेन ने कुल 28 फिल्मों का निर्देशन किया था.
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