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सचमुच के डॉक्टर और लाजवाब एक्टर डॉ श्रीराम लागू

जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

डॉक्टर श्रीराम लागू जैसे संवेदनशील और लाजवाब अभिनेता विरले ही होते हैं. इनकी जैसी भूमिका निभाने वाले कलाकारों को हम आमतौर पर कैरेक्टर आर्टिस्ट कहते हैं. किसी फिल्म में इनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है यह अक्सर आम दर्शक नजरअंदाज कर जाते हैं.

इससे हम एक उदाहरण से अच्छी तरह से समझ सकते हैं. जैसे कोई फुटबॉल मैच चल रहा हो तो दर्शकों का ध्यान सबसे अधिक फारवर्ड खेलने वाले और गोल करने वाले खिलाड़ियों पर ही होता है.

उसी तरह से किसी भी फिल्म में दर्शकों का सबसे अधिक ध्यान हीरो, हीरोइन या फिर विलेन पर ही होता हैं लेकिन जिस तरह से फुटबॉल मैच में गोल करने वाले के अलावा भी कई महत्वपूर्ण खिलाड़ी होते हैं जैसे गोलकीपर और डिफेंडर.

ये खिलाड़ी भी अपनी टीम की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं उसी तरह से श्रीराम लागू जैसे कलाकार भी किसी फिल्म को मजबूती देने में, उसे दर्शनीय बनाने में और उसे सफल करने में अपनी भूमिका अदा करते हैं.

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मुकद्दर का सिकंदर के रामनाथ वकील

श्रीराम लागू की जो पहली फिल्म मैंने सिनेमा हॉल में देखी थी वह मुकद्दर का सिकंदर थी. लेकिन उस समय श्रीराम लागू पर ध्यान नहीं गया था. सारा ध्यान अमिताभ बच्चन, रेखा, विनोद खन्ना राखी और अमजद खान पर ही था.

इस फिल्म में श्रीराम लागू ने राखी के पिता की भूमिका निभाई थी. इस भूमिका में उन्होंने जान डाल दी थी. फिल्म सौतन में भी काफी अच्छे लगे थे उसमें इन्होंने पद्मिनी कोल्हापुरी के पिता का किरदार अदा किया था.

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सिनेमा में यादगार भूमिकाएं

श्रीराम लागू ने हिंदी और मराठी फ़िल्मों में कई यादगार रोल किए. मसलन 1977 की फ़िल्म घरौंदा का वो उम्रदराज़ बॉस (मिस्टर मोदी) जो अपने ऑफ़िस में काम करने वाली एक युवा लड़की (ज़रीना वहाब) से शादी करता है.

ज़रीना वहाब दरअसल अमोल पालेकर से प्यार करती है लेकिन अमोल पैसे के लालच में ज़रीना को मजबूर करता है कि वो श्रीराम लागू से शादी करे.

मगर धीरे-धीरे एक उम्रदराज़ मर्द और एक युवा लड़की के बीच प्यार पनपता है, घरौंदा उसकी ख़ूबसूरत सी कहानी है. ये रोल आसानी से नेगेटिव शेड ले सकता था लेकिन श्रीराम लागू इसे बड़ी नज़ाकत से निभाते हैं. घरौंदा के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता का अवॉर्ड मिला था.

सिंहासन, सामना, पिंजरा जैसी मराठी फिल्मों और चलते-चलते, मुक़दर का सिंकदर, सौतन और लावारिस जैसे कई हिंदी और मराठी फ़िल्मों में उन्होंने काम किया.

रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म गांधी में गोपाल कृष्ण गोखले का उनका छोटा सा रोल भी हमेशा याद रहता है, वही रोल जो उन्होंने बचपन में पुणे के अपने स्कूल में किया था.

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