
Rajesh Kumar Das
चेंबर जैसी व्यापारिक संस्थाएं कालिदास की तरह उसी टहनी को ना काटे जिसमें वे खुद छोटे व्यापारियों के साथ बैठे हुए हैं. राजनीतिक पार्टियों की अति-मुग्धता से खुद को दूर करे और बुनियादी व्यापारिक मुद्दों पर काम करें अन्यथा बुरा समय बहुत नजदीक है.
देश की आर्थिक नीतियों पर आप चाहे जो भी बातें कर लें, इनमें छोटे-मझोले व्यापारियों के लिए एक बुरे दौर की आहट साफ सुनाई दे रही है. जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी समेत सारे राजनीतिक नेतागण एक स्वर में हमेशा और बार-बार 125-130 करोड़ देशवासियों का जिक्र करते रहते हैं तो देश की आर्थिक नीतियों में भी इस पूरी जनसंख्या शक्ति का अलग-अलग और अच्छे से ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए.
इसे भी पढ़ें- झारखंड में भी शुरू हो सकती है सेवाओं की होम डिलीवरी
नोटबंदी और जीएसटी के फायदे जरूर होंगे, परंतु इससे छोटे मझोले व्यापारियों का क्या फायदा हुआ है, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है. सरकार को जीएसटी के एक वर्ष पूरे होने के बाद लोगों को यह जरूर बतलाना चाहिए कि राज्यवार और विशेषकर छोटे और कम जनसंख्या वाले राज्यों में जीएसटी के पूर्व और एक वर्ष के बाद राजस्व समेत अन्य क्या बदलाव आए हैं.
उन्हें यह भी बतलाना चाहिए कि किस प्रकार छोटे व्यापारी जो पहले सी फार्म के अंतर्गत 2% केंद्रीय कर देकर व्यापार करते थे, उन्हें अब ज्यादा कैपिटल की दरकार आन पड़ी है. ऐसे में जीएसटी कैसे उनके लिए मददगार साबित हुआ है. उन्हें यह भी बतलाना चाहिए कि B2B सेगमेंट के छोटे व्यापारी जो मुख्यतः उधार पर धंधा करते हैं, उन्हें उनके द्वारा प्रदत्त सेवा या बेची गयी वस्तु की कीमत उन्हें कब तक निश्चित रूप से प्राप्त हो सकेगी या वे सिर्फ अपने दम पर ही बकाए रकम की प्राप्ति के लिए दौड़ लगाते रहें और सरकार सिर्फ अपने चुनावों की जीत के बारे ही सोचती रहेगी.
देश की आर्थिक नीतियों से बार-बार यह जाहिर हो रहा है कि अब देश सिर्फ बड़े कॉरपोरेट्स के हितों की ही रक्षा करेगा, छोटे व्यापारी अब खत्म होने की राह पकड़ लें, ऐसी सोच नीचे स्पष्ट किये गए कारणों की वजह से ज्यादा ही बलवती दिखाई पड़ती है.
* रिलायंस जिओ इन्फोकॉम लिमिटेड की क्रांतिकारी डिजिटल 4G LTE सेवा पर गौर करें, यह एक साफ संदेश देती है कि “Big Fish Eat Small Fish with as Much Right as They Have Power”
इसे भी पढ़ें- सरकार ही नहीं देती बिजली बिल, अब तक फूंक दी 200 करोड़ की बिजली और नहीं चुकाया बिल
वर्तमान में भारत में मुख्य रूप से भारती एयरटेल, टाटा कम्यूनिकेशन, आइडिया सेल्युलर, आर कॉम, वोडाफोन और BSNL/MTNL अपनी मोबाइल सेवाएं दे रहें है. और आपको यह जान कर बेहद अचरज होगा की सिर्फ इन्हीं कंपनियों पर (वोडाफोन को छोड़कर) moneycontrol.com के अनुसार वर्तमान में लगभग एक लाख 25 हजार करोड़ का कर्ज है. भारती एयरटेल जो वर्तमान में सबसे बड़ा मोबाइल सेवा प्रदाता है अकेले उसपर कुल 42,400 करोड़ का कर्ज है. Jio के दौर में अब इन कंपनियों का क्या होगा, यह गंभीर विषय है. क्योंकि यहां सिर्फ माल्या की तरह कर्ज के डूबने का खतरा नहीं है, यहां लोगों की नौकरियों के खत्म होने का और देश की आर्थिक नीति पर सवालिया निशान लग जाने का भी खतरा है. इस प्रकार की स्थिति अर्थव्यवस्था को लांग टर्म में बुरी तरह मोनोपोलाईज करेगी जो ना ही देश के हित में है और ना ही उपभोक्ता के.
* इसी प्रकार वालमार्ट और फ्लिपकार्ट के सौदे पर भी गौर करें, और गौर करें ई-कॉमर्स के बढ़ते वर्चस्व और गलियों-मुहल्लों में खत्म होते छोटी श्रेणी की दुकानों पर. वालमार्ट-फ्लिपकार्ट डील और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर देश भर में 28 सितंबर को कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने देशव्यापी बंद का आह्वाहन किया है और इसे खासा समर्थन भी मिलता दिख रहा है.
इसे भी पढ़ें- घुटन में माइनॉरटी IAS ! सरकार पर आरोप- धर्म देखकर साइड किए जाते हैं अधिकारी
ई-कॉमर्स ने पिछले वर्षों में उपभोक्ता के खरीद करने के तरीकों में बड़ा बदलाव लाया है, अब चीजें सीधे आपके घरों तक डिलीवर हो रही है, उपभोक्ता के पास विकल्प हैं और इसे पूरा करने के लिए डिजिटल दुनिया भी है, तो क्या यह अच्छा नहीं है. अच्छा तो तब होगा, जब ज्यादा चीजें हमारे देश की ही बिकेंगी, अब वालमार्ट तो लोगों के लिए दुनिया भर से सस्ती चीजें फ्लिपकार्ट के प्लेटफार्म के जरिये ही बेचेगा, जिसे उसने पूर्व से ही मोनोपोलाईज कर रखा है. अगर ऐसा हुआ तो देश के छोटे उद्योग-धंधों, महिला उद्यम, स्वदेशी व्यापारिक संस्थाओं और हाकर्स और एजेंट श्रेणी के लोगों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा, जो पहले से ही बुरी तरह चरमराये हुए हैं.
इस विषय पर तजुर्बे के लिए आप एक सर्वेक्षण करके देखिये कि जो लोग पूर्व में मोबाइल बेचने या वाउचर रीचार्ज करने जैसे कामों से जुड़े थे, उनसे पूछिये कि वे अब क्या कर रहे है, क्या वे कोई नौकरी कर रहे हैं, या कोई दूसरा काम. लेकिन कोई उन्हें नौकरी भी क्यों देगा, उनसे अच्छे स्मार्ट बेरोजगार युवा भी तो नौकरी पाने के लिए कतार में खड़े हैं. इसी प्रकार आमेजन पैंट्री और मॉडर्न ट्रेड्स भी छोटे मनिहारी और खिचड़ी परोस दुकानों के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरी है. नौकरियां हैं नहीं और पुराने धंधे भी बंद हो सकते हैं, यह दौर बहुत ही ज्यादा स्याह प्रतीत हो रहा है.
तो क्या किया जा सकता है.
इसे भी पढ़ें- सीपी सिंह के बयान पर उबले पुलिस के जवान, कहा – मंत्रिमंडल का नाम बदलकर क्या रखियेगा मंत्री जी
1. जैसे एक पिता अपने सभी बच्चों के लिए एक समान दृष्टि रखता है, देश की सरकार को देश के छोटे-बड़े हरेक व्यापारी के लिए भी उसी प्रकार से एक समान तरीके से सोचना चाहिए.
2. दूसरे, झारखंड चेम्बर (FJCCI) समेत देश के हरेक व्यापारिक संगठन को आत्म विश्लेषण करना चाहिए. उन्हें देश के वर्तमान दौर और भविष्य के नफा नुकसान का तुरंत आकलन करना चाहिए. अगर किसी संगठन में कोई राजनीतिक व्यक्ति भी सदस्य हो, तो उन्हें पहले एक व्यापारी के नजरिये से सोचना चाहिए. अगर चेंबर के बड़े व्यापारी सोचते हैं कि वे सेफ हैं, तो वे गलती कर रहे हैं, इस दौर में कोई भी सेफ नहीं है, चीजें तेज गति से बदल रहीं हैं, कंज्यूमर क्रांति के नए दौर में बेचने वाले बदल जाएंगे, जो कम से कम लोकल तो नहीं ही होंगे. अगर यह बात सही नहीं है तो जाकर सरकारी आंकड़ें जुटाइये कि आखिर कहां और किस योजना में लोकल व्यापारियों के लिए काम आरक्षित किये गए हैं, भ्रांति दूर हो जाएगी.
चेंबर का चुनाव एक अच्छा समय है, इस विषय पर गंभीर चर्चा हो, विमर्श का दौर शुरू हो, नई टीम इस विषय की गंभीरता को समझे, अन्यथा कालिदास की कहानी फिर से दुहराई जाएगी, और लाइन से गिरेंगे छोटे व्यापारी और फिर उनसे बड़े और फिर उनसे भी बड़े, और फिर चेम्बर जैसी संस्थाओं के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाएगा !!




