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क्या मायावती की बसपा फिर से भाजपा के साथ गलबहिया के लिए आतुर हो रही है?  

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Faisal Anurag

क्या मयावती भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीतिक तालमेल ओर सहयोग की रणनीति पर चल रही है? हाल के उनके बयानों और गतिविधियों के कारण यह सवाल राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय है. लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जिस तरह तोड़ा उसके बाद से ही यह बातें की जा रही थीं. लेकिन जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त किये जाने के उनके समर्थन ने इस चर्चा को और हवा दी है. उनके तीन नये ट्विट के बाद तो यह सवाल प्रमुखता से किया जा रहा है.

नये ट्विट में मायावती ने कश्मीर की यात्रा पर गये 10 दलों के नेताओं के खिलाफ टिपपणी की है और नेताओं को गैर जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया है. उनका बयान किसी भाजपा नेता या भाजपा समर्थक राज्यपाल की जेरोक्स कॉपी जैसा है.  मायावती ने तीन ट्विट किये हैं. और तीनों के माध्यम से उनके राजनीतिक संदेश इस तरह की आशंका को पुष्ट ही कर रहे हैं.

या तो मायावती जांच एजेंसियों के भारी दबाव में हैं या फिर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व के लिए भाजपा की जूनियर सहयोगी बनने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. हालांकि इसकी तस्दीक का अंदाजा तो उनके अगले कदमों से ही लगेगा.

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बहरहाल, मायावती के चुनावोत्तर रुख को राजनीतिक विश्लेषक यह समझ नहीं पा रहे हैं. अचानक उनका भारतीय जनता पार्टी के हर राजनीतिक फैसले के साथ खड़ा दिखना सामान्य तो नहीं ही है. बसपा की राजनीतिक साख के लिए यह बेहद अहम है. पहले भी मायावती भाजपा के साथ सहयोग कर चुकी हैं. हो सकता है कि अब नये तरीके से उनकी राजनीति भाजपा को लाभ की स्थिति में आये. इन सभी संभवनाओं पर चर्चा हो रही है. ये संभावनाएं आगे क्या आकार लेंगी, इस विषय में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता.

लेकिन इतना तय है कि मायावती के इन स्टैंड से बहुजन आंदोलन के कांशीराम के सपने को भारी नुकसान हो रहा है. ऐसे दौर में जब आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व आरक्षण पर बहस की बात कर रहा है, दलितों के लिए मायावती का तौर तरीका बेचैन ही करने वाला है. वैसे भी यूपी 2014 और बाद के चुनावों में गैर जाटव दलितों का बड़ा वोट आधार मायावती के साथ नहीं रहा है. हाल में कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम में भी एकमात्र बसपा विधायक ने जिस तरह से भाजपा की मदद की है, वह भी संदेह को बल देता है.

मायावती के फैसले को राजस्थान के सभी बसपा विधायकों ने खारिज करते हुए सार्वजनिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि सबकुछ सामान्य नहीं है. बसपा का मुसलमानों में भी आधार रहा है. लेकिन उनमें भी तब निराशा बढ़ गयी जब मायावती ने रातों-रात तीन तलाक मामले पर संसदीय दल के नेता के नजरिये के बाद दानिश अली को पद से हटा दिया गया. दानिश अली ने 2019 के चुनाव में जनता दल सेकुलर से एक समझौते के तहत मायावती का टिकट लिया था.

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मयावती ने जम्मू कश्मीर गये नेताओं के संदर्भ में विपक्षी दलों के नेताओं की श्रीनगर यात्रा पर कहा कि उन्हें वहां जाने के लिए परिस्थितियों के सामान्य होने का तक इंतजार करना चाहिए. इस ट्विट की भाषा तल्ख है और विपक्षी नेताओं को कठघरे में खड़ा करने का अहसास देती है. एक अन्य ट्विट में उन्होंने यह भी कहा है कि कश्मीर के हालात सामान्य होने में समय लगेगा ही. यह बेहद चौंकाने जैसा बयान है.

मायावती ने सरकार के इस सवाल पर सरकार के साथ खड़े होने पर अंबेडकर का हवाला दिया है. मायावती ने कहा है कि बाबा साहब अंबेडकर हमेशा देश में एकता और अखंडता के पक्षधर थे. इसलिए बहुजन समाज पार्टी 370 हटाने के पक्ष में है. साथ ही उन्होंने विपक्षी दलों के बगैर अनुमति के कश्मीर जाने की कोशिश की भी आलोचना की है. इसे राजनीति से प्रेरित बताया है.

मायावती ने कहा ‘जैसा कि विदित है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर हमेशा ही देश की समानता, एकता व अखंडता के पक्षधर रहे हैं इसलिए वे जम्मू कश्मीर राज्य में अलग से धारा 370 का प्रावधान करने के कतई भी पक्ष में नहीं थे. इसी खास वजह से बीएसपी ने संसद में इस धारा को हटाये जाने का समर्थन किया.’ मायावती के इस बयान को अंबेडकर के विचारों के जानकार सही नहीं बता रहे हैं.

इस संदर्भ में उनके 1951 के एक भाषण का हवाला वे दे रहे हैं जिसमें अंबेडकर 370 के खिलाफ नहीं हैं. यही नहीं, संविधान सभा में अंबेडकर ने 370 का विरोध भी नहीं किया था. इसका ड्राफ्ट तो आयंगर और वल्लवभाई पटेल ने ही लिखा था. मायावती का अंबेडकर संदर्भ भाजपा के साथ ही दिख रहा है. मोदी ने भी कहा था 370 को हटाये जाने के बाद अंबेडकर का सपना पूरा हो गया है.

दूसरी ओर जममू कश्मीर के मामले से व्यथित हो कर 2012 बैच के आइएएस कन्नन गोपानाथन ने इस्तीफा दे दिया है. कन्नन का इस्तीफा उस दौर में आया है जब नौकशाह आमतौर पर समर्पित दिख रहे हैं. और तथ्यों और सच्चाई के साथ खड़ा होने से परहेज कर रहे हैं.

इस्तीफा के पत्र में कन्नन ने अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है कि वे एक दिन के लिए ही सही आजाद होने का अहसास करना चाहते हैं. एक साक्षात्कार में तो कन्नन ने कहा है: जब कोई पूछेगा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने एक पूरे राज्य पर बैन लगा दिया, लोगों के मौलिक अधिकार भी छीन लिये गये, तब आप क्या कर रहे थे.

मैं कह सकूंगा कि मैंने विरोध में नौकरी से इस्तीफा दे दिया था. आज के संदर्भ में यह कोई सामान्य अभिव्यक्ति नहीं है. एक ऐसा दौर जब प्रेस कांउसिल आफ इंडिया मीडिया की स्वतंत्रता की हिफाजत के बजाय सरकार के पक्ष में खड़ा हो कर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे रहा हो और इस संदर्भ की याचिकाओं पर फौरी सुनवाई नहीं हो तो कन्नन बेहद साहसी दिख रहे हैं. अपने कार्यकाल में उनकी प्रतिबद्धता और लोगो के साथ संवाद और विकास व राहत संबंधी उनकी भूमिका कई सालों से चर्चा का विषय है. इसलिए इस्तीफे को सीमित नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिये.

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