Opinion

दुनिया भर के लोकतंत्र को भी ग्रस रहा कोविड-19

Faisal Anurag

कोविड महामारी न केवल लोगों के दिलो-दिमाग को प्रभावित कर चुकी है बल्कि उसका असर राजनीतिक तौर तरीकों और प्रचलित राजनीतिक परंपराओं और प्रक्रियों पर भी है. न केवल भारत बल्कि दुनिया के अनेक देशों में और अनेक क्षेत्रीय वैश्विक संगठन इस संक्रमण के तेजी से शिकार हो रहे हैं. भारत में जहां आपदा के अवसर के रूप में कारपोरेटीकरण की नींव गहरी की जा रही है, तो यूरोपियन यूनियनों के देशों के राष्ट्रवादी रुझान के कारण यूनियन की मूल अवधारणा ही प्रभावित हो रही है. अमेरिका में ट्रंप चुनावों को आगे बढ़ाने के लिए तर्क गढ़ रहे हैं तो हंगरी में एक नयी तानाशाही चुनावी प्रकिया की मान्यताओं के बीच उभर आयी है. भारत के पड़ोस के देशों में भी लोकतंत्र की प्रक्रिया कमजोर हो रही है. कुला मिला कर कहा जाये तो कोविड 19 न केवल दिल के मरीजों सहित अन्य गंभीर बीमारियों के मरीजों के लिए घातक साबित हुआ है, बल्कि लोकतंत्र को भी वह ग्रस रहा है.

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अमेरिका में 2020 का राष्ट्रपति चुनाव ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की उम्मीद को कमजोर कर चुका है. अब तक हुए सर्वेक्षणों में ट्रंप लगातार पिछढ़ते जा रहे हैं. कोरोना वायरस के संदर्भ में उनकी लापरवाही उनके राजनीतिक भविष्य पर हावी दिख रही है. राष्ट्रवाद के नये नये जुमलों के माध्यम से अपनी गिरती लोकप्रियता को वे फिर से वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनकी हर प्रक्रिया उनके लिए एक खौफ हो गयी है. उन्होंने नस्लवादी रंगभेदी जुमलों का सहारा ले कर 2016 की तरह माहौल बनाने का प्रयास भी किया है. बावजूद श्वेत वोटरों में उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में सुधार नहीं दिख रहा है. नरेंद्र मोदी की तरह ट्रंप की भी अमेरिका में भक्तमंडली है. इसके साथ दुनिया के कुछ चुने हुए उन शासकों का भी उन्हें साथ मिला है जिन्होंने पिछले चार सालों में अपने-अपने देशों में एकाधिकारवाद के सपनों को उड़ान दी है. बावजूद इसके उन देशों के अधिकतर नागरिकों के बीच एकजुटता नहीं दिख रही है. ब्लैक मैंटर्स आंदोलन ने अमेरिकी समाज में जो हलचल पैदा की है उससे ट्रंप के समर्थकों की परेशानी बढ़ी ही है.

इन्हीं हालात में ट्रंप ने सुझाव दिया है कि नबंवर में होनेवाले चुनावों को टाल दिया जाये. अमेरिकी कानून के अनुसार चुनाव टालने के लिए वहां के निचले सदन की सहमति जरूरी है. चूंकि उस पर ट्रंप को चुनौती दे रहे डेमोक्रेटों का बहुमत है इसलिए ट्रंप के इस सुझाव को अमल में लाये जाने की संभावना नहीं है. अमेरिका के अखबारों में इस साल अप्रैल से ही यह आशंका जतायी जा रही है कि राष्ट्रपति चुनावों को टाल सकते हैं. अमेरिका का संविधान राष्ट्रपति को पूरा अधिकार देता है, लेकिन केवल प्रशानिक फैसलों के लिए. अमेरिकी समाज इस समय जिन हालातों से गुजर रहा है उसके राजनीतिक असर का सही आकलन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के डिबेट के बाद ही उभर कर सामने आयेगा. अमेरिकी चुनावों में इन डिबेटों की बड़ी भूमिका होती है.

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यूरोपियन यूनियन के पिछले सप्ताह हुई कोरोना शिखर सम्मेलन में जिस तरह के विवाद उभरे उससे जाहिर है कि यूनियन के देशों के बीच मतभेद उन हालात की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां यूरोपियन देशों के बीच के संबंध प्रभावित होंगे. ब्रिटेन के इस यूनियन से बाहर होने के बाद इसके भीतर जिस तरह के विवाद उभरे हैं, उसके संकेत अच्छे नहीं हैं. दो दिनों के लिए बुलाया गया सम्मेलन पांच दिनों तक चला. यह असमान्य होने का ही संकेत है, जहां सहमति बन ही नहीं सकी. खबरों के अनुसार संघ के 27 सदस्य देशों के राष्ट्रपतियों-प्रधानमंत्रियों के बीच राष्ट्रीय स्वार्थों का टकराव ऐसा था कि तीन दिनों तक गतिरोध बना रहा. यहां तक कि उनके बीच अच्छी-ख़ासी गर्मा-गर्मी भी रही. कई बार लगा कि सम्मेलन अब विफल हो जायेगा. वे इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे थे कि कोरोना वायरस की मार से सर्वाधिक पीड़ित इटली, स्पेन और पुर्तगाल जैसे यूरोप के देशों की सहायता कैसे की जाये. उनकी अर्थव्यवस्था के उद्धार के लिए कितना पैसा उन्हें ऋण के रूप में और कितना ऐसे अनुदान के रूप में दिया जाये, जिसे उन्हें लौटाना नहीं पड़े.

दरअसल यूरोपियन देशों के भीतर जिस तरह राष्ट्रवादी प्रवृति हावी हुई है उससे वैश्विक सहयोग और यूरोपियन सहयोग पर असर पड़ने की यह शुरुआत है. जर्मनी की चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मर्केल सम्मेलन की अध्यक्षता कर रही थीं. यूरोपीय संघ को अपने सदस्य देशों के अब तक के सबसे बड़े उद्धार कार्यक्रम के लिए 750 अरब यूरो जुटाना और उसके न्यायसंगत वितरण का फ़ार्मूला ढूंढ़ना था. साथ ही संघ के 2027 तक के बजट के लिए भी सदस्य देशों का अनुमोदन प्राप्त करना था. यह बजट एक खरब 74 अरब यूरो के बराबर है. एक यूरो की कीमत इस वक्त लगभग 88 रुपये है. यूरोप में कोरोना वायरस से मचे हाहाकार की पराकाष्ठा के ठीक बाद जर्मनी की अध्यक्षता में ब्रसेल्स में हुए इस सम्मेलन को वास्तव में यूरोपीय एकजुटता का शिखर सम्मेलन बनना था. लेकिन उसने पैसे के लिए धक्का-मुक्की करते ऐसे राष्टवादी यूरोपीय नेताओं की तस्वीर अपने पीछे छोड़ी है, जो भारत जैसे देशों में राष्ट्रवाद की निंदा करते हैं. उत्तरी यूरोप के छोटे-छोटे देशों के युवा नेताओं ने जर्मनी और फ्रांस जैसे बड़े देशों के मंझे हुए नेताओं को नाकों चने चबवा दिये.

ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, डेनमार्क और स्वीडन ने विद्रही रूप धारण किया तो हंगरी ने वीटो का प्रयोग कर दिया. ये सभी  कमजोर देशों के लिए आर्थिक सहयोग के पक्ष में नहीं थे. हंगरी जिसके प्रधानमंत्री विक्तेार ओर्बन के वीटो के बाद किसी सहमति पर पहुंचने में शुरुआती बाधा पहुंची. इससे जाहिर हुआ कि यूरोपियन यूनियन जिसकी एक संसद भी है, अब भी राष्ट्रों के राष्ट्रवादी प्रवृतियों की गिरफत से बाहर नहीं है. यूरोप में दक्षिणपंथी ताकतों का जिस तरह उभार हुआ है वह इस यूनियन के अस्तित्व के लिए कभी भी घातक साबित हो सकता है. हंगरी के बार्बन एक कट्टर दक्षिणपंथी हैं जो अज्ञात समय तक शासन का हक हासिल कर चुके हैं.

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